भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 465

* शतरुद्रसंहिता * ४५१

शिवजीने कहा—'शिलादनन्दन! तुमने बड़ा उत्तम तप किया है। तुम्हारी इस तपस्यासे संतुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह माँग लो।' महादेवजीके यों कहनेपर मैं सिरके बल उनके चरणोंमें लोट गया और फिर बुढ़ापा तथा शोकका विनाश करनेवाले परमेशानकी स्तुति करने लगा। तब परम कष्टहारी वृषभध्वज परमेश्वर शम्भुने मुझ परम भक्तिसम्पन्न नन्दीको जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे और जो सिरके बल चरणोंमें पड़ा था, अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर उठा लिया और शरीरपर हाथ फेरने लगे। फिर वे जगदीश्वर गणाध्यक्षों तथा हिमाचलकुमारी पार्वतीदेवीकी ओर दृष्टिपात करके मुझे कृपादृष्टिसे देखते हुए यों कहने लगे—'वत्स नन्दी! उन दोनों विप्रोंको तो मैंने ही भेजा था। महाप्राज्ञ! तुम्हें मृत्युका भय कहाँ; तुम तो मेरे ही समान हो। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। तुम अमर, अजर, दुःखरहित, अव्यय और अक्षय होकर सदा गणनायक बने रहोगे तथा पिता और सुहृद्वर्गसहित मेरे प्रियजन होओगे। तुममें मेरे ही समान बल होगा। तुम नित्य मेरे पार्श्वभागमें स्थित रहोगे और तुमपर निरन्तर मेरा प्रेम बना रहेगा। मेरी कृपासे जन्म, जरा और मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर कृपासागर शम्भुने कमलोंकी बनी हुई अपनी शिरोमालाको उतारकर तुरंत ही मेरे गलेमें डाल दिया। विप्रवर! उस शुभ मालाके गलेमें पड़ते ही मैं तीन नेत्र और दस भुजाओंसे सम्पन्न हो गया तथा द्वितीय शंकर-सा प्रतीत होने लगा। तदनन्तर परमेश्वर शिवने मेरा हाथ पकड़कर पूछा—'बताओ, अब तुम्हें कौन-सा उत्तम वर दूँ?'

फिर उन वृषध्वजने अपनी जटामें स्थित हारके समान निर्मल जलको हाथमें ले 'तुम नदी हो जाओ' यों कहकर उसे छोड़ दिया। तब वह जल उत्तम ढंगसे बहनेवाली, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण, महान् वेगशालिनी, दिव्यरूपा पाँच सुन्दर नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो गया। उनके नाम हैं—जतोदका, त्रिस्त्रोता, वृषध्वनि, स्वर्णोदका और जम्बूनदी। मुने! यह पंचनद शिवके पृष्ठभागकी भाँति परम शुभ है। महेश्वरके निकट इसका नाम लेनेसे यह परम पावन हो जाता है। जो मनुष्य पंचनदपर जाकर स्नान और जप करके परमेश्वर शिवका पूजन करता है, वह शिवसायुज्यको प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है। तत्पश्चात् शम्भुने उमासे कहा—'अव्यये! मैं नन्दीका अभिषेक करके इसे गणाध्यक्ष बनाना


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