भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

४५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चाहता हूँ! इस विषयमें तुम्हारी क्या राय है?'

तब उमा बोलीं—देवेश! आप नन्दीको गणाध्यक्षपद प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर! यह शिलादनन्दन मेरे लिये पुत्र-सरीखा है, इसलिये नाथ! यह मुझे बहुत ही प्यारा है। तदनन्तर भक्तवत्सल भगवान् शंकरने अपने अतुलबलशाली गणोंको बुलाकर उनसे कहा।

शिवजी बोले—गणनायको! तुम सब लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करो। यह मेरा प्रिय पुत्र नन्दीश्वर सभी गणनायकोंका अध्यक्ष और गणोंका नेता है; इसलिये तुम सब लोग मिलकर इसका मेरे गणोंके अधिपत्तिपदपर प्रेमपूर्वक अभिषेक करो। आजसे यह नन्दीश्वर तुमलोगोंका स्वामी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! शंकरजीके इस कथनपर सभी गणनायकोंने 'एवमस्तु' कहकर उसे स्वीकार किया और वे सामग्री जुटानेमें लग गये। फिर सब देवताओं और मुनियोंने मिलकर मेरा अभिषेक किया। तदनन्तर मरुतोंकी मनोहारिणी दिव्य कन्या सुयशासे मेरा विवाह करवा दिया। उस समय मुझे बहुत-सी दिव्य वस्तुएँ मिलीं। महामुने! इस प्रकार विवाह करके मैंने अपनी उस पत्नीके साथ शम्भु, शिवा, ब्रह्मा और श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब त्रिलोकेश्वर भक्तवत्सल भगवान् शिव पत्नीसहित मुझसे परम प्रेमपूर्वक बोले।

ईश्वरने कहा—सत्पुत्र! यह तुम्हारी प्रिया सुयशा और तुम मेरी बात सुनो। तुम मुझे परम प्रिय हो, अतः मैं स्नेहपूर्वक तुम्हें मनोवांछित वर प्रदान करूँगा। गणेश्वर नन्दीश! देवी पार्वतीसहित मैं तुमपर सदा संतुष्ट हूँ, इसलिये वत्स! तुम मेरा उत्तम वचन श्रवण करो। तुम मेरे अटूट प्रेमी, विशिष्ट, परम ऐश्वर्यसम्पन्न, महायोगी, महान् धनुर्धारी, अजेय, सबको जीतनेवाले, महाबली और सदा पूज्य होओगे। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारी स्थिति होगी और जहाँ तुम रहोगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। यही दशा तुम्हारे पिता और पितामहकी भी होगी। पुत्र! तुम्हारे ये महाबली पिता परम ऐश्वर्यशाली, मेरे भक्त और गणाध्यक्ष होंगे। वत्स! ये ही नियम तुम्हारे पितामहपर भी लागू होंगे। अन्तमें तुम सब लोग मुझसे वरदान प्राप्त करके मेरा सांनिध्य प्राप्त करोगे।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तत्पश्चात् महाभागा उमादेवी वर देनेके लिये उत्सुक हो मुझ नन्दीसे बोलीं—'बेटा! तू मुझसे भी वर माँग ले, मैं तेरी सारी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण कर दूँगी।' तब देवीके उस वचनको सुनकर मैंने हाथ जोड़कर कहा—'देवि! आपके चरणोंमें मेरी सदा उत्तम भक्ति बनी रहे।' मेरी याचना सुनकर देवीने कहा—'एवमस्तु—ऐसा ही होगा।' फिर शिवा नन्दीकी प्रियतमा पत्नी सुयशासे बोलीं।

देवीने कहा—वत्से! तुम भी अपना अभीष्ट वर ग्रहण करो—तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। तुम जन्म-बन्धनसे छूट जाओगी और पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न रहोगी तथा तुम्हारी मुझमें और अपने स्वामीमें अटल भक्ति बनी रहेगी।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर शिवजीकी आज्ञासे परम प्रसन्न हुए ब्रह्मा,


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