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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

४५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

चाहता हूँ! इस विषयमें तुम्हारी क्या राय है?'

तब उमा बोलीं—देवेश! आप नन्दीको गणाध्यक्षपद प्रदान कर सकते हैं; क्योंकि परमेश्वर! यह शिलादनन्दन मेरे लिये पुत्र-सरीखा है, इसलिये नाथ! यह मुझे बहुत ही प्यारा है। तदनन्तर भक्तवत्सल भगवान् शंकरने अपने अतुलबलशाली गणोंको बुलाकर उनसे कहा।

शिवजी बोले—गणनायको! तुम सब लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करो। यह मेरा प्रिय पुत्र नन्दीश्वर सभी गणनायकोंका अध्यक्ष और गणोंका नेता है; इसलिये तुम सब लोग मिलकर इसका मेरे गणोंके अधिपत्तिपदपर प्रेमपूर्वक अभिषेक करो। आजसे यह नन्दीश्वर तुमलोगोंका स्वामी होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! शंकरजीके इस कथनपर सभी गणनायकोंने 'एवमस्तु' कहकर उसे स्वीकार किया और वे सामग्री जुटानेमें लग गये। फिर सब देवताओं और मुनियोंने मिलकर मेरा अभिषेक किया। तदनन्तर मरुतोंकी मनोहारिणी दिव्य कन्या सुयशासे मेरा विवाह करवा दिया। उस समय मुझे बहुत-सी दिव्य वस्तुएँ मिलीं। महामुने! इस प्रकार विवाह करके मैंने अपनी उस पत्नीके साथ शम्भु, शिवा, ब्रह्मा और श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम किया। तब त्रिलोकेश्वर भक्तवत्सल भगवान् शिव पत्नीसहित मुझसे परम प्रेमपूर्वक बोले।

ईश्वरने कहा—सत्पुत्र! यह तुम्हारी प्रिया सुयशा और तुम मेरी बात सुनो। तुम मुझे परम प्रिय हो, अतः मैं स्नेहपूर्वक तुम्हें मनोवांछित वर प्रदान करूँगा। गणेश्वर नन्दीश! देवी पार्वतीसहित मैं तुमपर सदा संतुष्ट हूँ, इसलिये वत्स! तुम मेरा उत्तम वचन श्रवण करो। तुम मेरे अटूट प्रेमी, विशिष्ट, परम ऐश्वर्यसम्पन्न, महायोगी, महान् धनुर्धारी, अजेय, सबको जीतनेवाले, महाबली और सदा पूज्य होओगे। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारी स्थिति होगी और जहाँ तुम रहोगे, वहाँ मैं उपस्थित रहूँगा। यही दशा तुम्हारे पिता और पितामहकी भी होगी। पुत्र! तुम्हारे ये महाबली पिता परम ऐश्वर्यशाली, मेरे भक्त और गणाध्यक्ष होंगे। वत्स! ये ही नियम तुम्हारे पितामहपर भी लागू होंगे। अन्तमें तुम सब लोग मुझसे वरदान प्राप्त करके मेरा सांनिध्य प्राप्त करोगे।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तत्पश्चात् महाभागा उमादेवी वर देनेके लिये उत्सुक हो मुझ नन्दीसे बोलीं—'बेटा! तू मुझसे भी वर माँग ले, मैं तेरी सारी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण कर दूँगी।' तब देवीके उस वचनको सुनकर मैंने हाथ जोड़कर कहा—'देवि! आपके चरणोंमें मेरी सदा उत्तम भक्ति बनी रहे।' मेरी याचना सुनकर देवीने कहा—'एवमस्तु—ऐसा ही होगा।' फिर शिवा नन्दीकी प्रियतमा पत्नी सुयशासे बोलीं।

देवीने कहा—वत्से! तुम भी अपना अभीष्ट वर ग्रहण करो—तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। तुम जन्म-बन्धनसे छूट जाओगी और पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न रहोगी तथा तुम्हारी मुझमें और अपने स्वामीमें अटल भक्ति बनी रहेगी।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर शिवजीकी आज्ञासे परम प्रसन्न हुए ब्रह्मा,


789 संक्षिप्त शिवपुराण—15 D

  • शतरुद्रसंहिता * ४५३

विष्णु तथा समस्त देवगणोंने भी प्रेमपूर्वक हम दोनोंको वरदान दिये। तत्पश्चात् परमेश्वर शिव कुटुम्बसहित मुझे अपनाकर तथा उमासहित वृषपर आरूढ़ हो सम्बन्धियों एवं बान्धवोंके साथ अपने निवासस्थानको चले गये। तब वहाँ उपस्थित विष्णु आदि समस्त देवता मेरी प्रशंसा तथा शिव-शिवाकी स्तुति करते हुए अपने-अपने धामको चल दिये। वत्स ! इस प्रकार मैंने तुमसे अपने अवतारका वर्णन कर दिया। महामुने ! यह मनुष्योंके लिये सदा आनन्ददायक और शिवभक्तिका वर्धक है। जो श्रद्धालु मानव भक्तिभावित चित्तसे मुझ नन्दीके इस जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहके वृत्तान्तको सुनेगा अथवा दूसरोंको सुनायेगा तथा पढ़ेगा या दूसरेको पढ़ायेगा, वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें परमगतिको प्राप्त होगा। (अध्याय ७)


### कालभैरवका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या और शिवजीका प्रसन्न होकर उनकी पत्नी शुचिष्मतीके गर्भसे उनके पुत्ररूपमें प्रकट होनेका उन्हें वरदान देना

तदनन्तर भगवान् शंकरके भैरवावतारका वर्णन करके नन्दीश्वरने कहा—महामुने ! परमेश्वर शिव उत्तमोत्तम लीलाएँ रचनेवाले तथा सत्पुरुषोंके प्रेमी हैं। उन्होंने मार्गशीर्षमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीको भैरवरूपसे अवतार लिया था। इसलिये जो मनुष्य मार्गशीर्ष-मासकी कृष्णाष्टमीको कालभैरवके संनिकट उपवास करके रात्रिमें जागरण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य अन्यत्र भी भक्तिपूर्वक जागरणसहित इस व्रतका अनुष्ठान करेगा, वह भी महापापोंसे मुक्त होकर सद्गतिको प्राप्त हो जायगा। प्राणियोंके लाखों जन्मोंमें किये हुए जो पाप हैं, वे सब-के-सब कालभैरवके दर्शनसे निर्मल हो जाते हैं। जो मूर्ख कालभैरवके भक्तोंका अनिष्ट करता है, वह इस जन्ममें दुःख भोगकर पुनः दुर्गतिको प्राप्त होता है। जो लोग विश्वनाथके तो भक्त हैं परंतु कालभैरवकी भक्ति नहीं करते, उन्हें महान् दुःखकी प्राप्ति होती है। काशीमें तो इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। जो मनुष्य वाराणसीमें निवास करके कालभैरवका भजन नहीं करता, उसके पाप शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ते रहते हैं। जो काशीमें प्रत्येक भौमवारकी कृष्णाष्टमीके दिन कालराजका भजन-पूजन नहीं करता, उसका पुण्य कृष्णपक्षके चन्द्रमाके समान क्षीण हो जाता है।

तदनन्तर नन्दीश्वरने वीरभद्र तथा शरभावतारका वृत्तान्त सुनाकर कहा—ब्रह्मपुत्र ! भगवान् शिव जिस प्रकार प्रसन्न होकर विश्वानर मुनिके घर अवतीर्ण हुए थे, शशिमौलिके उस चरितको तुम प्रेमपूर्वक श्रवण करो। उस समय वे तेजकी निधि अग्निरूप सर्वात्मा परम प्रभु शिव अग्निलोकके अधिपतिरूपसे गृहपति नामसे अवतीर्ण हुए थे। पूर्वकालकी बात है, नर्मदाके रमणीय तटपर नर्मपुर नामका एक नगर था। उसी नगरमें विश्वानर नामके एक मुनि निवास करते थे। उनका जन्म शाण्डिल्य गोत्रमें हुआ था। वे परम पावन,

४५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पुण्यात्मा, शिवभक्त, ब्रह्मतेजके निधि और जितेन्द्रिय थे। ब्रह्मचर्याश्रममें उनकी बड़ी निष्ठा थी। वे सदा ब्रह्मयज्ञमें तत्पर रहते थे। फिर उन्होंने शुचिष्मती नामकी एक सद्गुणवती कन्यासे विवाह कर लिया और वे ब्राह्मणोचित कर्म करते हुए देवता तथा पितरोंको प्रिय लगनेवाला जीवन बिताने लगे। इस प्रकार जब बहुत-सा समय व्यतीत हो गया, तब उन ब्राह्मणकी भार्या शुचिष्मती, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, अपने पतिसे बोली— 'प्राणनाथ ! स्त्रियोंके योग्य जितने आनन्दप्रद भोग हैं, उन सबको मैंने आपकी कृपासे आपके साथ रहकर भोग लिया; परंतु नाथ ! मेरे हृदयमें एक लालसा चिरकालसे वर्तमान है और वह गृहस्थोंके लिये उचित भी है, उसे आप पूर्ण करनेकी कृपा करें। स्वामिन् ! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ और आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे महेश्वर-सरीखा पुत्र प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त मैं दूसरा वर नहीं चाहती।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने ! पत्नीकी बात सुनकर पवित्र व्रतपरायण ब्राह्मण विश्वानर क्षणभरके लिये समाधिस्थ हो गये और हृदयमें यों विचार करने लगे—'अहो ! मेरी इस सूक्ष्मांगी पत्नीने कैसा अत्यन्त दुर्लभ वर माँगा है। यह तो मेरे मनोरथ-पथसे बहुत दूर है। अच्छा, शिवजी तो सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन शम्भुने ही इसके मुखमें बैठकर वाणीरूपसे ऐसी बात कही है, अन्यथा दूसरा कौन ऐसा करनेमें समर्थ हो सकता है। तदनन्तर वे एकपत्नीव्रती मुनि विश्वानर पत्नीको आश्वासन देकर वाराणसीमें गये और घोर तपके द्वारा भगवान् शिवके वीरेश लिंगकी आराधना करने लगे। इस प्रकार उन्होंने एक वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक उत्तम वीरेश लिंगकी त्रिकाल अर्चना करते हुए अद्भुत तप किया। तेरहवाँ मास आनेपर एक दिन वे द्विजवर प्रातःकाल त्रिपथगामिनी गंगाके जलमें स्नान करके ज्यों ही वीरेशके निकट पहुँचे, त्यों ही उन तपोधनको उस लिंगके मध्य एक अष्टवर्षीय विभूतिभूषित बालक दिखायी दिया। उस नग्न शिशुके नेत्र कानोंतक फैले हुए थे, होठोंपर गहरी लालिमा छायी हुई थी, मस्तकपर पीले रंगकी सुन्दर जटा सुशोभित थी और मुखपर हँसी खेल रही थी। वह शैशवोचित अलंकार और चिताभस्म धारण किये हुए था तथा अपनी लीलासे हँसता हुआ श्रुतिसूक्तोंका पाठ कर रहा था। उस बालकको देखकर विश्वानर मुनि कृतार्थ हो गये और आनन्दके कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा तथा बारंबार 'नमस्कार है, नमस्कार है' यों उनका हृदयोद्गार फूट पड़ा। फिर वे अभिलाषा पूर्ण करनेवाले आठ पद्योंद्वारा बालरूपधारी परमानन्दस्वरूप शम्भुका स्तवन करते हुए बोले।

विश्वानरने कहा—भगवान् ! आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं, यह सारा जगत् आपका ही स्वरूप है, यहाँ अनेक कुछ भी नहीं है। यह बिलकुल सत्य है कि एकमात्र रुद्रके अतिरिक्त दूसरे किसीकी सत्ता नहीं है, इसलिये मैं आप महेशकी शरण ग्रहण करता हूँ। शम्भो ! आप ही सबके कर्ता-हर्ता हैं, तथा जैसे आत्मधर्म एक होते हुए भी अनेक रूपसे दीखता है, उसी प्रकार आप भी एकरूप होकर नाना रूपोंमें व्याप्त हैं।

* शतरुद्रसंहिता * ४५५

फिर भी आप रूपरहित हैं। इसलिये आप ईश्वरके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेकी शरण नहीं ले सकता। जैसे रज्जुमें सर्प, सीपीमें चाँदी और मृगमरीचिकामें जलप्रवाहका भान मिथ्या है, उसी प्रकार, जिसे जान लेनेपर यह विश्वप्रपंच मिथ्या भासित होता है, उन महेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। शम्भो! जलमें जो शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें गरमी, चन्द्रमामें आह्लादकारिता, पुष्पमें गन्ध और दुग्धमें घी वर्तमान है, वह आपका ही स्वरूप है, अतः मैं आपके शरण हूँ। आप कानरहित होकर शब्द सुनते हैं; नासिकाविहीन होकर सूँघते हैं। पैर न होनेपर भी दूरतक चले जाते हैं, नेत्रहीन होकर सब कुछ देखते हैं और जिह्वारहित होकर भी समस्त रसोंके ज्ञाता हैं। भला, आपको सम्यक्-रूपसे कौन जान सकता है। इसलिये मैं आपकी शरणमें जाता हूँ। ईश! आपके रहस्यको न तो साक्षात् वेद ही जानता है न विष्णु, न अखिल विश्वके विधाता ब्रह्मा, न योगीन्द्र और न इन्द्र आदि प्रधान देवताओंको ही इसका पता है; परंतु आपका भक्त उसे जान लेता है, अतः मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। ईश ! न तो आपका कोई गोत्र है, न जन्म है, न नाम है न रूप है, न शील है और न देश है; ऐसा होनेपर भी आप त्रिलोकीके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, इसलिये मैं आपका भजन करता हूँ। स्मरारे! आप सर्वस्वरूप हैं, यह सारा विश्वप्रपंच आपसे ही प्रकट हुआ है। आप गौरीके प्राणनाथ, दिगम्बर और परम शान्त हैं। बाल, युवा और वृद्धरूपमें आप ही वर्तमान हैं। ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसमें आप व्याप्त न हों; अतः मैं आपके चरणोंमें नतमस्तक हूँ।*

नन्दीश्वर कहते हैं—मुने! यों स्तुति करके विप्रवर विश्वानर हाथ जोड़कर भूमिपर गिरना ही चाहते थे, तबतक सम्पूर्ण वृद्धोंके भी वृद्ध बालरूपधारी शिव परम हर्षित होकर उन भूदेवसे बोले।

बालरूपी शिवने कहा—मुनिश्रेष्ठ विश्वानर! तुमने आज मुझे संतुष्ट कर दिया है। भूदेव! मेरा मन परम प्रसन्न हो गया है, अतः अब तुम उत्तम वर माँग लो। यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वानर कृतकृत्य हो गये


* विश्वानर उवाच—
एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किंचित्। एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम्॥
कर्ता हर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूपः। यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेकस्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये॥
रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रौप्यं नरैः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ। यद्वत्तद्वद्विश्वमेष प्रपञ्चो यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम्॥
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः। पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पिर्यत्तच्छम्भो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रस्यघ्राणस्त्वं व्यङ्घ्रिरायासि दूरात्। व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो वेदस्त्वामीश साक्षाद्धि वेद नो वा विष्णुर्नों विधाताखिलस्य। नो योगीन्द्रा नेन्द्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या नो वा रूपं नैव शीलं न देशः। इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्॥
त्वतः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशान्तः। त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत् किं नास्यतस्त्वां नतोऽहम्॥
(शि० पु० शतरुद्रसंहिता १३। ४२—४९)

४५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

और उनका मन हर्षमग्न हो गया। तब वे उठकर बालरूपधारी शंकरजीसे बोले।

विश्वानरने कहा—प्रभावशाली महेश्वर! आप तो सर्वान्तर्यामी, ऐश्वर्यसम्पन्न, शर्व तथा भक्तोंको सब कुछ दे डालनेवाले हैं। भला, आप सर्वज्ञसे कौन-सी बात छिपी है। फिर भी आप मुझे दीनता प्रकट करनेवाली यांचाके प्रति आकृष्ट होनेके लिये क्यों कह रहे हैं। महेशान! ऐसा जानकर आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिये।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! पवित्र व्रतमें तत्पर विश्वानरके उस वचनको सुनकर पावन शिशुरूपधारी महादेव हँसकर शुचि (विश्वानर)-से बोले—'शुचे! तुमने अपने हृदयमें अपनी पत्नी शुचिष्मतीके प्रति जो अभिलाषा कर रखी है, वह निस्संदेह थोड़े ही समयमें पूर्ण हो जायगी। महामते! मैं शुचिष्मतीके गर्भसे तुम्हारा पुत्र होकर प्रकट होऊँगा। मेरा नाम गृहपति होगा। मैं परम पावन तथा समस्त देवताओंके लिये प्रिय होऊँगा। जो मनुष्य एक वर्षतक शिवजीके संनिकट तुम्हारे द्वारा कथित इस पुण्यमय अभिलाषाष्टक स्तोत्रका तीनों काल पाठ करेगा, उसकी सारी अभिलाषाएँ यह पूर्ण कर देगा। इस स्तोत्रका पाठ पुत्र, पौत्र और धनका प्रदाता, सर्वथा शान्तिकारक, सारी विपत्तियोंका विनाशक, स्वर्ग और मोक्षरूप सम्पत्तिका कर्ता तथा समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। निस्संदेह यह अकेला ही समस्त स्तोत्रोंके समान है।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इतना कहकर बालरूपधारी शम्भु, जो सत्पुरुषोंकी गति हैं, अन्तर्धान हो गये। तब विप्रवर विश्वानर भी प्रसन्न मनसे अपने घरको लौट गये। (अध्याय ८–१३)

~~ ० ~~

शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा बालकका संस्कार करके 'गृहपति' नाम रखा जाना, नारदजीद्वारा उसका भविष्य-कथन, पिताकी आज्ञासे गृहपतिका काशीमें जाकर तप करना, इन्द्रका वर देनेके लिये प्रकट होना, गृहपतिका उन्हें ठुकराना, शिवजीका प्रकट होकर उन्हें वरदान देकर दिक्पालपद प्रदान करना तथा अग्नीश्वरलिंग और अग्निका माहात्म्य

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! घर आकर उस ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ अपनी पत्नीसे वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर विप्रपत्नी शुचिष्मतीको महान् आनन्द प्राप्त हुआ। वह अत्यन्त प्रेमपूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करने लगी। तदनन्तर समय आनेपर ब्राह्मणद्वारा विधिपूर्वक गर्भाधान कर्म सम्पन्न किये जानेपर वह नारी गर्भवती हुई। फिर उन विद्वान् मुनिने गर्भके स्पन्दन करनेसे पूर्व ही पुंस्त्वकी वृद्धिके लिये गृह्यसूत्रमें वर्णित विधिके अनुसार सम्यक्-रूपसे पुंसवन-संस्कार किया। तत्पश्चात् आठवाँ महीना आनेपर कृपालु विश्वानरने सुखपूर्वक प्रसव

* शतरुद्रसंहिता * ४५७

होनेके अभिप्रायसे गर्भके रूपकी समृद्धि करनेवाला सीमन्त-संस्कार सम्पन्न कराया। तदुपरान्त ताराओंके अनुकूल होनेपर जब बृहस्पति केन्द्रवर्ती हुए और शुभ ग्रहोंका योग आया, तब शुभ लग्नमें भगवान् शंकर, जिनके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है तथा जो अरिष्टरूपी दीपकको बुझानेवाले, समस्त अरिष्टोंके विनाशक और भूः, भुवः, स्वः—तीनों लोकोंके निवासियोंको सब तरहसे सुख देनेवाले हैं, उस शुचिष्मतीके गर्भसे पुत्ररूपमें प्रकट हुए। उस समय गन्धको वहन करनेवाले वायुके वाहन मेघ दिशारूपी वधुओंके मुखपर वस्त्र-से बन गये अर्थात् चारों ओर काली घटा उमड़ आयी। वे घनघोर बादल उत्तम गन्धवाले पुष्पसमूहोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं। चारों ओर दिशाएँ निर्मल हो गयीं। प्राणियोंके मनोंके साथ-साथ सरिताओंका जल निर्मल हो गया। प्राणियोंकी वाणी सर्वथा कल्याणी और प्रियभाषिणी हो उठी। सम्पूर्ण प्रसिद्ध ऋषि-मुनि तथा देवता, यक्ष, किंनर, विद्याधर आदि मंगल द्रव्य ले-लेकर पधारे। स्वयं ब्रह्माजीने नम्रतापूर्वक उसका जातकर्म-संस्कार किया और उस बालकके रूप तथा वेदका विचार करके यह निश्चय किया कि इसका नाम गृहपति होना चाहिये। फिर ग्यारहवें दिन उन्होंने नामकरणकी विधिके अनुसार वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उसका 'गृहपति' ऐसा नामकरण किया। तत्पश्चात् सबके पितामह ब्रह्मा चारों वेदोंमें कथित आशीर्वादात्मक मन्त्रोंद्वारा उसका अभिनन्दन करके हंसपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये। तदुपरान्त शंकर भी लौकिकी गतिका आश्रय ले उस बालककी उचित रक्षाका विधान करके अपने वाहनपर चढ़कर अपने धामको पधार गये। इसी प्रकार श्रीहरिने भी अपने लोककी राह ली। इस प्रकार सभी देवता, ऋषि-मुनि आदि भी प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानको पधार गये। तदनन्तर ब्राह्मण देवताने यथासमय सब संस्कार करते हुए बालकको वेदाध्ययन कराया। तत्पश्चात् नवाँ वर्ष आनेपर माता-पिताकी सेवामें तत्पर रहनेवाले विश्वानर-नन्दन गृहपतिको देखनेके लिये वहाँ नारदजी पधारे। बालकने माता-पितासहित नारदजीको प्रणाम किया। फिर नारदजीने बालककी हस्तरेखा, जिह्वा, तालु आदि देखकर कहा—'मुनि विश्वानर ! मैं तुम्हारे पुत्रके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ, तुम आदरपूर्वक उसे श्रवण करो। तुम्हारा यह पुत्र परम भाग्यवान् है, इसके सम्पूर्ण अंगोंके लक्षण शुभ हैं। किंतु इसके सर्वगुणसम्पन्न, सम्पूर्ण शुभलक्षणोंसे समन्वित और चन्द्रमाके समान सम्पूर्ण निर्मल कलाओंसे सुशोभित होनेपर भी विधाता ही इसकी रक्षा करें। इसलिये सब तरहके उपायोंद्वारा इस शिशुकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि विधाताके विपरीत होनेपर गुण भी दोष हो जाता है। मुझे शंका है कि इसके बारहवें वर्षमें इसपर बिजली अथवा अग्निद्वारा विघ्न आयेगा।' यों कहकर नारदजी जैसे आये थे, वैसे ही देवलोकको चले गये।

सनत्कुमारजी ! नारदजीका कथन सुनकर पत्नीसहित विश्वानरने समझ लिया कि यह तो बड़ा भयंकर वज्रपात हुआ। फिर वे 'हाय ! मैं मारा गया' यों कहकर छाती पीटने लगे और पुत्रशोकसे व्याकुल होकर

४५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गहरी मूर्च्छाके वशीभूत हो गये। उधर शुचिष्मती भी दुःखसे पीड़ित हो अत्यन्त ऊँचे स्वरसे हाहाकार करती हुई ढाढ़ मारकर रो पड़ी, उसकी सारी इन्द्रियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं। तब पत्नीके आर्तनादको सुनकर विश्वानर भी मूर्च्छा त्यागकर उठ बैठे और 'ऐं! यह क्या है? क्या हुआ?' यों उच्चस्वरसे बोलते हुए कहने लगे—'गृहपति! जो मेरा बाहर विचरनेवाला प्राण, मेरी सारी इन्द्रियोंका स्वामी तथा मेरे अन्तरात्मामें निवास करनेवाला है, कहाँ है?' तब माता-पिताको इस प्रकार अत्यन्त शोकग्रस्त देखकर शंकरके अंशसे उत्पन्न हुआ वह बालक गृहपति मुसकराकर बोला।

गृहपतिने कहा—माताजी तथा पिताजी! बताइये इस समय आपलोगोंके रोनेका क्या कारण है? किसलिये आपलोग फूट-फूटकर रो रहे हैं? कहाँसे ऐसा भय आपलोगोंको प्राप्त हुआ है? यदि मैं आपकी चरणरेणुओंसे अपने शरीरकी रक्षा कर लूँ तो मुझपर काल भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकता; फिर इस तुच्छ, चंचल एवं अल्प बलवाली मृत्युकी तो बात ही क्या है। माता-पिताजी! अब आपलोग मेरी प्रतिज्ञा सुनिये—'यदि मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ तो ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे मृत्यु भी भयभीत हो जायगी। मैं सत्पुरुषोंको सब कुछ दे डालनेवाले सर्वज्ञ मृत्युंजयकी भलीभाँति आराधना करके महाकालको भी जीत लूँगा—यह मैं आप लोगोंसे बिलकुल सत्य कह रहा हूँ।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! तब वे द्विजदम्पति, जो शोकसे संतप्त हो रहे थे, गृहपतिके ऐसे वचन, जो अकालमें हुई अमृतकी घनघोर वृष्टिके समान थे, सुनकर संतापरहित हो कहने लगे—'बेटा! तू उन शिवकी शरणमें जा, जो ब्रह्मा आदिके भी कर्ता, मेघवाहन, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले और विश्वकी रक्षामणि हैं।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! माता-पिताकी आज्ञा पाकर गृहपतिने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर उनकी प्रदक्षिणा करके और उन्हें बहुत तरहसे आश्वासन दे वे वहाँसे चल पड़े और उस काशीपुरीमें जा पहुँचे, जो ब्रह्मा और नारायण आदि देवोंके लिये ( भी ) दुष्प्राप्य, महाप्रलयके संतापका विनाश करनेवाली और विश्वनाथद्वारा सुरक्षित थी तथा जो कण्ठप्रदेशमें हारकी तरह पड़ी हुई गंगासे सुशोभित तथा विचित्र गुणशालिनी हरपत्नी गिरिजासे विभूषित थी। वहाँ पहुँचकर वे विप्रवर पहले मणिकर्णिकापर गये। वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् विश्वनाथका दर्शन किया। फिर बुद्धिमान् गृहपतिने परमानन्दमग्न हो त्रिलोकीके प्राणियोंकी प्राणरक्षा करनेवाले शिवको प्रणाम किया। उस समय उनकी अंजलि बँधी थी और सिर झुका हुआ था। वे बारंबार उस शिवलिंगकी ओर देखकर हृदयमें हर्षित हो रहे थे ( और यह सोच रहे थे कि ) यह लिंग निस्संदेह स्पष्टरूपसे आनन्दकन्द ही है। ( वे कहने लगे— ) अहो! आज मुझे जो सर्वव्यापी श्रीमान् विश्वनाथका दर्शन प्राप्त हुआ, इसलिये इस चराचर त्रिलोकीमें मुझसे बढ़कर धन्यवादका पात्र दूसरा कोई नहीं है। जान पड़ता है, मेरा भाग्योदय होनेसे ही उन दिनोंमें

* शतरुद्रसंहिता * ४५९

महर्षि नारदने आकर वैसी बात कही थी, जिसके कारण आज मैं कृतकृत्य हो रहा हूँ।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने ! इस प्रकार आनन्दामृतरूपी रसोंद्वारा पारण करके गृहपतिने शुभ दिनमें सर्वहितकारी शिवलिंगकी स्थापना की और पवित्र गंगाजलसे भरे हुए एक सौ आठ कलशोंद्वारा शिवजीको स्नान कराकर ऐसे घोर नियमोंको स्वीकार किया, जो अकृतात्मा पुरुषोंके लिये दुष्कर थे। नारदजी! इस प्रकार एकमात्र शिवमें मन लगाकर तपस्या करते हुए उस महात्मा गृहपतिकी आयुका एक वर्ष व्यतीत हो गया। तब जन्मसे बारहवाँ वर्ष आनेपर नारदजीके कहे हुए उस वचनको सत्य-सा करते हुए वज्रधारी इन्द्र उनके निकट पधारे और बोले—'विप्रवर! मैं इन्द्र हूँ और तुम्हारे शुभ व्रतसे प्रसन्न होकर आया हूँ। अब तुम वर माँगो, मैं तुम्हारी मनोवांछा पूर्ण कर दूँगा।'

तब गृहपतिने कहा—मघवन् ! मैं जानता हूँ, आप वज्रधारी इन्द्र हैं; परंतु वृत्रशत्रो ! मैं आपसे वर याचना करना नहीं चाहता, मेरे वरदायक तो शंकरजी ही होंगे।

इन्द्र बोले—शिशो ! शंकर मुझसे भिन्न थोड़े ही हैं। अरे ! मैं देवराज हूँ, अतः तुम अपनी मूर्खताका परित्याग करके वर माँग लो, देर मत करो।

गृहपतिने कहा—पाकशासन! आप अहल्याका सतीत्व नष्ट करनेवाले दुराचारी पर्वतशत्रु ही हैं न। आप जाइये; क्योंकि मैं पशुपतिके अतिरिक्त किसी अन्य देवके सामने स्पष्टरूपसे प्रार्थना करना नहीं चाहता।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! गृहपतिके उस वचनको सुनकर इन्द्रके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। वे अपने भयंकर वज्रको उठाकर उस बालकको डराने-धमकाने लगे। तब बिजलीकी ज्वालाओंसे व्याप्त उस वज्रको देखकर बालक गृहपतिको नारदजीके वाक्य स्मरण हो आये। फिर तो वे भयसे व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गये। तदनन्तर अज्ञानान्धकारको दूर भगानेवाले गौरीपति शम्भु वहाँ प्रकट हो गये और अपने हस्तस्पर्शसे उसे जीवनदान देते हुए-से बोले—'वत्स ! उठ, उठ। तेरा कल्याण हो।' तब रात्रिके समय मूँदे हुए कमलकी तरह उसके नेत्रकमल खुल गये और उसने उठकर अपने सामने सैकड़ों सूर्योंसे भी अधिक प्रकाशमान शम्भुको उपस्थित देखा। उनके ललाटमें तीसरा नेत्र चमक रहा था, गलेमें नीला चिह्न था, ध्वजापर वृषभका स्वरूप दीख रहा था, वामांगमें गिरिजादेवी विराजमान थीं। मस्तकपर चन्द्रमा सुशोभित था। बड़ी-बड़ी जटाओंसे उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी। वे अपने आयुध त्रिशूल और आजगव धनुष धारण किये हुए थे। कपूरके समान गौरवर्णका शरीर अपनी प्रभा बिखेर रहा था, वे गजचर्म लपेटे हुए थे। उन्हें देखकर शास्त्रकथित लक्षणों तथा गुरु-वचनोंसे जब गृहपतिने समझ लिया कि ये महादेव ही हैं, तब हर्षके मारे उनके नेत्रोंमें आँसू छलक आये, गला रुँध गया और शरीर रोमांचित हो उठा। वे क्षणभरतक अपने-आपको भूलकर चित्रकूट एवं त्रिपुत्रक पर्वतकी भाँति निश्चल खड़े रह गये। जब वे स्तवन करने, नमस्कार करने अथवा कुछ भी

४६० * संक्षिप्त शिवपुराण *

कहनेमें समर्थ न हो सके, तब शिवजी मुसकराकर बोले।

ईश्वरने कहा—गृहपते! जान पड़ता है, तुम वज्रधारी इन्द्रसे डर गये हो। वत्स! तुम भयभीत मत होओ; क्योंकि मेरे भक्तपर इन्द्र और वज्रकी कौन कहे, यमराज भी अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। यह तो मैंने तुम्हारी परीक्षा ली है और मैंने ही तुम्हें इन्द्ररूप धारण करके डराया है। भद्र! अब मैं तुम्हें वर देता हूँ—आजसे तुम अग्निपदके भागी होओगे। तुम समस्त देवताओंके लिये वरदाता बनोगे। अग्ने! तुम समस्त प्राणियोंके अंदर जठराग्निरूपसे विचरण करोगे। तुम्हें दिक्पालरूपसे धर्मराज और इन्द्रके मध्यमें राज्यकी प्राप्ति होगी। तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग तुम्हारे नामपर 'अग्नीश्वर' नामसे प्रसिद्ध होगा। यह सब प्रकारके तेजोंकी वृद्धि करनेवाला होगा। जो लोग इस अग्नीश्वर-लिंगके भक्त होंगे, उन्हें बिजली और अग्निका भय नहीं रह जायगा, अग्निमान्द्य नामक रोग नहीं होगा और न कभी उनकी अकालमृत्यु ही होगी। काशीपुरीमें स्थित सम्पूर्ण समृद्धियोंके प्रदाता अग्नीश्वरकी भलीभाँति अर्चना करनेवाला भक्त यदि प्रारब्धवश किसी अन्य स्थानमें भी मृत्युको प्राप्त होगा तो भी वह वह्निलोकमें प्रतिष्ठित होगा।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! यों कहकर शिवजीने गृहपतिके बन्धुओंको बुलाकर उनके माता-पिताके सामने उस अग्निका दिक्पतिपदपर अभिषेक कर दिया और स्वयं उसी लिंगमें समा गये। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमात्मा शंकरके गृहपति नामक अग्न्यवतारका, जो दुष्टोंको पीड़ित करनेवाला है, वर्णन कर दिया। जो सुदृढ़ पराक्रमी जितेन्द्रिय पुरुष अथवा सत्त्वसम्पन्न स्त्रियाँ अग्निप्रवेश कर जाती हैं, वे सब-के-सब अग्निसरीखे तेजस्वी होते हैं। इसी प्रकार जो ब्राह्मण अग्निहोत्र-परायण, ब्रह्मचारी तथा पंचाग्निका सेवन करनेवाले हैं, वे अग्निके समान वर्चस्वी होकर अग्निलोकमें विचरते हैं। जो शीतकालमें शीतनिवारणके निमित्त बोझ-की-बोझ लकड़ियाँ दान करता है अथवा जो अग्निकी इष्टि करता है, वह अग्निके संनिकट निवास करता है। जो श्रद्धापूर्वक किसी अनाथ मृतकका अग्निसंस्कार कर देता है अथवा स्वयं शक्ति न होनेपर दूसरेको प्रेरित करता है, वह अग्निलोकमें प्रशंसित होता है। द्विजातियोंके लिये परम कल्याणकारक एक अग्नि ही है। वही निश्चितरूपसे गुरु, देवता, व्रत, तीर्थ अर्थात् सब कुछ है। जितनी अपावन वस्तुएँ हैं, वे सब अग्निका संसर्ग

* शतरुद्रसंहिता * ४६१

होनेसे उसी क्षण पावन हो जाती हैं; इसलिये अग्निको पावक कहा जाता है। यह शम्भुकी प्रत्यक्ष तेजोमयी दहनात्मिका मूर्ति है, जो सृष्टि रचनेवाली, पालन करनेवाली और संहार करनेवाली है। भला, इसके बिना कौन-सी वस्तु दृष्टिगोचर हो सकती है। इनके द्वारा भक्षण किये हुए धूप, दीप, नैवेद्य, दूध, दही, घी और खाँड़ आदिका देवगण स्वर्गमें सेवन करते हैं। (अध्याय १४-१५)


शिवजीके महाकाल आदि दस अवतारोंका तथा ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन

तदनन्तर यक्षेश्वरावतारकी बात कहकर नन्दीश्वरने कहा—मुने! अब शंकरजीके उपासनाकाण्डद्वारा सेवित महाकाल आदि दस अवतारोंका वर्णन भक्तिपूर्वक श्रवण करो। उनमें पहला अवतार 'महाकाल' नामसे प्रसिद्ध है, जो सत्पुरुषोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। उस अवतारकी शक्ति भक्तोंकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाली महाकाली हैं। दूसरा 'तार' नामक अवतार हुआ, जिसकी शक्ति तारादेवी हुईं। वे दोनों भुक्ति-मुक्तिके प्रदाता तथा अपने सेवकोंके लिये सुखदायक हैं। 'बाल भुवनेश' नामसे तीसरा अवतार हुआ। उसमें बाला भुवनेशी शिवा शक्ति हुईं, जो सज्जनोंको सुख देनेवाली हैं। चौथा भक्तोंके लिये सुखद तथा भोग-मोक्षप्रदायक 'षोडश श्रीविद्येश' नामक अवतार हुआ और षोडशी श्रीविद्या शिवा उसकी शक्ति हुईं। पाँचवाँ अवतार 'भैरव' नामसे प्रसिद्ध हुआ, जो सर्वदा भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इस अवतारकी शक्तिका नाम है भैरवी गिरिजा, जो अपने उपासकोंकी अभीष्ट-दायिनी हैं। छठा शिवावतार 'छिन्नमस्तक' नामसे कहा जाता है और भक्तकामप्रदा गिरिजाका नाम छिन्नमस्ता है। सम्पूर्ण मनोरथोंके दाता शम्भुका सातवाँ अवतार 'धूमवान्' नामसे विख्यात हुआ। उस अवतारमें श्रेष्ठ उपासकोंकी लालसा पूर्ण करनेवाली शिवा धूमावती हुईं। शिवजीका आठवाँ सुखदायक अवतार 'बगलामुख' है। उसकी शक्ति महान् आनन्ददायिनी बगलामुखी नामसे विख्यात हुईं। नवाँ शिवावतार 'मातंग' नामसे कहा जाता है। उस समय सम्पूर्ण अभिलाषाओंको पूर्ण करनेवाली शर्वाणी मातंगी हुईं। शम्भुके भुक्ति-मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले दसवें अवतारका नाम 'कमल' है, जिसमें अपने भक्तोंका सर्वथा पालन करनेवाली गिरिजा कमला कहलायीं। ये ही शिवजीके दस अवतार हैं। ये सब-के-सब भक्तों तथा सत्पुरुषोंके लिये सुखदायक तथा भोग-मोक्षके प्रदाता हैं। जो लोग महात्मा शंकरके इन दसों अवतारोंकी निर्विकारभावसे सेवा करते हैं, उन्हें ये नित्य नाना प्रकारके सुख देते रहते हैं। मुने! इस प्रकार मैंने दसों अवतारोंका माहात्म्य वर्णन कर दिया। तन्त्रशास्त्रमें तो यह सर्वकामप्रद बतलाया गया है। मुने! इन शक्तियोंकी भी अद्भुत महिमा है। तन्त्र आदि शास्त्रोंमें इस महिमाका सर्वकामप्रदरूपसे वर्णन किया गया है। ये नित्य दुष्टोंको दण्ड देनेवाली और ब्रह्मतेजकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाली

४६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुमसे महेश्वरके महाकाल आदि दस शुभ अवतारोंका शक्तिसहित वर्णन कर दिया। जो मनुष्य समस्त शिवपर्वोंके अवसरपर इस परम पावन कथाका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह शिवजीका परम प्यारा हो जाता है। (इस आख्यानका पाठ करनेसे) ब्राह्मणके ब्रह्मतेजकी वृद्धि होती है, क्षत्रिय विजय लाभ करता है, वैश्य धनपति हो जाता है और शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। स्वधर्मपरायण शिवभक्तोंको यह चरित सुननेसे सुख प्राप्त होता है और उनकी शिवभक्ति विशेषरूपसे बढ़ जाती है।

मुने! अब मैं शंकरजीके एकादश श्रेष्ठ अवतारोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। उन्हें श्रवण करनेसे असत्यादिजनित बाधा पीड़ा नहीं पहुँचा सकती। पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्र आदि समस्त देवता दैत्योंसे पराजित हो गये। तब वे भयभीत हो अपनी पुरी अमरावतीको छोड़कर भाग खड़े हुए। यों दैत्योंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सभी देवता कश्यपजीके पास गये। वहाँ उन्होंने परम व्याकुलतापूर्वक हाथ जोड़ एवं मस्तक झुकाकर उनके चरणोंमें अभिवादन किया और उनका भलीभाँति स्तवन करके आदरपूर्वक अपने आनेका कारण प्रकट किया तथा दैत्योंद्वारा पराजित होनेसे उत्पन्न हुए अपने सारे दुःखोंको कह सुनाया। तात! तब उनके पिता कश्यपजी देवताओंकी उस कष्ट-कहानीको सुनकर अधिक दुःखी नहीं हुए; क्योंकि उनकी बुद्धि शिवजीमें आसक्त थी। मुने! उन शान्तबुद्धि मुनिने धैर्य धारण करके देवताओंको आश्वासन दिया और स्वयं परम हर्षपूर्वक विश्वनाथपुरी काशीको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गंगाजीके जलमें स्नान करके अपना नित्य-नियम पूरा किया और फिर आदरपूर्वक उमासहित सर्वेश्वर भगवान् विश्वनाथकी भलीभाँति अर्चना की। तदनन्तर शम्भुदर्शनके उद्देश्यसे एक शिवलिंगकी स्थापना करके वे देवताओंके हितार्थ परम प्रसन्नतापूर्वक घोर तप करने लगे। मुने! शिवजीके चरणकमलोंमें आसक्त मनवाले धैर्यशाली मुनिवर कश्यपको जब यों तप करते हुए बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया, तब सत्पुरुषोंके गतिस्वरूप भगवान् शंकर अपने चरणोंमें तल्लीन मनवाले कश्यप ऋषिको वर देनेके लिये वहाँ प्रकट हुए। भक्तवत्सल महेश्वर परम प्रसन्न तो थे ही, अतः वे अपने भक्त मुनिवर कश्यपसे बोले—'वर माँगो।' उन महेश्वरको देखते ही प्रसन्न बुद्धिवाले देवताओंके पिता कश्यपजी हर्षमग्न हो गये और हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें नमस्कार करके स्तुति करते हुए यों बोले—'महेश्वर! मैं सर्वथा आपका शरणागत हूँ। स्वामिन्! देवताओंके दुःखका विनाश करके मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। देवेश! मैं पुत्रोंके दुःखसे विशेष दुःखी हूँ, अतः ईश! मुझे सुखी कीजिये; क्योंकि आप देवताओंके सहायक हैं। नाथ! महाबली दैत्योंने देवताओं और यक्षोंको पराजित कर दिया है, इसलिये शम्भो! आप मेरे पुत्ररूपसे प्रकट होकर देवताओंके लिये आनन्ददाता बनिये।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! कश्यपजीके ऐसा कहनेपर सर्वेश्वर भगवान् शंकर उनसे 'तथेति—ऐसा ही होगा' यों कहकर उनके सामने वहीं अन्तर्धान हो गये।

* शतरुद्रसंहिता * ४६३

तब कश्यप भी महान् आनन्दके साथ तुरंत ही अपने स्थानको लौट गये। वहाँ उन्होंने वह सारा वृत्तान्त आदरपूर्वक देवताओंसे कह सुनाया। तदनन्तर भगवान् शंकर अपना वचन सत्य करनेके लिये कश्यपद्वारा सुरभीके पेटसे ग्यारह रूप धारण करके प्रकट हुए। उस समय महान् उत्सव मनाया गया। सारा जगत् शिवममय हो गया। कश्यपमुनिके साथ-साथ सभी देवता हर्षविभोर हो गये। उनके नाम रखे गये—कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड तथा भव। ये ग्यारहों रुद्र सुरभीके पुत्र कहलाते हैं। ये सुखके आवासस्थान हैं तथा देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये शिवरूपसे उत्पन्न हुए। ये कश्यपनन्दन वीरवर रुद्र महान् बल-पराक्रमसम्पन्न थे; इन्होंने संग्राममें देवताओंकी सहायता करके दैत्योंका संहार कर डाला। इन्हीं रुद्रोंकी कृपासे इन्द्र आदि देवगण दैत्योंको जीतकर निर्भय हो गये। उनका मन स्वस्थ हो गया और वे अपना-अपना राज्य-कार्य सँभालने लगे। अब भी शिव-स्वरूपधारी वे सभी महारुद्र देवताओंकी रक्षाके लिये सदा स्वर्गमें विराजमान रहते हैं। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे शंकरजीके ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन कर दिया। ये सभी समस्त लोकोंके लिये सुखदायक हैं। यह निर्मल आख्यान सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, धन, यश और आयुका प्रदाता तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। (अध्याय १६—१८)

~~ ० ~~

शिवजीके 'दुर्वासावतार' तथा 'हनुमदवतार' का वर्णन

नन्दीश्वरजी कहते हैं—महामुने! अब तुम शम्भुके एक दूसरे चरितको, जिसमें शंकरजी धर्मके लिये दुर्वासा होकर प्रकट हुए थे, प्रेमपूर्वक श्रवण करो। अनसूयाके पति ब्रह्मवेत्ता तपस्वी अत्रिने ब्रह्माजीके निर्देशानुसार पत्नीसहित ऋक्षकुल पर्वतपर जाकर पुत्रकामनासे घोर तप किया। उनके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों उनके आश्रमपर गये। उन्होंने कहा कि 'हम तीनों संसारके ईश्वर हैं। हमारे अंशसे तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकीमें विख्यात तथा माता-पिताका यश बढ़ानेवाले होंगे।' यों कहकर वे चले गये। ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा हुए, जो देवताओंके समुद्रमें डाले जानेपर समुद्रसे प्रकट हुए थे। विष्णुके अंशसे श्रेष्ठ संन्यास-पद्धतिको प्रचलित करनेवाले 'दत्त' उत्पन्न हुए और रुद्रके अंशसे मुनिवर दुर्वासाने जन्म लिया।

इन दुर्वासाने महाराज अम्बरीषकी परीक्षा की थी। जब सुदर्शनचक्रने इनका पीछा किया, तब शिवजीके आदेशसे अम्बरीषके द्वारा प्रार्थना करनेपर चक्र शान्त हुआ। इन्होंने भगवान् रामकी परीक्षा की। कालने मुनिका वेष धारण करके श्रीरामके साथ यह शर्त की थी कि 'मेरे साथ बात करते समय श्रीरामके पास कोई न आये; जो आयेगा उसका निर्वासन कर दिया जायगा।' दुर्वासाजीने हठ करके लक्ष्मणको भेजा, तब श्रीरामने तुरंत लक्ष्मणका त्याग कर दिया। इन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी

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* शतरुद्रसंहिता * \hfill ४६५

‘रामदूत’ नामसे विख्यात, दैत्योंके संहारक और भक्तवत्सल हैं। तात! इस प्रकार मैंने हनुमान्‌जीका श्रेष्ठ चरित—जो धन, कीर्ति और आयुका वर्धक तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंका दाता है—तुमसे वर्णन कर दिया। जो मनुष्य इस चरितको भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा समाहित चित्तसे दूसरेको सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको भोगकर अन्तमें परम मोक्षको प्राप्त कर लेता है।
\hfill (अध्याय १९-२०)

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शिवजीके पिप्पलाद-अवतारके प्रसंगमें देवताओंकी दधीचि मुनिसे अस्थि-याचना, दधीचिका शरीरत्याग, वज्र-निर्माण तथा उसके द्वारा वृत्रासुरका वध, सुवर्चाका देवताओंको शाप, पिप्पलादका जन्म और उनका विस्तृत वृत्तान्त

तदनन्तर महेशावतार तथा वृषेषावतारका चरित सुनाकर नन्दीश्वरने कहा—महाबुद्धिमान् सनत्कुमारजी! अब तुम अत्यन्त आह्लादपूर्वक महेश्वरके ‘पिप्पलाद’ नामक परमोत्कृष्ट अवतारका वर्णन श्रवण करो। यह उत्तम आख्यान भक्तिकी वृद्धि करनेवाला है। मुनीश्वर! एक समय दैत्योंने वृत्रासुरकी सहायतासे इन्द्र आदि समस्त देवताओंको पराजित कर दिया। तब उन सभी देवताओंने सहसा दधीचिके आश्रममें अपने-अपने अस्त्रोंको फेंककर तत्काल ही हार मान ली। तत्पश्चात् मारे जाते हुए वे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तथा देवर्षि शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे और वहाँ (ब्रह्माजीसे) उन्होंने अपना वह दुखड़ा कह सुनाया। देवताओंका वह कथन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने सारा रहस्य यथार्थरूपसे प्रकट कर दिया कि ‘यह सब त्वष्टाकी करतूत है, त्वष्टाने ही तुमलोगोंका वध करनेके लिये तपस्याद्वारा इस महातेजस्वी वृत्रासुरको उत्पन्न किया है। यह दैत्य महान् आत्मबलसे सम्पन्न तथा समस्त दैत्योंका अधिपति है। अतः अब ऐसा प्रयत्न करो जिससे इसका वध हो सके। बुद्धिमान् देवराज! मैं धर्मके कारण इस विषयमें एक उपाय बतलाता हूँ, सुनो। जो दधीचि नामवाले महामुनि हैं, वे तपस्वी और जितेन्द्रिय हैं। उन्होंने पूर्वकालमें शिवजीकी समाराधना करके वज्र-सरीखी अस्थियाँ हो जानेका वर प्राप्त किया है। अतः तुमलोग उनसे उनकी हड्डियोंके लिये याचना करो। वे अवश्य दे देंगे। फिर उन अस्थियोंसे वज्रदण्डका निर्माण करके तुम निश्चय ही उससे वृत्रासुरको मार डालना।’

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! ब्रह्माका यह वचन सुनकर इन्द्र देवगुरु बृहस्पति तथा देवताओंको साथ ले तुरंत ही दधीचि ऋषिके उत्तम आश्रमपर आये। वहाँ इन्द्रने सुवर्चासहित दधीचि मुनिका दर्शन किया और आदरपूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया; फिर देवगुरु बृहस्पति तथा अन्य देवताओंने भी नम्रतापूर्वक उन्हें सिर झुकाया। दधीचि मुनि विद्वानोंमें श्रेष्ठ तो थे ही, वे तुरंत ही उसके अभिप्रायको ताड़

४६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *


गये। तब उन्होंने अपनी पत्नी सुवर्चाको अपने आश्रमसे अन्यत्र भेज दिया। तत्पश्चात् देवताओंसहित देवराज इन्द्र, जो स्वार्थ-साधनमें बड़े दक्ष हैं, अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर मुनिवरसे बोले।

इन्द्रने कहा—‘मुने! आप महान् शिवभक्त, दाता तथा शरणागतरक्षक हैं; इसीलिये हम सभी देवता तथा देवर्षि त्वष्टाद्वारा अपमानित होनेके कारण आपकी शरणमें आये हैं। विप्रवर! आप अपनी वज्रमयी अस्थियाँ हमें प्रदान कीजिये; क्योंकि आपकी हड्डीसे वज्रका निर्माण करके मैं उस देवद्रोहीका वध करूँगा।’ इन्द्रके यों कहनेपर परोपकार-परायण दधीचि मुनिने अपने स्वामी शिवका ध्यान करके अपना शरीर छोड़ दिया। उनके समस्त बन्धन नष्ट हो चुके थे, अतः वे तुरंत ही ब्रह्मलोकको चले गये। उस समय वहाँ पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर इन्द्रने शीघ्र ही सुरभि गौको बुलाकर उस शरीरको चटवाया और उन हड्डियोंसे अस्त्र-निर्माण करनेके लिये विश्वकर्माको आदेश दिया। तब इन्द्रकी आज्ञा पाकर विश्वकर्माने शिवजीके तेजसे सुदृढ़ हुई मुनिकी वज्रमयी हड्डियोंसे सम्पूर्ण अस्त्रोंकी कल्पना की। उनके रीढ़की हड्डीसे वज्र और ब्रह्मशिर नामक बाण बनाया तथा अन्य अस्थियोंसे अन्यान्य बहुत-से अस्त्रोंका निर्माण किया। तब शिवजीके तेजसे उत्कर्षको प्राप्त हुए इन्द्रने उस वज्रको लेकर क्रोधपूर्वक वृत्रासुरपर आक्रमण किया, ठीक उसी तरह जैसे रुद्रने यमराजपर धावा किया था। फिर तो कवच आदिसे भलीभाँति सुरक्षित हुए इन्द्रने तुरंत ही पराक्रम प्रकट करके उस वज्रद्वारा वृत्रासुरके पर्वतशिखर-सरीखे सिरको काट गिराया। तात! उस समय स्वर्गवासियोंने महान् विजयोत्सव मनाया, इन्द्रपर पुष्पोंकी वृष्टि होने लगी और सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर महान् आत्मबलसे सम्पन्न दधीचि मुनिकी पतिव्रता पत्नी सुवर्चा पतिके आज्ञानुसार अपने आश्रमके भीतर गयी। वहाँ देवताओंके लिये पतिको मरा हुआ जानकर वह देवताओंको शाप देते हुए बोली।

सुवर्चाने कहा—‘अहो! इन्द्रसहित ये सभी देवता बड़े दुष्ट हैं और अपना कार्य सिद्ध करनेमें निपुण, मूर्ख तथा लोभी हैं; इसलिये ये सब-के-सब आजसे मेरे शापसे पशु हो जायँ।’ इस प्रकार उस तपस्वी मुनिपत्नी सुवर्चाने उन इन्द्र आदि समस्त देवताओंको शाप दे दिया। तत्पश्चात् उस पतिव्रताने पतिलोकमें जानेका विचार किया। फिर तो मनस्विनी सुवर्चाने परम पवित्र लकड़ियोंद्वारा एक चिता तैयार की। उसी समय शंकरजीकी प्रेरणासे सुखदायिनी आकाशवाणी हुई, वह उस मुनिपत्नी सुवर्चाको आश्वासन देती हुई बोली।

आकाशवाणीने कहा—प्राज्ञे! ऐसा साहस मत करो, मेरी उत्तम बात सुनो। देवि! तुम्हारे उदरमें मुनिका तेज वर्तमान है, तुम उसे यत्नपूर्वक उत्पन्न करो। पीछे तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करना; क्योंकि शास्त्रका ऐसा आदेश है कि गर्भवतीको अपना शरीर नहीं जलाना चाहिये अर्थात् सती नहीं होना चाहिये।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुनीश्वर! यों कहकर वह आकाशवाणी उपराम हो गयी।

* शतरुद्रसंहिता *
४६७

उसे सुनकर वह मुनिपत्नी क्षणभरके लिये विस्मयमें पड़ गयी। परंतु उस सती-साध्वी सुवर्चाको तो पतिलोककी प्राप्ति ही अभीष्ट थी, अतः उसने बैठकर पत्थरसे अपने उदरको विदीर्ण कर डाला। तब उसके पेटसे मुनिवर दधीचिका वह गर्भ बाहर निकल आया। उसका शरीर परम दिव्य और प्रकाशमान था तथा वह अपनी प्रभासे दसों दिशाओंको उद्भासित कर रहा था। तात! दधीचिके उत्तम तेजसे प्रादुर्भूत हुआ वह गर्भ अपनी लीला करनेमें समर्थ साक्षात् रुद्रका अवतार था। मुनिप्रिया सुवर्चाने दिव्यस्वरूपधारी अपने उस पुत्रको देखकर मन-ही-मन समझ लिया कि यह रुद्रका अवतार है। फिर तो वह महासाध्वी परमानन्दमग्न हो गयी और शीघ्र ही उसे नमस्कार करके उसकी स्तुति करने लगी। मुनीश्वर! उसने उस स्वरूपको अपने हृदयमें धारण कर लिया। तदनन्तर पतिलोककी कामनावाली विमलेक्षणा माता सुवर्चा मुसकराकर अपने उस पुत्रसे परम स्नेहपूर्वक बोली।

सुवर्चाने कहा—तात परमेशान! तुम इस अश्वत्थ वृक्षके निकट चिरकालतक स्थित रहो। महाभाग! तुम समस्त प्राणियोंके लिये सुखदाता होओ और अब मुझे प्रेमपूर्वक पतिलोकमें जानेके लिये आज्ञा दो। वहाँ पतिके साथ रहती हुई मैं रुद्ररूपधारी तुम्हारा ध्यान करती रहूँगी।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! साध्वी सुवर्चाने अपने पुत्रसे यों कहकर परम समाधिद्वारा पतिका ही अनुगमन किया। मुनिवर! इस प्रकार दधीचिपत्नी सुवर्चा शिवलोकमें पहुँचकर अपने पतिसे जा मिली और आनन्दपूर्वक शंकरजीकी सेवा करने लगी। तात! इतनेमें ही हर्षमें भरे हुए इन्द्रसहित समस्त देवता मुनियोंके साथ आमन्त्रित हुएकी तरह शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचे। तब प्रसन्न बुद्धिवाले ब्रह्माने उस बालकका नाम पिप्पलाद रखा। फिर सभी देवता महोत्सव मनाकर अपने-अपने धामको चले गये। तदनन्तर महान् ऐश्वर्यशाली रुद्रावतार पिप्पलाद उसी अश्वत्थके नीचे लोकोंकी हितकामनासे चिरकालिक तपमें प्रवृत्त हुए। लोकाचारका अनुसरण करनेवाले पिप्पलादका यों तपस्या करते हुए बहुत बड़ा समय व्यतीत हो गया।

तदनन्तर पिप्पलादने राजा अनरण्यकी कन्या पद्मासे विवाह करके तरुण हो उसके साथ विलास किया। उन मुनिके दस पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब पिताके ही समान महात्मा और उग्र तपस्वी थे। वे अपनी माता पद्माके सुखकी वृद्धि करनेवाले हुए। इस प्रकार महाप्रभु शंकरके लीलावतार मुनिवर पिप्पलादने महान् ऐश्वर्यशाली तथा नाना प्रकारकी लीलाएँ कीं। उन कृपालुने जगत्में शनैश्चरकी पीड़ाको, जिसका निवारण करना सबकी शक्तिके बाहर था, देखकर लोगोंको प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान दिया कि 'जन्मसे लेकर सोलह वर्षतककी आयुवाले मनुष्योंको तथा शिवभक्तोंको शनिकी पीड़ा नहीं हो सकती। यह मेरा वचन सर्वथा सत्य है। यदि कहीं शनि मेरे वचनका अनादर करके उन मनुष्योंको पीड़ा पहुँचायेगा तो वह निस्सन्देह भस्म हो जायगा।' तात! इसीलिये उस भयसे भीत हुआ ग्रहश्रेष्ठ शनैश्चर विकृत होनेपर भी वैसे मनुष्योंको कभी पीड़ा नहीं पहुँचाता। मुनिवर! इस प्रकार

४६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

मैंने लीलासे मनुष्यरूप धारण करनेवाले पिप्पलादका उत्तम चरित तुम्हें सुना दिया, यह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। गाधि, कौशिक और महामुनि पिप्पलाद—ये तीनों स्मरण किये जानेपर शनैश्चरजनित पीड़ाका नाश कर देते हैं। वे मुनिवर दधीचि, जो परम ज्ञानी, सत्पुरुषोंके प्रिय तथा महान् शिवभक्त थे, धन्य हैं, जिनके यहाँ स्वयं आत्मज्ञानी महेश्वर पिप्पलाद नामक पुत्र होकर उत्पन्न हुए। तात! यह आख्यान निर्दोष, स्वर्गप्रद, कुग्रहजनित दोषोंका संहारक, सम्पूर्ण मनोरथोंका पूरक और शिवभक्तिकी विशेष वृद्धि करनेवाला है।

(अध्याय २१—२५)


भगवान् शिवके द्विजेश्वरावतारकी कथा—राजा भद्रायु तथा रानी कीर्तिमालिनीकी धार्मिक दृढ़ताकी परीक्षा

तदनन्तर वैश्यनाथ अवतारका वर्णन करके नन्दीश्वरने द्विजेश्वरावतारका प्रसंग चलाया। वे बोले—तात ! पहले जिन नृपश्रेष्ठ भद्रायुका परिचय दिया गया था और जिनपर भगवान् शिवने ऋषभरूपसे अनुग्रह किया था, उन्हीं नरेशके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये वे भगवान् फिर द्विजेश्वररूपसे प्रकट हुए थे। ऋषभके प्रभावसे रणभूमिमें शत्रुओंपर विजय पाकर शक्तिशाली राजकुमार भद्रायु जब राज्य-सिंहासनपर आरूढ़ हुए, तब राजा चन्द्रांगद तथा रानी सीमन्तिनीकी बेटी सती-साध्वी कीर्तिमालिनीके साथ उनका विवाह हुआ। किसी समय राजा भद्रायुने अपनी धर्मपत्नीके साथ वसन्त-ऋतुमें वन-विहार करनेके लिये एक गहन वनमें प्रवेश किया। उनकी पत्नी शरणागतजनोंका पालन करनेवाली थी। राजाका भी ऐसा ही नियम था। उन राजदम्पतिकी धर्ममें कितनी दृढ़ता है, इसकी परीक्षाके लिये पार्वतीसहित भगवान् शिवने एक लीला रची। शिवा और शिव उस वनमें ब्राह्मणी और ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए। उन दोनोंने लीलापूर्वक एक मायामय व्याघ्रका निर्माण किया। वे दोनों भयसे विह्वल हो व्याघ्रसे थोड़ी ही दूर आगे रोते-चिल्लाते भागने लगे और व्याघ्र उनका पीछा करने लगा। राजाने उन्हें इस अवस्थामें देखा। वे ब्राह्मण-दम्पति भी भयसे विह्वल हो महाराजकी शरणमें गये और इस प्रकार बोले।

ब्राह्मण-दम्पतिने कहा—महाराज! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। वह व्याघ्र हम दोनोंको खा जानेके लिये आ रहा है। समस्त प्राणियोंको कालके समान भय देनेवाला यह हिंसक प्राणी हमें अपना आहार बनाये, इसके पूर्व ही आप हम दोनोंको बचा लीजिये।

उन दोनोंका यह करुणक्रन्दन सुनकर महावीर राजाने ज्यों ही धनुष उठाया, त्यों ही वह व्याघ्र उनके निकट आ पहुँचा। उसने ब्राह्मणीको पकड़ लिया। वह बेचारी 'हा नाथ! हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा शम्भो! हा जगद्गुरो!' इत्यादि कहकर रोने और विलाप करने लगी। व्याघ्र बड़ा भयानक था। उसने ज्यों ही ब्राह्मणीको अपना ग्रास बनानेकी चेष्टा की, त्यों ही

* शतरुद्रसंहिता * ४६९

भद्रायुने तीखे बाणोंसे उसके मर्ममें आघात किया; परंतु उन बाणोंसे उस महाबली व्याघ्रको तनिक भी व्यथा नहीं हुई। वह ब्राह्मणीको बलपूर्वक घसीटता हुआ तत्काल दूर निकल गया। अपनी पत्नीको बाघके पंजेमें पड़ी देख ब्राह्मणको बड़ा दुःख हुआ और वह बारंबार रोने लगा। देरतक रोकर उसने राजा भद्रायुसे कहा—‘राजन् ! तुम्हारे वे बड़े-बड़े अस्त्र कहाँ हैं? दुःखियोंकी रक्षा करनेवाला तुम्हारा विशाल धनुष कहाँ है? सुना था तुममें बारह हजार बड़े-बड़े हाथियोंका बल है। वह क्या हुआ ? तुम्हारे शंख, खड्ग तथा मन्त्रास्त्र-विद्यासे क्या लाभ हुआ ? दूसरोंको क्षीण होनेसे बचाना क्षत्रियका परम धर्म है। धर्मज्ञ राजा अपना धन और प्राण देकर भी शरणमें आये हुए दीन-दुःखियोंकी रक्षा करते हैं। जो पीड़ितोंकी प्राणरक्षा नहीं कर सकते, ऐसे लोगोंके लिये तो जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है।’

इस प्रकार ब्राह्मणका विलाप और उसके मुखसे अपने पराक्रमकी निन्दा सुनकर राजाने शोकसे मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—‘अहो! आज भाग्यके उलट-फेरसे मेरा पराक्रम नष्ट हो गया। मेरे धर्मका भी नाश हो गया। अतः अब मेरी सम्पदा, राज्य और आयुका भी निश्चय ही नाश हो जायगा।’ यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मणके चरणोंमें गिर पड़े और उसे धीरज बँधाते हुए बोले—‘ब्रह्मन्! मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है। महामते! मुझ क्षत्रियाधमपर कृपा करके शोक छोड़ दीजिये। मैं आपको मनोवांछित पदार्थ दूँगा। यह राज्य, यह रानी और मेरा यह शरीर सब कुछ आपके अधीन है। बोलिये, आप क्या चाहते हैं?’

ब्राह्मण बोले—राजन्! अंधेको दर्पणसे क्या काम? जो भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करता हो, वह बहुत-से घर लेकर क्या करेगा। जो मूर्ख है, उसे पुस्तकसे क्या काम तथा जिसके पास स्त्री नहीं है, वह धन लेकर क्या करेगा? मेरी पत्नी चली गयी, मैंने कभी काम-सुखका उपभोग नहीं किया। अतः कामभोगके लिये आप अपनी इस बड़ी रानीको मुझे दे दीजिये।

राजाने कहा—ब्रह्मन्! क्या यही तुम्हारा धर्म है? क्या तुम्हें गुरुने यही उपदेश किया है? क्या तुम नहीं जानते कि परायी स्त्रीका स्पर्श स्वर्ग एवं सुयशकी हानि करनेवाला है? परस्त्रीके उपभोगसे जो पाप कमाया जाता है, उसे सैकड़ों प्रायश्चित्तोंद्वारा भी धोया नहीं जा सकता।

ब्राह्मण बोले—राजन् ! मैं अपनी तपस्यासे भयंकर ब्रह्महत्या और मदिरापान-जैसे पापका भी नाश कर डालूँगा। फिर परस्त्री-संगम किस गिनतीमें है। अतः आप अपनी इस भार्याको मुझे अवश्य दे दीजिये अन्यथा आप निश्चय ही नरकमें पड़ेंगे।

ब्राह्मणकी इस बातपर राजाने मन-ही-मन विचार किया कि ब्राह्मणके प्राणोंकी रक्षा न करनेसे महापाप होगा, अतः इससे बचनेके लिये पत्नीको दे डालना ही श्रेष्ठ है। इस श्रेष्ठ ब्राह्मणको अपनी पत्नी देकर मैं पापसे मुक्त हो शीघ्र ही अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा। मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके राजाने आग जलायी और ब्राह्मणको बुलाकर उसे अपनी पत्नीको दे दिया।

४७० * संक्षिप्त शिवपुराण *

तत्पश्चात् स्नान करके पवित्र हो देवताओंको प्रणाम करके उन्होंने अग्निकी दो बार परिक्रमा की और एकाग्रचित्त होकर भगवान् शिवका ध्यान किया। इस प्रकार राजाको अग्निमें गिरनेके लिये उद्यत देख जगत्पति भगवान् विश्वनाथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये। उनके पाँच मुख थे। मस्तकपर चन्द्रकला आभूषणका काम दे रही थी। कुछ-कुछ पीले रंगकी जटा लटकी हुई थी। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी थे। हाथोंमें त्रिशूल, खट्वांग, कुठार, ढाल, मृग, अभय, वरद और पिनाक धारण किये, बैलकी पीठपर बैठे हुए भगवान् नीलकण्ठको राजाने अपने सामने प्रत्यक्ष देखा। उनके दर्शनजनित आनन्दसे युक्त हो राजा भद्रायुने हाथ जोड़कर स्तवन किया।

राजाके स्तुति करनेपर पार्वतीके साथ प्रसन्न हुए महेश्वरने कहा—राजन्! तुमने किसी अन्यका चिन्तन न करके जो सदा-सर्वदा मेरा पूजन किया है, तुम्हारी इस भक्तिके कारण और तुम्हारे द्वारा की हुई इस पवित्र स्तुतिको सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। तुम्हारे भक्तिभावकी परीक्षाके लिये मैं स्वयं ब्राह्मण बनकर आया था। जिसे व्याघ्रने ग्रस लिया था, वह ब्राह्मणी और कोई नहीं, ये गिरिराज-नन्दिनी उमादेवी ही थीं। तुम्हारे बाण मारनेसे भी जिसके शरीरको चोट नहीं पहुँची, वह व्याघ्र मायानिर्मित था। तुम्हारे धैर्यको देखनेके लिये ही मैंने तुम्हारी पत्नीको माँगा था, इस कीर्तिमालिनीकी और तुम्हारी भक्तिसे मैं संतुष्ट हूँ। तुम कोई दुर्लभ वर माँगो, मैं उसे दूँगा।

राजा बोले—देव ! आप साक्षात् परमेश्वर हैं। आपने सांसारिक तापसे घिरे हुए मुझ अधमको जो प्रत्यक्ष दर्शन दिया है, यही मेरे लिये महान् वर है। देव ! आप वरदाताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपसे मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता। मेरी यही इच्छा है कि मैं, मेरी रानी, मेरे माता-पिता, पद्माकर वैश्य और उसके पुत्र सुनय—इन सबको आप अपना पार्श्ववर्ती सेवक बना लीजिये।

तत्पश्चात् रानी कीर्तिमालिनीने प्रणाम करके अपनी भक्तिसे भगवान् शंकरको प्रसन्न किया और यह उत्तम वर माँगा—'महादेव! मेरे पिता चन्द्रांगद और माता सीमन्तिनी इन दोनोंको भी आपके समीप निवास प्राप्त हो।' भक्तवत्सल भगवान् गौरीपतिने प्रसन्न होकर 'एवमस्तु' कहा और उन दोनों पति-पत्नीको इच्छानुसार वर देकर वे क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। इधर राजाने भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके रानी कीर्तिमालिनीके साथ प्रिय विषयोंका उपभोग किया और दस हजार वर्षोंतक राज्य करनेके पश्चात् अपने पुत्रोंको राज्य देकर उन्होंने शिवजीके परमपदको प्राप्त किया। राजा और रानी दोनों ही भक्तिपूर्वक महादेवजीकी पूजा करके भगवान् शिवके धामको प्राप्त हुए। यह परम पवित्र, पाप-नाशक एवं अत्यन्त गोपनीय भगवान् शिवका विचित्र गुणानुवाद जो विद्वानोंको सुनाता है अथवा स्वयं भी शुद्धचित्त होकर पढ़ता है, वह इस लोकमें भोग-ऐश्वर्यको प्राप्तकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।

(अध्याय २६-२७) $\sim\sim\circ\sim\sim$

* शतरुद्रसंहिता *
४७१

भगवान् शिवका यतिनाथ एवं हंस नामक अवतार

नन्दीश्वर कहते हैं—मुने ! अब मैं परमात्मा शिवके यतिनाथ नामक अवतारका वर्णन करता हूँ। मुनीश्वर ! अर्बुदाचल नामक पर्वतके समीप एक भील रहता था, जिसका नाम था आहुक। उसकी पत्नीको लोग आहुका कहते थे। वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी। वे दोनों पति-पत्नी महान् शिवभक्त थे और शिवकी आराधना-पूजामें लगे रहते थे। एक दिन वह शिवभक्त भील अपनी पत्नीके लिये आहारकी खोज करनेके निमित्त जंगलमें बहुत दूर चला गया। इसी समय संध्याकालमें भीलकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शंकर संन्यासीका रूप धारण करके घर आये। इतनेमें ही उस घरका मालिक भील भी चला आया और उसने बड़े प्रेमसे उन यतिराजका पूजन किया। उसके मनोभावकी परीक्षाके लिये उन यतीश्वरने दीनवाणीमें कहा—‘भील! आज रातमें यहाँ रहनेके लिये मुझे स्थान दे दो। सबेरा होते ही चला जाऊँगा, तुम्हारा सदा कल्याण हो।’

भील बोला—स्वामीजी! आप ठीक कहते हैं, तथापि मेरी बात सुनिये। मेरे घरमें स्थान तो बहुत थोड़ा है। फिर उसमें आपका रहना कैसे हो सकता है?

भीलकी यह बात सुनकर स्वामीजी वहाँसे चले जानेको उद्यत हो गये।

तब भीलनीने कहा—प्राणनाथ! आप स्वामीजीको स्थान दे दीजिये। घर आये हुए अतिथिको निराश न लौटाइये। अन्यथा हमारे गृहस्थ-धर्मके पालनमें बाधा पहुँचेगी। आप स्वामीजीके साथ सुखपूर्वक घरके भीतर रहिये और मैं बड़े-बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर बाहर खड़ी रहूँगी।

पत्नीकी यह बात सुनकर भीलने सोचा—स्त्रीको घरसे बाहर निकालकर मैं भीतर कैसे रह सकता हूँ? संन्यासीजीका अन्यत्र जाना भी मेरे लिये अधर्मकारक ही होगा। ये दोनों ही कार्य एक गृहस्थके लिये सर्वथा अनुचित हैं। अतः मुझे ही घरके बाहर रहना चाहिये। जो होनहार होगी, वह तो होकर ही रहेगी। ऐसा सोच आग्रह करके उसने स्त्रीको और संन्यासीजीको तो सानन्द घरके भीतर रख दिया और स्वयं वह भील अपने आयुध पास रखकर घरसे बाहर खड़ा हो गया। रातमें जंगली क्रूर एवं हिंसक पशु उसे पीड़ा देने लगे। उसने भी यथाशक्ति उनसे बचनेके लिये महान् यत्न किया। इस तरह यत्न करता हुआ वह भील बलवान् होकर भी प्रारब्धप्रेरित हिंसक पशुओंद्वारा बलपूर्वक खा लिया गया। प्रातःकाल उठकर जब यतिने देखा कि हिंसक पशुओंने वनवासी भीलको खा डाला है, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। संन्यासीको दुःखी देख भीलनी दुःखसे व्याकुल होनेपर भी धैर्यपूर्वक उस दुःखको दबाकर यों बोली—‘स्वामीजी! आप दुःखी किसलिये हो रहे हैं? इन भीलराजका तो इस समय कल्याण ही हुआ। ये धन्य और कृतार्थ हो गये, जो इन्हें ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई। मैं चिताकी आगमें जलकर इनका अनुसरण करूँगी। आप प्रसन्नतापूर्वक मेरे लिये एक चिता तैयार कर दें; क्योंकि स्वामीका अनुसरण करना स्त्रियोंके लिये सनातनधर्म है।’ उसकी बात सुनकर संन्यासीजीने स्वयं चिता