शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* शतरुद्रसंहिता * ४६३
तब कश्यप भी महान् आनन्दके साथ तुरंत ही अपने स्थानको लौट गये। वहाँ उन्होंने वह सारा वृत्तान्त आदरपूर्वक देवताओंसे कह सुनाया। तदनन्तर भगवान् शंकर अपना वचन सत्य करनेके लिये कश्यपद्वारा सुरभीके पेटसे ग्यारह रूप धारण करके प्रकट हुए। उस समय महान् उत्सव मनाया गया। सारा जगत् शिवममय हो गया। कश्यपमुनिके साथ-साथ सभी देवता हर्षविभोर हो गये। उनके नाम रखे गये—कपाली, पिंगल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड तथा भव। ये ग्यारहों रुद्र सुरभीके पुत्र कहलाते हैं। ये सुखके आवासस्थान हैं तथा देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये शिवरूपसे उत्पन्न हुए। ये कश्यपनन्दन वीरवर रुद्र महान् बल-पराक्रमसम्पन्न थे; इन्होंने संग्राममें देवताओंकी सहायता करके दैत्योंका संहार कर डाला। इन्हीं रुद्रोंकी कृपासे इन्द्र आदि देवगण दैत्योंको जीतकर निर्भय हो गये। उनका मन स्वस्थ हो गया और वे अपना-अपना राज्य-कार्य सँभालने लगे। अब भी शिव-स्वरूपधारी वे सभी महारुद्र देवताओंकी रक्षाके लिये सदा स्वर्गमें विराजमान रहते हैं। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे शंकरजीके ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन कर दिया। ये सभी समस्त लोकोंके लिये सुखदायक हैं। यह निर्मल आख्यान सम्पूर्ण पापोंका विनाशक, धन, यश और आयुका प्रदाता तथा सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। (अध्याय १६—१८)
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शिवजीके 'दुर्वासावतार' तथा 'हनुमदवतार' का वर्णन
नन्दीश्वरजी कहते हैं—महामुने! अब तुम शम्भुके एक दूसरे चरितको, जिसमें शंकरजी धर्मके लिये दुर्वासा होकर प्रकट हुए थे, प्रेमपूर्वक श्रवण करो। अनसूयाके पति ब्रह्मवेत्ता तपस्वी अत्रिने ब्रह्माजीके निर्देशानुसार पत्नीसहित ऋक्षकुल पर्वतपर जाकर पुत्रकामनासे घोर तप किया। उनके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों उनके आश्रमपर गये। उन्होंने कहा कि 'हम तीनों संसारके ईश्वर हैं। हमारे अंशसे तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकीमें विख्यात तथा माता-पिताका यश बढ़ानेवाले होंगे।' यों कहकर वे चले गये। ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा हुए, जो देवताओंके समुद्रमें डाले जानेपर समुद्रसे प्रकट हुए थे। विष्णुके अंशसे श्रेष्ठ संन्यास-पद्धतिको प्रचलित करनेवाले 'दत्त' उत्पन्न हुए और रुद्रके अंशसे मुनिवर दुर्वासाने जन्म लिया।
इन दुर्वासाने महाराज अम्बरीषकी परीक्षा की थी। जब सुदर्शनचक्रने इनका पीछा किया, तब शिवजीके आदेशसे अम्बरीषके द्वारा प्रार्थना करनेपर चक्र शान्त हुआ। इन्होंने भगवान् रामकी परीक्षा की। कालने मुनिका वेष धारण करके श्रीरामके साथ यह शर्त की थी कि 'मेरे साथ बात करते समय श्रीरामके पास कोई न आये; जो आयेगा उसका निर्वासन कर दिया जायगा।' दुर्वासाजीने हठ करके लक्ष्मणको भेजा, तब श्रीरामने तुरंत लक्ष्मणका त्याग कर दिया। इन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी