भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 476

४६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुमसे महेश्वरके महाकाल आदि दस शुभ अवतारोंका शक्तिसहित वर्णन कर दिया। जो मनुष्य समस्त शिवपर्वोंके अवसरपर इस परम पावन कथाका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह शिवजीका परम प्यारा हो जाता है। (इस आख्यानका पाठ करनेसे) ब्राह्मणके ब्रह्मतेजकी वृद्धि होती है, क्षत्रिय विजय लाभ करता है, वैश्य धनपति हो जाता है और शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। स्वधर्मपरायण शिवभक्तोंको यह चरित सुननेसे सुख प्राप्त होता है और उनकी शिवभक्ति विशेषरूपसे बढ़ जाती है।

मुने! अब मैं शंकरजीके एकादश श्रेष्ठ अवतारोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। उन्हें श्रवण करनेसे असत्यादिजनित बाधा पीड़ा नहीं पहुँचा सकती। पूर्वकालकी बात है, एक बार इन्द्र आदि समस्त देवता दैत्योंसे पराजित हो गये। तब वे भयभीत हो अपनी पुरी अमरावतीको छोड़कर भाग खड़े हुए। यों दैत्योंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सभी देवता कश्यपजीके पास गये। वहाँ उन्होंने परम व्याकुलतापूर्वक हाथ जोड़ एवं मस्तक झुकाकर उनके चरणोंमें अभिवादन किया और उनका भलीभाँति स्तवन करके आदरपूर्वक अपने आनेका कारण प्रकट किया तथा दैत्योंद्वारा पराजित होनेसे उत्पन्न हुए अपने सारे दुःखोंको कह सुनाया। तात! तब उनके पिता कश्यपजी देवताओंकी उस कष्ट-कहानीको सुनकर अधिक दुःखी नहीं हुए; क्योंकि उनकी बुद्धि शिवजीमें आसक्त थी। मुने! उन शान्तबुद्धि मुनिने धैर्य धारण करके देवताओंको आश्वासन दिया और स्वयं परम हर्षपूर्वक विश्वनाथपुरी काशीको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने गंगाजीके जलमें स्नान करके अपना नित्य-नियम पूरा किया और फिर आदरपूर्वक उमासहित सर्वेश्वर भगवान् विश्वनाथकी भलीभाँति अर्चना की। तदनन्तर शम्भुदर्शनके उद्देश्यसे एक शिवलिंगकी स्थापना करके वे देवताओंके हितार्थ परम प्रसन्नतापूर्वक घोर तप करने लगे। मुने! शिवजीके चरणकमलोंमें आसक्त मनवाले धैर्यशाली मुनिवर कश्यपको जब यों तप करते हुए बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया, तब सत्पुरुषोंके गतिस्वरूप भगवान् शंकर अपने चरणोंमें तल्लीन मनवाले कश्यप ऋषिको वर देनेके लिये वहाँ प्रकट हुए। भक्तवत्सल महेश्वर परम प्रसन्न तो थे ही, अतः वे अपने भक्त मुनिवर कश्यपसे बोले—'वर माँगो।' उन महेश्वरको देखते ही प्रसन्न बुद्धिवाले देवताओंके पिता कश्यपजी हर्षमग्न हो गये और हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें नमस्कार करके स्तुति करते हुए यों बोले—'महेश्वर! मैं सर्वथा आपका शरणागत हूँ। स्वामिन्! देवताओंके दुःखका विनाश करके मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। देवेश! मैं पुत्रोंके दुःखसे विशेष दुःखी हूँ, अतः ईश! मुझे सुखी कीजिये; क्योंकि आप देवताओंके सहायक हैं। नाथ! महाबली दैत्योंने देवताओं और यक्षोंको पराजित कर दिया है, इसलिये शम्भो! आप मेरे पुत्ररूपसे प्रकट होकर देवताओंके लिये आनन्ददाता बनिये।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! कश्यपजीके ऐसा कहनेपर सर्वेश्वर भगवान् शंकर उनसे 'तथेति—ऐसा ही होगा' यों कहकर उनके सामने वहीं अन्तर्धान हो गये।