भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

४५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

पुण्यात्मा, शिवभक्त, ब्रह्मतेजके निधि और जितेन्द्रिय थे। ब्रह्मचर्याश्रममें उनकी बड़ी निष्ठा थी। वे सदा ब्रह्मयज्ञमें तत्पर रहते थे। फिर उन्होंने शुचिष्मती नामकी एक सद्गुणवती कन्यासे विवाह कर लिया और वे ब्राह्मणोचित कर्म करते हुए देवता तथा पितरोंको प्रिय लगनेवाला जीवन बिताने लगे। इस प्रकार जब बहुत-सा समय व्यतीत हो गया, तब उन ब्राह्मणकी भार्या शुचिष्मती, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, अपने पतिसे बोली— 'प्राणनाथ ! स्त्रियोंके योग्य जितने आनन्दप्रद भोग हैं, उन सबको मैंने आपकी कृपासे आपके साथ रहकर भोग लिया; परंतु नाथ ! मेरे हृदयमें एक लालसा चिरकालसे वर्तमान है और वह गृहस्थोंके लिये उचित भी है, उसे आप पूर्ण करनेकी कृपा करें। स्वामिन् ! यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ और आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे महेश्वर-सरीखा पुत्र प्रदान कीजिये। इसके अतिरिक्त मैं दूसरा वर नहीं चाहती।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने ! पत्नीकी बात सुनकर पवित्र व्रतपरायण ब्राह्मण विश्वानर क्षणभरके लिये समाधिस्थ हो गये और हृदयमें यों विचार करने लगे—'अहो ! मेरी इस सूक्ष्मांगी पत्नीने कैसा अत्यन्त दुर्लभ वर माँगा है। यह तो मेरे मनोरथ-पथसे बहुत दूर है। अच्छा, शिवजी तो सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन शम्भुने ही इसके मुखमें बैठकर वाणीरूपसे ऐसी बात कही है, अन्यथा दूसरा कौन ऐसा करनेमें समर्थ हो सकता है। तदनन्तर वे एकपत्नीव्रती मुनि विश्वानर पत्नीको आश्वासन देकर वाराणसीमें गये और घोर तपके द्वारा भगवान् शिवके वीरेश लिंगकी आराधना करने लगे। इस प्रकार उन्होंने एक वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक उत्तम वीरेश लिंगकी त्रिकाल अर्चना करते हुए अद्भुत तप किया। तेरहवाँ मास आनेपर एक दिन वे द्विजवर प्रातःकाल त्रिपथगामिनी गंगाके जलमें स्नान करके ज्यों ही वीरेशके निकट पहुँचे, त्यों ही उन तपोधनको उस लिंगके मध्य एक अष्टवर्षीय विभूतिभूषित बालक दिखायी दिया। उस नग्न शिशुके नेत्र कानोंतक फैले हुए थे, होठोंपर गहरी लालिमा छायी हुई थी, मस्तकपर पीले रंगकी सुन्दर जटा सुशोभित थी और मुखपर हँसी खेल रही थी। वह शैशवोचित अलंकार और चिताभस्म धारण किये हुए था तथा अपनी लीलासे हँसता हुआ श्रुतिसूक्तोंका पाठ कर रहा था। उस बालकको देखकर विश्वानर मुनि कृतार्थ हो गये और आनन्दके कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा तथा बारंबार 'नमस्कार है, नमस्कार है' यों उनका हृदयोद्गार फूट पड़ा। फिर वे अभिलाषा पूर्ण करनेवाले आठ पद्योंद्वारा बालरूपधारी परमानन्दस्वरूप शम्भुका स्तवन करते हुए बोले।

विश्वानरने कहा—भगवान् ! आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं, यह सारा जगत् आपका ही स्वरूप है, यहाँ अनेक कुछ भी नहीं है। यह बिलकुल सत्य है कि एकमात्र रुद्रके अतिरिक्त दूसरे किसीकी सत्ता नहीं है, इसलिये मैं आप महेशकी शरण ग्रहण करता हूँ। शम्भो ! आप ही सबके कर्ता-हर्ता हैं, तथा जैसे आत्मधर्म एक होते हुए भी अनेक रूपसे दीखता है, उसी प्रकार आप भी एकरूप होकर नाना रूपोंमें व्याप्त हैं।