शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* शतरुद्रसंहिता * ४५५
फिर भी आप रूपरहित हैं। इसलिये आप ईश्वरके अतिरिक्त मैं किसी दूसरेकी शरण नहीं ले सकता। जैसे रज्जुमें सर्प, सीपीमें चाँदी और मृगमरीचिकामें जलप्रवाहका भान मिथ्या है, उसी प्रकार, जिसे जान लेनेपर यह विश्वप्रपंच मिथ्या भासित होता है, उन महेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। शम्भो! जलमें जो शीतलता, अग्निमें दाहकता, सूर्यमें गरमी, चन्द्रमामें आह्लादकारिता, पुष्पमें गन्ध और दुग्धमें घी वर्तमान है, वह आपका ही स्वरूप है, अतः मैं आपके शरण हूँ। आप कानरहित होकर शब्द सुनते हैं; नासिकाविहीन होकर सूँघते हैं। पैर न होनेपर भी दूरतक चले जाते हैं, नेत्रहीन होकर सब कुछ देखते हैं और जिह्वारहित होकर भी समस्त रसोंके ज्ञाता हैं। भला, आपको सम्यक्-रूपसे कौन जान सकता है। इसलिये मैं आपकी शरणमें जाता हूँ। ईश! आपके रहस्यको न तो साक्षात् वेद ही जानता है न विष्णु, न अखिल विश्वके विधाता ब्रह्मा, न योगीन्द्र और न इन्द्र आदि प्रधान देवताओंको ही इसका पता है; परंतु आपका भक्त उसे जान लेता है, अतः मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। ईश ! न तो आपका कोई गोत्र है, न जन्म है, न नाम है न रूप है, न शील है और न देश है; ऐसा होनेपर भी आप त्रिलोकीके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, इसलिये मैं आपका भजन करता हूँ। स्मरारे! आप सर्वस्वरूप हैं, यह सारा विश्वप्रपंच आपसे ही प्रकट हुआ है। आप गौरीके प्राणनाथ, दिगम्बर और परम शान्त हैं। बाल, युवा और वृद्धरूपमें आप ही वर्तमान हैं। ऐसी कौन-सी वस्तु है, जिसमें आप व्याप्त न हों; अतः मैं आपके चरणोंमें नतमस्तक हूँ।*
नन्दीश्वर कहते हैं—मुने! यों स्तुति करके विप्रवर विश्वानर हाथ जोड़कर भूमिपर गिरना ही चाहते थे, तबतक सम्पूर्ण वृद्धोंके भी वृद्ध बालरूपधारी शिव परम हर्षित होकर उन भूदेवसे बोले।
बालरूपी शिवने कहा—मुनिश्रेष्ठ विश्वानर! तुमने आज मुझे संतुष्ट कर दिया है। भूदेव! मेरा मन परम प्रसन्न हो गया है, अतः अब तुम उत्तम वर माँग लो। यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वानर कृतकृत्य हो गये
* विश्वानर उवाच—
एकं ब्रह्मैवाद्वितीयं समस्तं सत्यं सत्यं नेह नानास्ति किंचित्। एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे तस्मादेकं त्वां प्रपद्ये महेशम्॥
कर्ता हर्ता त्वं हि सर्वस्य शम्भो नानारूपेष्वेकरूपोऽप्यरूपः। यद्वत्प्रत्यग्धर्म एकोऽप्यनेकस्तस्मान्नान्यं त्वां विनेशं प्रपद्ये॥
रज्जौ सर्पः शुक्तिकायां च रौप्यं नरैः पूरस्तन्मृगाख्ये मरीचौ। यद्वत्तद्वद्विश्वमेष प्रपञ्चो यस्मिन् ज्ञाते तं प्रपद्ये महेशम्॥
तोये शैत्यं दाहकत्वं च वह्नौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः। पुष्पे गन्धो दुग्धमध्येऽपि सर्पिर्यत्तच्छम्भो त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये॥
शब्दं गृह्णास्यश्रवास्त्वं हि जिघ्रस्यघ्राणस्त्वं व्यङ्घ्रिरायासि दूरात्। व्यक्षः पश्येस्त्वं रसज्ञोऽप्यजिह्वः कस्त्वां सम्यग्वेत्त्यतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो वेदस्त्वामीश साक्षाद्धि वेद नो वा विष्णुर्नों विधाताखिलस्य। नो योगीन्द्रा नेन्द्रमुख्याश्च देवा भक्तो वेद त्वामतस्त्वां प्रपद्ये॥
नो ते गोत्रं नेश जन्मापि नाख्या नो वा रूपं नैव शीलं न देशः। इत्थम्भूतोऽपीश्वरस्त्वं त्रिलोक्याः सर्वान् कामान् पूरयेस्तद् भजे त्वाम्॥
त्वतः सर्वं त्वं हि सर्वं स्मरारे त्वं गौरीशस्त्वं च नग्नोऽतिशान्तः। त्वं वै वृद्धस्त्वं युवा त्वं च बालस्तत्त्वं यत् किं नास्यतस्त्वां नतोऽहम्॥
(शि० पु० शतरुद्रसंहिता १३। ४२—४९)