भारतकोश
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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

४७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

तैयार की और भीलनीने अपने धर्मके अनुसार उसमें प्रवेश किया। इसी समय भगवान् शंकर अपने साक्षात् स्वरूपसे उसके सामने प्रकट हो गये और उसकी प्रशंसा करते हुए बोले—'तुम धन्य हो, धन्य हो। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'

भगवान् शंकरका यह परमानन्ददायक वचन सुनकर भीलनीको बड़ा सुख मिला। वह ऐसी विभोर हो गयी कि उसे किसी भी बातकी सुध नहीं रही। उसकी उस अवस्थाको लक्ष्य करके भगवान् शंकर और भी प्रसन्न हुए और उसके न माँगनेपर भी उसे वर देते हुए बोले—'मेरा जो यतिरूप है, यह भावी जन्ममें हंसरूपसे प्रकट होगा और प्रसन्नतापूर्वक तुम दोनोंका परस्पर संयोग करायेगा। यह भील निषधदेशकी उत्तम राजधानीमें राजा वीरसेनका श्रेष्ठ पुत्र होगा। उस समय नलके नामसे इसकी ख्याति होगी और तुम विदर्भ नगरमें भीमराजकी पुत्री दमयन्ती होओगी। तुम दोनों मिलकर राजभोग भोगनेके पश्चात् वह मोक्ष प्राप्त करोगे, जो बड़े-बड़े योगीश्वरोंके लिये भी दुर्लभ है।'

नन्दीश्वर कहते हैं—मुने! ऐसा कहकर भगवान् शिव उस समय लिंगरूपमें स्थित हो गये। वह भील अपने धर्मसे विचलित नहीं हुआ था, अतः उसीके नामपर उस लिंगको 'अचलेश' संज्ञा दी गयी। दूसरे जन्ममें वह आहुक नामक भील नैषध नगरमें वीरसेनका पुत्र हो महाराज नलके नामसे विख्यात हुआ और आहुका नामकी भीलनी विदर्भ नगरमें राजा भीमकी पुत्री दमयन्ती हुई और वे यतिनाथ शिव वहाँ हंसरूपमें प्रकट हुए। उन्होंने दमयन्तीका नलके साथ विवाह कराया। पूर्वजन्मके सत्कारजनित पुण्यसे प्रसन्न हो भगवान् शिवने हंसका रूप धारण कर उन दोनोंको सुख दिया। हंसावतारधारी शिव भाँति-भाँतिकी बातें करने और संदेश पहुँचानेमें कुशल थे। वे नल और दमयन्ती दोनोंके लिये परमानन्ददायक हुए।

(अध्याय २८)


भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतारकी कथा

नन्दीश्वर कहते हैं—सनत्कुमारजी! भगवान् शम्भुके एक उत्तम अवतारका नाम कृष्णदर्शन है, जिसने राजा नभगको ज्ञान प्रदान किया था। उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। श्राद्धदेव नामक मनुके जो इक्ष्वाकु आदि पुत्र थे, उनमें नवमका नाम नभग था,

* शतरुद्रसंहिता * ४७३

जिनका पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुआ। नाभागके ही पुत्र अम्बरीष हुए, जो भगवान् विष्णुके भक्त थे तथा जिनकी ब्राह्मणभक्ति देखकर उनके ऊपर महर्षि दुर्वासा प्रसन्न हुए थे। मुने! अम्बरीषके पितामह जो नभग कहे गये हैं, उनके चरित्रका वर्णन सुनो। उन्हींको भगवान् शिवने ज्ञान प्रदान किया था। मनुपुत्र नभग बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने विद्याध्ययनके लिये दीर्घकालतक इन्द्रिय-संयमपूर्वक गुरुकुलमें निवास किया। इसी बीचमें इक्ष्वाकु आदि भाइयोंनै नभगके लिये कोई भाग न देकर पिताकी सम्पत्ति आपसमें बाँट ली और अपना-अपना भाग लेकर वे उत्तम रीतिसे राज्यका पालन करने लगे। उन सबने पिताकी आज्ञासे ही धनका बँटवारा किया था। कुछ कालके पश्चात् ब्रह्मचारी नभग गुरुकुलसे सांगोपांग वेदोंका अध्ययन करके वहाँ आये। उन्होंने देखा सब भाई सारी सम्पत्तिका बँटवारा करके अपना-अपना भाग ले चुके हैं। तब उन्होंने भी बड़े स्नेहसे दायभाग पानेकी इच्छा रखकर अपने इक्ष्वाकु आदि बन्धुओंसे कहा—'भाइयो! मेरे लिये भाग दिये बिना ही आपलोगोंने आपसमें सारी सम्पत्तिका बँटवारा कर लिया। अतः अब प्रसन्नता-पूर्वक मुझे भी हिस्सा दीजिये। मैं अपना दायभाग लेनेके लिये ही यहाँ आया हूँ।'

भाई बोले—जब सम्पत्तिका बँटवारा हो रहा था, उस समय हम तुम्हारे लिये भाग देना भूल गये थे। अब इस समय पिताजीको ही तुम्हारे हिस्सेमें देते हैं। तुम उन्हींको ले लो, इसमें संशय नहीं है।

भाइयोंका यह वचन सुनकर नभगको बड़ा विस्मय हुआ। वे पिताके पास जाकर बोले—'तात! मैं विद्याध्ययनके लिये गुरुकुलमें गया था और वहाँ अबतक ब्रह्मचारी रहा हूँ। इसी बीचमें भाइयोंनै मुझे छोड़कर आपसमें धनका बँटवारा कर लिया। वहाँसे लौटकर जब मैंने अपने हिस्सेके बारेमें उनसे पूछा, तब उन्होंने आपको मेरा हिस्सा बता दिया। अतः उसके लिये मैं आपकी सेवामें आया हूँ।' नभगकी वह बात सुनकर पिताको बड़ा विस्मय हुआ। श्राद्धदेवने पुत्रको आश्वासन देते हुए कहा—'बेटा! भाइयोंकी उस बातपर विश्वास न करो। वह उन्होंने तुम्हें ठगनेके लिये कही है। मैं तुम्हारे लिये भोगसाधक उत्तम दाय नहीं बन सकता, तथापि उन वंचकोंने यदि मुझे ही दायके रूपमें तुम्हें दिया है तो मैं तुम्हारी जीविकाका एक उपाय बताता हूँ, सुनो। इन दिनों उत्तम बुद्धिवाले आंगिरसगोत्रीय ब्राह्मण एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं, उस कर्ममें प्रत्येक छठे दिनका कार्य वे ठीक-ठीक नहीं समझ पाते—उसमें उनसे भूल हो जाती है। तुम वहाँ जाओ और उन ब्राह्मणोंको विश्वेदेवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दिया करो। इससे वह यज्ञ शुद्धरूपसे सम्पादित होगा। वह यज्ञ समाप्त होनेपर वे ब्राह्मण जब स्वर्गको जाने लगेंगे, उस समय संतुष्ट होकर अपने यज्ञसे बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे।'

पिताकी यह बात सुनकर सत्यवादी नभग बड़ी प्रसन्नताके साथ उस उत्तम यज्ञमें गये। मुने! वहाँ छठे दिनके कर्ममें बुद्धिमान् मनुपुत्रने वैश्वदेवसम्बन्धी दोनों सूक्तोंका स्पष्टरूपसे उच्चारण किया। यज्ञकर्म समाप्त होनेपर वे आंगिरस ब्राह्मण यज्ञसे बचा हुआ अपना-अपना धन नभगको

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देकर स्वर्गलोकको चले गये। उस यज्ञशिष्ट धनको जब ये ग्रहण करने लगे, उस समय सुन्दर लीला करनेवाले भगवान् शिव तत्काल वहाँ प्रकट हो गये। उनके सारे अंग बड़े सुन्दर थे, परंतु नेत्र काले थे। उन्होंने नभगसे पूछा—'तुम कौन हो? जो इस धनको ले रहे हो। यह तो मेरी सम्पत्ति है। तुम्हें किसने यहाँ भेजा है। सब बातें ठीक-ठीक बताओ।'

नभगने कहा—यह तो यज्ञसे बचा हुआ धन है, जिसे ऋषियोंने मुझे दिया है। अब यह मेरी ही सम्पत्ति है। इसको लेनेसे तुम मुझे कैसे रोक रहे हो?

कृष्णदर्शनने कहा—'तात! हम दोनोंके इस झगड़ेमें तुम्हारे पिता ही पंच रहेंगे। जाकर उनसे पूछो और वे जो निर्णय दें, उसे ठीक-ठीक यहाँ आकर बताओ।' उनकी बात सुनकर नभगने पिताके पास जाकर उक्त प्रश्नको उनके सामने रखा। श्राद्धदेवको कोई पुरानी बात याद आ गयी और उन्होंने भगवान् शिवके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए कहा।

मनु बोले—'तात! वे पुरुष जो तुम्हें वह धन लेनेसे रोक रहे हैं, साक्षात् भगवान् शिव हैं। यों तो संसारकी सारी वस्तु ही उन्हींकी है। परंतु यज्ञसे प्राप्त हुए धनपर उनका विशेष अधिकार है। यज्ञ करनेसे जो धन बच जाता है, उसे भगवान् रुद्रका भाग निश्चित किया गया है। अतः यज्ञावशिष्ट सारी वस्तु ग्रहण करनेके अधिकारी सर्वेश्वर महादेवजी ही हैं। उनकी इच्छासे ही दूसरे लोग उस वस्तुको ले सकते हैं। भगवान् शिव तुमपर कृपा करनेके लिये ही वहाँ वैसा रूप धारण करके आये हैं। तुम वहीं जाओ और उन्हें प्रसन्न करो। अपने अपराधके लिये क्षमा माँगो और प्रणाम-पूर्वक उनकी स्तुति करो।' नभग पिताकी आज्ञासे वहाँ गये और भगवान्‌को प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'महेश्वर! यह सारी त्रिलोकी ही आपकी है। फिर यज्ञसे बचे हुए धनके लिये तो कहना ही क्या है। निश्चय ही इसपर आपका अधिकार है, यही मेरे पिताने निर्णय दिया है। नाथ! मैंने यथार्थ बात न जाननेके कारण भ्रमवश जो कुछ कहा है मेरे उस अपराधको क्षमा कीजिये। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हों।'

ऐसा कहकर नभगने अत्यन्त दीनतापूर्ण हृदयसे दोनों हाथ जोड़ महेश्वर कृष्णदर्शन-का स्तवन किया। उधर श्राद्धदेवने भी अपने अपराधके लिये क्षमा माँगते हुए भगवान् शिवकी स्तुति की। तदनन्तर भगवान् रुद्रने मन-ही-मन प्रसन्न हो नभगको कृपादृष्टिसे देखा और मुस्कराते हुए कहा।

कृष्णदर्शन बोले—'नभग ! तुम्हारे पिताने जो धर्मानुकूल बात कही है, वह ठीक ही है। तुमने भी साधु-स्वभावके कारण सत्य ही कहा है। इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ और कृपापूर्वक तुम्हें सनातन ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान प्रदान करता हूँ। इस समय यह सारा धन मैंने तुम्हें दे दिया। अब तुम इसे ग्रहण करो। इस लोकमें निर्विकार रहकर सुख भोगो। अन्तमें मेरी कृपासे तुम्हें सद्गति प्राप्त होगी।' ऐसा कहकर भगवान् रुद्र सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। साथ ही श्राद्धदेव भी अपने पुत्र नभगके साथ अपने स्थानको लौट आये।

* शतरुद्रसंहिता * | ४७५

इस लोकमें विपुल भोगोंका उपभोग करके अन्तमें वे भगवान् शिवके धाममें चले गये। ब्रह्मन्! इस प्रकार तुमसे मैंने भगवान् शिवके कृष्णादर्शन नामक अवतारका वर्णन किया। जो इस आख्यानको पढ़ता और सुनता है, उसे सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त हो जाते हैं।

(अध्याय २९)


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### भगवान् शिवके अवधूतेश्वरावतारकी कथा और उसकी महिमाका वर्णन

नन्दीश्वर कहते हैं—सनत्कुमार! अब तुम परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन सुनो, जिसने इन्द्रके घमंडको चूर-चूर कर दिया था। पहलेकी बात है, इन्द्र सम्पूर्ण देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर भगवान् शिवका दर्शन करनेके लिये कैलास पर्वतपर गये। उस समय बृहस्पति और इन्द्रके शुभागमनकी बात जानकर भगवान् शंकर उन दोनोंकी परीक्षा लेनेके लिये अवधूत बन गये। उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था। वे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होनेके कारण महाभयंकर जान पड़ते थे। उनकी आकृति बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। वे राह रोककर खड़े थे। बृहस्पति और इन्द्रने शिवके समीप जाते समय देखा, एक अद्भुत शरीरधारी पुरुष रास्तेके बीचमें खड़ा है। इन्द्रको अपने अधिकारपर बड़ा गर्व था। इसलिये वे यह न जान सके कि ये साक्षात् भगवान् शंकर हैं। उन्होंने मार्गमें खड़े हुए पुरुषसे पूछा—'तुम कौन हो? इस नग्न अवधूतवेशमें कहाँसे आये हो? तुम्हारा नाम क्या है? सब बातें ठीक-ठीक बताओ। देर न करो। भगवान् शिव अपने स्थानपर हैं या इस समय कहीं अन्यत्र गये हैं? मैं देवताओं तथा गुरुजीके साथ उन्हींके दर्शनके लिये जा रहा हूँ।'

इन्द्रके बारंबार पूछनेपर भी महान् कौतुक करनेवाले अहंकारहारी महायोगी त्रिलोकीनाथ शिव कुछ न बोले। चुप ही रहे। तब अपने ऐश्वर्यका घमंड रखनेवाले देवराज इन्द्रने रोषमें आकर उस जटाधारी पुरुषको फटकारा और इस प्रकार कहा।

इन्द्र बोले—अरे मूढ़! दुर्मते! तू बार-बार पूछनेपर भी उत्तर नहीं देता? अतः तुझे वज्रसे मारता हूँ। देखूँ कौन तेरी रक्षा करता है।

ऐसा कह उस दिगम्बर पुरुषकी ओर क्रोधपूर्वक देखते हुए इन्द्रने उसे मार डालनेके लिये वज्र उठाया। यह देख भगवान् शंकरने शीघ्र ही उस वज्रका स्तम्भन कर दिया। उनकी बाँह अकड़ गयी। इसलिये वे वज्रका प्रहार न कर सके। तदनन्तर वह पुरुष तत्काल ही क्रोधके कारण तेजसे प्रज्वलित हो उठा, मानो इन्द्रको जलाये देता हो। भुजाओंके स्तम्भित हो जानेके कारण शचीवल्लभ इन्द्र क्रोधसे उस सर्पकी भाँति जलने लगे, जिसका पराक्रम मन्त्रके बलसे अवरुद्ध हो गया हो। बृहस्पतीने उस पुरुषको अपने तेजसे प्रज्वलित होता देख तत्काल ही यह समझ लिया कि ये साक्षात् भगवान् हर हैं। फिर तो वे हाथ जोड़ प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। स्तुतिके पश्चात् उन्होंने इन्द्रको

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उनके चरणोंमें गिरा दिया और कहा— 'दीनानाथ महादेव! यह इन्द्र आपके चरणोंमें पड़ा है। आप इसका और मेरा उद्धार करें। हम दोनोंपर क्रोध नहीं, प्रेम करें। महादेव! शरणागत इन्द्रकी रक्षा कीजिये। आपके ललाटसे प्रकट हुई यह आग इन्हें जलानेके लिये आ रही है।'

बृहस्पतिकी यह बात सुनकर अवधूत-वेषधारी करुणासिन्धु शिवने हँसते हुए कहा—'अपने नेत्रसे रोषवश बाहर निकली हुई अग्निको मैं पुनः कैसे धारण कर सकता हूँ। क्या सर्प अपनी छोड़ी हुई केंचुलको फिर ग्रहण करता है?'

बृहस्पति बोले—देव! भगवन्! भक्त सदा ही कृपाके पात्र होते हैं। आप अपने भक्तवत्सल नामको चरितार्थ कीजिये और इस भयंकर तेजको कहीं अन्यत्र डाल दीजिये।

रुद्रने कहा—देवगुरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। इसलिये उत्तम वर देता हूँ। इन्द्रको जीवनदान देनेके कारण आजसे तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा। मेरे ललाटवर्ती नेत्रसे जो यह आग प्रकट हुई है, इसे देवता नहीं सह सकते। अतः इसको मैं बहुत दूर छोड़ूँगा, जिससे यह इन्द्रको पीड़ा न दे सके।

ऐसा कहकर अपने तेजःस्वरूप उस अद्भुत अग्निको हाथमें लेकर भगवान् शिवने क्षार समुद्रमें फेंक दिया। वहाँ फेंके जाते ही भगवान् शिवका वह तेज तत्काल एक बालकके रूपमें परिणत हो गया, जो सिन्धुपुत्र जलन्धर नामसे विख्यात हुआ। फिर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवने ही असुरोंके स्वामी जलन्धरका वध किया था। अवधूतरूपसे ऐसी सुन्दर लीला करके लोककल्याणकारी शंकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर सब देवता अत्यन्त निर्भय एवं सुखी हुए। इन्द्र और बृहस्पति भी उस भयसे मुक्त हो उत्तम सुखके भागी हुए। जिसके लिये उनका आना हुआ था, वह भगवान् शिवका दर्शन पाकर कृतार्थ हुए। इन्द्र और बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये। सनत्कुमार! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन किया है, जो दुष्टोंको दण्ड एवं भक्तोंको परम आनन्द प्रदान करनेवाला है। यह दिव्य आख्यान पापका निवारण करके यश, स्वर्ग, भोग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलकी प्राप्ति करानेवाला है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसे सुनता या सुनाता है, वह इह लोकमें सम्पूर्ण सुखोंका उपभोग करके अन्तमें शिवकी गति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय ३०)

* शतरुद्रसंहिता * ४७७

भगवान् शिवके भिक्षुवर्यावतारकी कथा, राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा

नन्दीश्वर कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! अब तुम भगवान् शम्भुके नारी-संदेहभंजक भिक्षु-अवतारका वर्णन सुनो, जिसे उन्होंने अपने भक्तपर दया करके ग्रहण किया था। विदर्भ देशमें सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो धर्ममें तत्पर, सत्यशील और बड़े-बड़े शिवभक्तोंसे प्रेम करनेवाले थे। धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हुए उनका बहुत-सा समय सुखपूर्वक बीत गया। तदनन्तर किसी समय शाल्वदेशके राजाओंने उस राजाकी राजधानीपर आक्रमण करके उसे चारों ओरसे घेर लिया। बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ, जिनके पास बहुत बड़ी सेना थी, राजा सत्यरथका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। शत्रुओंके साथ दारुण युद्ध करके उनकी बड़ी भारी सेना नष्ट हो गयी। फिर दैवयोगसे राजा भी शाल्वोंके हाथसे मारे गये। उन नरेशके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए सैनिक मन्त्रियोंसहित भयसे विह्वल हो भाग खड़े हुए। मुने! उस समय विदर्भराज सत्यरथकी महारानी शत्रुओंसे घिरी होनेपर भी कोई प्रयत्न करके रातके समय अपने नगरसे बाहर निकल गयीं। वे गर्भवती थीं; अतः शोकसे संतप्त हो भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई वे धीरे-धीरे पूर्वदिशाकी ओर बहुत दूर चली गयीं। सबेरा होनेपर रानीने भगवान् शंकरकी दयासे एक निर्मल सरोवर देखा। उस समयतक वे बहुत दूरका रास्ता तय कर चुकी थीं। सरोवरके तटपर आकर वे सुकुमारी रानी एक छायादार वृक्षके नीचे बैठ गयीं। भाग्यवश उसी निर्जन स्थानमें वृक्षके नीचे ही रानीने उत्तम गुणोंसे युक्त शुभ मुहूर्तमें एक दिव्य बालकको जन्म दिया, जो सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। दैववश उस बालककी जननी महारानीको बड़े जोरकी प्यास लगी। तब वे पानी पीनेके लिये उस सरोवरमें उतरीं। इतनेमें ही एक बड़े भारी ग्राहने आकर रानीको अपना ग्रास बना लिया। वह बालक पैदा होते ही माता-पितासे हीन हो गया और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस तालाबके किनारे जोर-जोरसे रोने लगा। इतनेमें ही उसपर कृपा करके भगवान् महेश्वर वहाँ आ गये और उस शिशुकी रक्षा करने लगे। उन्हींकी प्रेरणासे एक ब्राह्मणी अकस्मात् वहाँ आ गयी। वह विधवा थी, घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करती थी और अपने एक वर्षके बालकको गोदमें लिये हुए उस तालाबके तटपर पहुँची थी। उसने एक अनाथ शिशुको वहाँ क्रन्दन करते देखा। निर्जन वनमें उस बालकको देखकर ब्राह्मणीको बड़ा विस्मय हुआ और वह मन-ही-मन विचार करने लगी—'अहो! यह मुझे इस समय बड़े आश्चर्यकी बात दिखायी देती है कि यह नवजात शिशु, जिसकी नाल भी अभीतक नहीं कटी है, पृथ्वीपर पड़ा हुआ है। इसकी माँ भी नहीं है। पिता आदि दूसरे कोई सहायक भी यहाँ नहीं दिखायी देते। क्या कारण हो गया? न जाने यह किसका पुत्र है? इसे जाननेवाला यहाँ कोई भी नहीं है, जिससे इसके जन्मके विषयमें पूछूँ। इसे देखकर मेरे हृदयमें करुणा उत्पन्न हो गयी है। मैं इस बालकका अपने औरस पुत्रकी भाँति पालन-पोषण करना चाहती हूँ। परंतु इसके कुल और जन्म आदिका ज्ञान न होनेके

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कारण इसे छूनेका साहस नहीं होता।'

ब्राह्मणी जब इस प्रकार विचार कर रही थी, उस समय भक्तवत्सल भगवान् शंकरने बड़ी कृपा की। बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले महेश्वर एक संन्यासीका रूप धारण करके सहसा वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वह ब्राह्मणी संदेहमें पड़ी हुई थी और यथार्थ बातको जानना चाहती थी। श्रेष्ठ भिक्षुका रूप धारण करके आये हुए करुणानिधान शिवने उससे हँसकर कहा— 'ब्राह्मणी! अपने चित्तमें संदेह और खेदको स्थान न दो। यह बालक परम पवित्र है। तुम इसे अपना ही पुत्र समझो और प्रेमपूर्वक इसका पालन करो।'

ब्राह्मणी बोली—प्रभो! आप मेरे भाग्यसे ही यहाँ पधारे हैं। इसमें संदेह नहीं कि मैं आपकी आज्ञासे इस बालकका अपने पुत्रकी ही भाँति पालन-पोषण करूँगी; तथापि मैं विशेषरूपसे यह जानना चाहती हूँ कि वास्तवमें यह कौन है, किसका पुत्र है, और आप कौन हैं, जो इस समय यहाँ पधारे हैं। भिक्षुवर! मेरे मनमें बार-बार यह बात आती है कि आप करुणासिन्धु शिव ही हैं और यह बालक पूर्वजन्ममें आपका भक्त रहा है। किसी कर्मदोषसे यह इस दुरवस्थामें पड़ गया है। इसे भोगकर यह पुनः आपकी कृपासे परम कल्याणका भागी होगा। मैं भी आपकी मायासे ही मोहित हो मार्ग भूलकर यहाँ आ गयी हूँ। आपने ही इसके पालनके लिये मुझे यहाँ भेजा है।

भिक्षुप्रवर शिवने कहा—ब्राह्मणी! सुनो, यह बालक शिवभक्त विदर्भराज सत्यरथका पुत्र है। सत्यरथको शाल्वदेशीय क्षत्रियोंने युद्धमें मार डाला है। उनकी पत्नी अत्यन्त व्यग्र हो रातमें शीघ्रतापूर्वक अपने महलसे बाहर भाग आयीं। उन्होंने यहाँ आकर इस बालकको जन्म दिया। सबेरा होनेपर वे प्याससे पीड़ित हो सरोवरमें उतरीं। उसी समय दैववश एक ग्राहने आकर उन्हें अपना आहार बना लिया।

ब्राह्मणीने पूछा—भिक्षुदेव! क्या कारण है कि इसके पिता राजा सत्यरथ श्रेष्ठ भोगोंके उपभोगके समय बीचमें ही शाल्वदेशीय शत्रुओंद्वारा मार डाले गये। किस कारणसे इस शिशुकी माताको ग्राहने खा लिया? और यह शिशु जो जन्मसे ही अनाथ और बन्धुहीन हो गया, इसका क्या कारण है? मेरा अपना पुत्र भी अत्यन्त दरिद्र एवं भिक्षुक क्यों हुआ तथा मेरे इन दोनों पुत्रोंको भविष्यमें कैसे सुख प्राप्त होगा?

भिक्षुवर्य शिवने कहा—इस राजकुमारके पिता विदर्भराज पूर्वजन्ममें पाण्ड्यदेशके श्रेष्ठ राजा थे। वे सब धर्मोंके ज्ञाता थे और सम्पूर्ण पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करते थे। एक दिन प्रदोषकालमें राजा भगवान् शंकरका पूजन कर रहे थे और बड़ी भक्तिसे त्रिलोकीनाथ महादेवजीकी आराधनामें संलग्न थे। उसी समय नगरमें सब ओर बड़ा भारी कोलाहल मचा। उस उत्कट शब्दको सुनकर राजाने बीचमें ही भगवान् शंकरकी पूजा छोड़ दी और नगरमें क्षोभ फैलनेकी आशंकासे राजभवनसे बाहर निकल गये। इसी समय राजाका महाबली मन्त्री शत्रुको पकड़कर उनके समीप ले आया। वह शत्रु पाण्ड्यराजका ही सामन्त था। उसे देखकर राजाने क्रोधपूर्वक उसका मस्तक कटवा दिया। शिवपूजा छोड़कर

* शतरुद्रसंहिता * | ४७९

नियमको समाप्त किये बिना ही राजाने रातमें भोजन भी कर लिया। इसी प्रकार राजकुमार भी प्रदोषकालमें शिवजीकी पूजा किये बिना ही भोजन करके सो गया। वही राजा दूसरे जन्ममें विदर्भराज हुआ था। शिवजीकी पूजामें विघ्न होनेके कारण शत्रुओंने उसको सुख-भोगके बीचमें ही मार डाला। पूर्वजन्ममें जो उसका पुत्र था, वही इस जन्ममें भी हुआ है। शिवजीकी पूजाका उल्लंघन करनेके कारण यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। इसकी माताने पूर्वजन्ममें छलसे अपनी सौतको मार डाला था। उस महान् पापके कारण ही वह इस जन्ममें ग्राहके द्वारा मारी गयी। ब्राह्मणी! यह तुम्हारा पुत्र पूर्वजन्ममें उत्तम ब्राह्मण था। इसने सारी आयु केवल दान लेनेमें बितायी है, यज्ञ आदि सत्कर्म नहीं किये हैं। इसीलिये यह दरिद्रताको प्राप्त हुआ है। उस दोषका निवारण करनेके लिये अब तुम भगवान् शंकरकी शरणमें जाओ। ये दोनों बालक यज्ञोपवीत-संस्कारके पश्चात् भगवान् शिवकी आराधना करें। भगवान् शिव इनका कल्याण करेंगे।

इस प्रकार ब्राह्मणीको उपदेश देकर भिक्षु (श्रेष्ठ संन्यासी)-का शरीर धारण करनेवाले भक्तवत्सल शिवने उसे अपने उत्तम स्वरूपका दर्शन कराया। उन्हें साक्षात् शिव जानकर ब्राह्मणपत्नीने प्रणाम किया और प्रेमसे गद्गदवाणीद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर ब्राह्मणी उस बालकको लेकर अपने पुत्रके साथ घरको चली गयी। एकचक्रा नामके सुन्दर ग्राममें उसने घर बना रखा था। वह उत्तम अन्नसे अपने बेटे तथा राजकुमारका भी पालन-पोषण करने लगी। यथासमय ब्राह्मणोंने उन दोनोंका यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया। वे दोनों शिवकी पूजामें तत्पर रहते हुए घरपर ही बड़े हुए। शाण्डिल्य मुनिके उपदेशसे नियमपरायण हो वे दोनों शुभ व्रत रखकर प्रदोषकालमें शंकरजीकी पूजा करते थे। एक दिन द्विजकुमार राजकुमारको साथ लिये बिना ही नदीमें स्नान करनेके लिये गया। वहाँ उसे निधिसे भरा हुआ एक सुन्दर कलश मिल गया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी पूजा करते हुए उन दोनों कुमारोंका उसी घरमें एक वर्ष व्यतीत हो गया। तदनन्तर एक दिन राजकुमार उस ब्राह्मणकुमारके साथ वनमें गया। वहाँ अकस्मात् एक गन्धर्वकन्या आ गयी। उसके पिताने वह कन्या राजकुमारको दे दी। गन्धर्व-कन्यासे विवाह करके राजकुमार निष्कण्टक राज्य भोगने लगे। जिस ब्राह्मणपत्नीने पहले अपने पुत्रकी भाँति उसका पालन-पोषण किया था, वही उस समय राजमाता हुई और वह ब्राह्मणकुमार

४८० * संक्षिप्त शिवपुराण *

उसका भाई हुआ। राजाका नाम धर्मगुप्त था। इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके राजा धर्मगुप्त अपनी उस रानीके साथ विदर्भदेशमें राजोचित सुखका उपभोग करने लगा। यह मैंने तुमसे शिवके भिक्षुवर्य अवतारका वर्णन किया है, जिन्होंने राजा धर्मगुप्तको बाल्यकालमें सुख प्रदान किया था। यह पवित्र आख्यान पापहारी, परम-पावन, चारों पुरुषार्थोंका साधक तथा सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर इसे सुनता या सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। (अध्याय ३१)


शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा, उपमन्युकी तपस्या और उन्हें उत्तम वरकी प्राप्ति

नन्दीश्वर कहते हैं—सनत्कुमारजी! अब मैं परमात्मा शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन करूँगा, जिन्होंने धौम्यके बड़े भाई उपमन्युका हितसाधन किया था। उपमन्यु व्याघ्रपाद मुनिके पुत्र थे। उन्होंने पूर्वजन्ममें ही सिद्धि प्राप्त कर ली थी और वर्तमान जन्ममें मुनिकुमारके रूपमें प्रकट हुए थे। वे शैशवावस्थासे ही माताके साथ मामाके घरमें रहते थे और दैववश दरिद्र थे। एक दिन उन्हें बहुत कम दूध पीनेको मिला। इसलिये अपनी मातासे वे बारंबार दूध माँगने लगे। उनकी तपस्विनी माताने घरके भीतर जाकर एक उपाय किया। उंछवृत्तिसे लाये हुए कुछ बीजोंको सिलपर पीसा और उन्हें पानीमें घोलकर कृत्रिम दूध तैयार किया। फिर बेटेको पुचकारकर वह उसे पीनेको दिया। माँके दिये हुए उस नकली दूधको पीकर बालक उपमन्यु बोले—'यह तो दूध नहीं है।' इतना कहकर वे फिर रोने लगे। बेटेका रोना-धोना सुनकर माँको बड़ा दुःख हुआ। अपने हाथसे उपमन्युकी दोनों आँखें पोंछकर उनकी लक्ष्मी-जैसी माताने कहा—'बेटा! हमलोग सदा वनमें निवास करते हैं। हमें यहाँ दूध कहाँसे मिल सकता है। भगवान् शिवकी कृपाके बिना किसीको दूध नहीं मिलता। वत्स ! पूर्वजन्ममें भगवान् शिवके लिये जो कुछ किया गया है, वर्तमान जन्ममें वही मिलता है।'

माताकी यह बात सुनकर उपमन्युने भगवान् शिवकी आराधना करनेका निश्चय किया। वे तपस्याके लिये हिमालय पर्वतपर गये और वहाँ वायु पीकर रहने लगे। उन्होंने आठ ईंटोंका एक मन्दिर बनाया और उसके भीतर मिट्टीके शिवलिंगकी स्थापना करके उसमें माता पार्वतीसहित शिवका आवाहन किया। तत्पश्चात् जंगलके पत्र-पुष्प आदि ले आकर भक्तिभावसे पंचाक्षर-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक साम्ब शिवकी पूजा करने लगे। माता पार्वती और शिवका ध्यान करके उनकी पूजा करनेके पश्चात् वे पंचाक्षर मन्त्रका जप किया करते थे। इस तरह दीर्घकालतक उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की।

मुने! बालक उपमन्युकी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित त्रिभुवन संतप्त हो उठा। तब देवताओंकी प्रार्थनासे उपमन्युके

* शतरुद्रसंहिता * ४८१

भक्तिभावकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शंकर उनके समीप पधारे। उस समय शिवने देवराज इन्द्रका, पार्वती ने शचीका, नन्दीश्वर वृषभने ऐरावत हाथीका तथा शिवके गणोंने सम्पूर्ण देवताओंका रूप धारण कर लिया। निकट आनेपर सुरेश्वर-रूपधारी शिवने बालक उपमन्युको वर माँगनेके लिये कहा। उपमन्युने पहले तो शिवभक्ति माँगी, फिर अपनेको इन्द्र बताकर जब उन्होंने शिवकी निन्दा की, तब उस बालकने भगवान् शिवके अतिरिक्त दूसरे किसीसे कुछ भी लेना अस्वीकार कर दिया। वे इन्द्रको मारकर स्वयं भी मर जानेको उद्यत हो गये। उन्होंने जो अघोरास्त्र चलाया, उसे नन्दीने पकड़ लिया और उन्होंने अपनेको जलानेके लिये जो अग्निकी धारणा की, उसे भगवान् शिवने शान्त कर दिया। फिर वे सब-के-सब अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रकट हो गये। शिवने उपमन्युको अपना पुत्र माना और उनका मस्तक सूँघकर कहा— 'वत्स! मैं तुम्हारा पिता और ये पार्वतीदेवी तुम्हारी माता हैं। तुम्हें आजसे सनातनकुमारत्व प्राप्त होगा। मैं तुम्हारे लिये दूध, दही और मधुके सहस्रों समुद्र देता हूँ। भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंके भी समुद्र तुम्हारे लिये सुलभ होंगे। मैं तुम्हें अमरत्व तथा अपने गणोंका आधिपत्य प्रदान करता हूँ।' ऐसा कहकर शम्भुने उपमन्युको बहुतसे दिव्य वर दिये। पाशुपत-व्रत, पाशुपत-ज्ञान तथा व्रतयोगका उपदेश किया। प्रवचनकी शक्ति दी और अपना परम पद अर्पित किया। फिर दोनों हाथोंसे उपमन्युको हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और देवी पार्वतीको सौंपते हुए कहा— 'यह तुम्हारा बेटा है।' पार्वती ने भी बड़े प्यारसे उनके मस्तकपर अपना करकमल रखा और उन्हें अक्षय कुमारपद प्रदान किया। शिवने संतुष्ट होकर उनके लिये पिण्डीभूत एवं अविनाशी साकार क्षीर-सागर प्रस्तुत कर दिया। साथ ही योगसम्बन्धी ऐश्वर्य, नित्य संतोष, अक्षय ब्रह्मविद्या तथा उत्तम समृद्धि प्रदान की। उनके कुल और गोत्रके अक्षय होनेका वरदान दिया और यह भी कहा कि मैं तुम्हारे इस आश्रमपर नित्य निवास करूँगा।

इतना कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। उपमन्यु वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक घर आये। उन्होंने मातासे सब बातें बतायीं। सुनकर माताको बड़ा हर्ष हुआ। उपमन्यु सबके पूजनीय और अधिक सुखी हो गये। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन किया है। यह अवतार सत्पुरुषोंको सदा ही सुख देनेवाला है। सुरेश्वरावतारकी यह कथा पापको दूर करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाली है। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।

(अध्याय ३२)

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789 संक्षिप्त शिवपुराण—16 A

४८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

शिवजीके किरातावतारके प्रसंगमें श्रीकृष्णद्वारा द्वैतवनमें दुर्वासाके शापसे पाण्डवोंकी रक्षा, व्यासजीका अर्जुनको शक्रविद्या और पार्थिवपूजनकी विधि बताकर तपके लिये सम्मति देना, अर्जुनका इन्द्रकील पर्वतपर तप, इन्द्रका आगमन और अर्जुनको वरदान, अर्जुनका शिवजीके उद्देश्यसे पुनः तपमें प्रवृत्त होना

तदनन्तर पार्वतीके विवाहप्रसंगमें हुए जटिल, नर्तक तथा द्विज अवतारोंकी, फिर अश्वत्थामा-अवतारकी बात कहकर नन्दीश्वरजी आगे कहते हैं—बुद्धिमान् सनत्कुमारजी! अब तुम पिनाकधारी भगवान् शिवके किरात नामक अवतारका वर्णन सुनो। उस अवतारमें उन्होंने मूक नामक दैत्यका वध और प्रसन्न होकर अर्जुनको वर प्रदान किया था। जब सुयोधनने महाबली पाण्डवोंको ( जूएमें ) जीत लिया, तब वे सती-साध्वी द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें चले आये। वहीं वे पाण्डव सूर्यद्वारा दी हुई बटलोईका आश्रय लेकर सुखपूर्वक अपना समय बिताने लगे। प्रियवर! उसी समय सुयोधनने आदरपूर्वक मुनिवर दुर्वासाको छल करनेके प्रयोजनसे पाण्डवोंके निकट जानेके लिये प्रेरित किया। तब महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंके साथ आनन्दपूर्वक वहाँ गये और पाण्डवोंसे मनोऽनुकूल भोजनकी याचना की। तब उन सभी पाण्डवोंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दुर्वासा आदि तपस्वी मुनियोंको स्नान करनेके लिये भेजा। मुनीश्वर! इधर अन्नाभावके कारण वे सभी पाण्डव बड़े संकटमें पड़ गये और मन-ही-मन प्राण त्याग देनेका विचार करने लगे। तब द्रौपदीने श्रीकृष्णका स्मरण किया। वे तत्काल ही वहाँ आ पहुँचे और शाक ( के पत्ते )-का भोग लगाकर उन सभी तपस्वियोंको तृप्त कर दिया। फिर तो महर्षि दुर्वासा अपने शिष्योंको तृप्त हुआ जानकर वहाँसे चलते बने। इस प्रकार श्रीकृष्णकी कृपासे उस समय पाण्डव संकटसे मुक्त हुए।

तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको शिवजीकी आराधना करनेकी सम्मति दी। फिर व्यासजीने भी आकर उन्हें शंकरके समाराधनका आदेश देते हुए कहा—'शिवजी सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाले हैं। वे भक्ति करनेसे थोड़े ही समयमें प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिये सभी लोगोंको शंकरजीकी सेवा करनी चाहिये। वे महेश्वर प्रसन्न होनेपर भक्तोंकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं, यहाँतक कि वे इस लोकमें सारा भोग और परलोकमें मोक्षतक दे डालते हैं—यह बिलकुल निश्चित बात है। इसलिये भुक्ति-मुक्तिरूपी फलकी कामनावाले मनुष्योंको सदा शम्भुकी सेवा करनी चाहिये; क्योंकि भगवान् शंकर साक्षात् परम पुरुष, दुष्टोंके संहारक और सत्पुरुषोंके आश्रय-स्वरूप हैं। अब अर्जुन पहले दृढ़तापूर्वक शक्रविद्याका जप करें। तब इन्द्र पहले परीक्षा लेंगे, पीछे संतुष्ट हो जायेंगे। प्रसन्न होनेपर वे सर्वदा विघ्नोंका नाश करते रहेंगे और फिर शिवजीका श्रेष्ठ मन्त्र प्रदान करेंगे।'


789 संक्षिप्त शिवपुराण—16 B

* शतरुद्रसंहिता * ४८३

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इतना कहकर व्यासजी अर्जुनको बुलाकर उन्हें शक्रविद्याका उपदेश देनेको उद्यत हुए, तब तीक्ष्णबुद्धि अर्जुनने स्नान करके पूर्वमुख बैठकर उस विद्याको ग्रहण कर लिया। फिर उदारबुद्धि मुनिवर व्यासजीने अर्जुनको पार्थिवलिंगके पूजनका विधान बतलाकर उनसे कहा।

व्यासजी बोले—‘पार्थ! अब तुम यहाँसे परम रमणीय इन्द्रकील पर्वतपर जाओ और वहाँ जाह्नवीके तटपर बैठकर सम्यक्-रूपसे तपस्या करो। यह विद्या अदृश्यरूपसे सदा तुम्हारा हित करती रहेगी।’ अर्जुनको ऐसा आशीर्वाद देकर व्यासजी पाण्डवोंसे कहने लगे—‘नृपश्रेष्ठो! तुम सब लोग धर्मपर दृढ़ बने रहो, इससे तुम्हें सर्वथा श्रेष्ठ सिद्धि प्राप्त होगी; इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।’

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार मुनिवर व्यास उन पाण्डवोंको आशीर्वाद दे तथा शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करके तुरंत ही अन्तर्धान हो गये। उधर शिव-मन्त्रके धारण करनेसे अर्जुनमें भी अनुपम तेज व्याप्त हो गया। वे उस समय उद्दीप्त हो उठे। अर्जुनको देखकर सभी पाण्डवोंको निश्चय हो गया कि अवश्य ही हमारी विजय होगी; क्योंकि अर्जुनमें विपुल तेज उत्पन्न हो गया है। (तब उन्होंने अर्जुनसे कहा—) ‘व्यासजीके कथनसे ऐसा प्रतीत होता है कि इस कार्यको केवल तुम्हीं कर सकते हो, यह दूसरेके द्वारा कभी भी सिद्ध नहीं हो सकता; अतः जाओ और हमलोगोंका जीवन सफल बनाओ।’ तब अर्जुनने चारों भाइयों तथा द्रौपदीसे अनुमति माँगी। उन लोगोंको अर्जुनके विछोहका दुःख तो हुआ, पर कार्यकी महत्ता देखकर सभीने अनुमति दे दी। फिर तो अर्जुन मन-ही-मन प्रसन्न होते हुए उस उत्तम पर्वत (इन्द्रकील)-को चले गये। वहाँ पहुँचकर वे गंगाजीके समीप एक मनोरम स्थानपर, जो स्वर्गसे भी उत्तम और अशोकवनसे सुशोभित था, ठहर गये। वहाँ उन्होंने स्नान करके गुरुवरको नमस्कार किया और जैसा उपदेश मिला था, उसीके अनुसार स्वयं ही अपना वेष बनाया। फिर पहले मन-ही-मन इन्द्रियोंका अपकर्ष करके वे आसन लगाकर बैठ गये। तत्पश्चात् समसूत्रवाले सुन्दर पार्थिव (शिवलिंग)-का निर्माण करके उनके आगे अनुपम तेजोराशि शंकरका ध्यान करने लगे। वे तीनों समय स्नान करके अनेक प्रकारसे बारंबार शिवजीकी पूजा करते हुए उपासनामें तत्पर हो गये। तब अर्जुनके शिरोभागसे तेजकी ज्वाला निकलने लगी। उसे देखकर इन्द्रके


789 संक्षिप्त शिवपुराण—16 C

४८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

गुप्तचर भयभीत हो गये। वे सोचने लगे— यह यहाँ कब आ गया? पुनः उन्होंने ऐसा विचार किया कि यह घटना इन्द्रको बतला देनी चाहिये। ऐसा सोचकर वे तत्काल ही इन्द्रके समीप गये।

गुप्तचरोंने कहा—देवेश! वनमें एक पुरुष तप कर रहा है; परंतु हमें पता नहीं कि वह देवता है, ऋषि है, सूर्य है अथवा अग्नि है। उसीके तेजसे संतप्त होकर हम आपके संनिकट आये हैं। हमने उसका चरित्र भी आपसे निवेदित कर दिया। अब आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! उन गुप्तचरोंके यों कहनेपर इन्द्रको अपने पुत्र अर्जुनका सारा मनोरथ ज्ञात हो गया। तब वे पर्वतरक्षकोंको विदा करके स्वयं वहाँ जानेका विचार करने लगे। विप्रवर! इन्द्र अर्जुनकी परीक्षा करनेके लिये वृद्ध ब्रह्मचारी ब्राह्मणका वेष बनाकर वहाँ पहुँचे। उस समय उन्हें आया हुआ देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उनकी पूजा की और फिर उनकी स्तुति करके आगे खड़े हो पूछने लगे—'ब्रह्मन्! बताइये, इस समय कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?' इसपर ब्राह्मणवेषधारी इन्द्रने अर्जुनको ऐसे वचन कहे, जिससे वह तपसे डिग जाय; पर जब अर्जुनको दृढ़निश्चय देखा, तब अपने स्वरूपमें प्रकट होकर इन्द्रने अर्जुनको भगवान् शंकरका मन्त्र बताया और उसका जप करनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर अपने अनुचरोंको सावधानीके साथ अर्जुनकी रक्षा करनेका आदेश देकर वे अर्जुनसे बोले—'भद्र! तुम्हें कभी भी प्रमादपूर्वक राज्य नहीं करना चाहिये। परंतप! यह विद्या तुम्हारे लिये श्रेयस्करी होगी। साधकको सर्वथा धैर्य धारण किये रहना चाहिये, रक्षक तो भगवान् शिव हैं ही। वे सम्पत्तियाँ और फल (मोक्ष) दोनों समानरूपसे देंगे। इसमें तनिक भी संशय नहीं है।'

नन्दीश्वरजी कहते हैं—मुने! इस प्रकार अर्जुनको वरदान देकर देवराज इन्द्र शिवजीके चरणकमलोंका स्मरण करते हुए अपने भवनको लौट गये। तब महावीर अर्जुनने भी सुरेश्वरको प्रणाम किया और फिर वे मनको वशमें करके इन्द्रके उपदेशानुसार शिवजीके उद्देश्यसे तपस्या करने लगे।

(अध्याय ३३—३८)


789 संक्षिप्त शिवपुराण—16 D

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