भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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४७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

उनके चरणोंमें गिरा दिया और कहा— 'दीनानाथ महादेव! यह इन्द्र आपके चरणोंमें पड़ा है। आप इसका और मेरा उद्धार करें। हम दोनोंपर क्रोध नहीं, प्रेम करें। महादेव! शरणागत इन्द्रकी रक्षा कीजिये। आपके ललाटसे प्रकट हुई यह आग इन्हें जलानेके लिये आ रही है।'

बृहस्पतिकी यह बात सुनकर अवधूत-वेषधारी करुणासिन्धु शिवने हँसते हुए कहा—'अपने नेत्रसे रोषवश बाहर निकली हुई अग्निको मैं पुनः कैसे धारण कर सकता हूँ। क्या सर्प अपनी छोड़ी हुई केंचुलको फिर ग्रहण करता है?'

बृहस्पति बोले—देव! भगवन्! भक्त सदा ही कृपाके पात्र होते हैं। आप अपने भक्तवत्सल नामको चरितार्थ कीजिये और इस भयंकर तेजको कहीं अन्यत्र डाल दीजिये।

रुद्रने कहा—देवगुरो! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। इसलिये उत्तम वर देता हूँ। इन्द्रको जीवनदान देनेके कारण आजसे तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा। मेरे ललाटवर्ती नेत्रसे जो यह आग प्रकट हुई है, इसे देवता नहीं सह सकते। अतः इसको मैं बहुत दूर छोड़ूँगा, जिससे यह इन्द्रको पीड़ा न दे सके।

ऐसा कहकर अपने तेजःस्वरूप उस अद्भुत अग्निको हाथमें लेकर भगवान् शिवने क्षार समुद्रमें फेंक दिया। वहाँ फेंके जाते ही भगवान् शिवका वह तेज तत्काल एक बालकके रूपमें परिणत हो गया, जो सिन्धुपुत्र जलन्धर नामसे विख्यात हुआ। फिर देवताओंकी प्रार्थनासे भगवान् शिवने ही असुरोंके स्वामी जलन्धरका वध किया था। अवधूतरूपसे ऐसी सुन्दर लीला करके लोककल्याणकारी शंकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। फिर सब देवता अत्यन्त निर्भय एवं सुखी हुए। इन्द्र और बृहस्पति भी उस भयसे मुक्त हो उत्तम सुखके भागी हुए। जिसके लिये उनका आना हुआ था, वह भगवान् शिवका दर्शन पाकर कृतार्थ हुए। इन्द्र और बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चले गये। सनत्कुमार! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतारका वर्णन किया है, जो दुष्टोंको दण्ड एवं भक्तोंको परम आनन्द प्रदान करनेवाला है। यह दिव्य आख्यान पापका निवारण करके यश, स्वर्ग, भोग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलकी प्राप्ति करानेवाला है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसे सुनता या सुनाता है, वह इह लोकमें सम्पूर्ण सुखोंका उपभोग करके अन्तमें शिवकी गति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय ३०)