शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* शतरुद्रसंहिता * ४७७
भगवान् शिवके भिक्षुवर्यावतारकी कथा, राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा
नन्दीश्वर कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ! अब तुम भगवान् शम्भुके नारी-संदेहभंजक भिक्षु-अवतारका वर्णन सुनो, जिसे उन्होंने अपने भक्तपर दया करके ग्रहण किया था। विदर्भ देशमें सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो धर्ममें तत्पर, सत्यशील और बड़े-बड़े शिवभक्तोंसे प्रेम करनेवाले थे। धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हुए उनका बहुत-सा समय सुखपूर्वक बीत गया। तदनन्तर किसी समय शाल्वदेशके राजाओंने उस राजाकी राजधानीपर आक्रमण करके उसे चारों ओरसे घेर लिया। बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ, जिनके पास बहुत बड़ी सेना थी, राजा सत्यरथका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। शत्रुओंके साथ दारुण युद्ध करके उनकी बड़ी भारी सेना नष्ट हो गयी। फिर दैवयोगसे राजा भी शाल्वोंके हाथसे मारे गये। उन नरेशके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए सैनिक मन्त्रियोंसहित भयसे विह्वल हो भाग खड़े हुए। मुने! उस समय विदर्भराज सत्यरथकी महारानी शत्रुओंसे घिरी होनेपर भी कोई प्रयत्न करके रातके समय अपने नगरसे बाहर निकल गयीं। वे गर्भवती थीं; अतः शोकसे संतप्त हो भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई वे धीरे-धीरे पूर्वदिशाकी ओर बहुत दूर चली गयीं। सबेरा होनेपर रानीने भगवान् शंकरकी दयासे एक निर्मल सरोवर देखा। उस समयतक वे बहुत दूरका रास्ता तय कर चुकी थीं। सरोवरके तटपर आकर वे सुकुमारी रानी एक छायादार वृक्षके नीचे बैठ गयीं। भाग्यवश उसी निर्जन स्थानमें वृक्षके नीचे ही रानीने उत्तम गुणोंसे युक्त शुभ मुहूर्तमें एक दिव्य बालकको जन्म दिया, जो सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न था। दैववश उस बालककी जननी महारानीको बड़े जोरकी प्यास लगी। तब वे पानी पीनेके लिये उस सरोवरमें उतरीं। इतनेमें ही एक बड़े भारी ग्राहने आकर रानीको अपना ग्रास बना लिया। वह बालक पैदा होते ही माता-पितासे हीन हो गया और भूख-प्याससे पीड़ित हो उस तालाबके किनारे जोर-जोरसे रोने लगा। इतनेमें ही उसपर कृपा करके भगवान् महेश्वर वहाँ आ गये और उस शिशुकी रक्षा करने लगे। उन्हींकी प्रेरणासे एक ब्राह्मणी अकस्मात् वहाँ आ गयी। वह विधवा थी, घर-घर भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करती थी और अपने एक वर्षके बालकको गोदमें लिये हुए उस तालाबके तटपर पहुँची थी। उसने एक अनाथ शिशुको वहाँ क्रन्दन करते देखा। निर्जन वनमें उस बालकको देखकर ब्राह्मणीको बड़ा विस्मय हुआ और वह मन-ही-मन विचार करने लगी—'अहो! यह मुझे इस समय बड़े आश्चर्यकी बात दिखायी देती है कि यह नवजात शिशु, जिसकी नाल भी अभीतक नहीं कटी है, पृथ्वीपर पड़ा हुआ है। इसकी माँ भी नहीं है। पिता आदि दूसरे कोई सहायक भी यहाँ नहीं दिखायी देते। क्या कारण हो गया? न जाने यह किसका पुत्र है? इसे जाननेवाला यहाँ कोई भी नहीं है, जिससे इसके जन्मके विषयमें पूछूँ। इसे देखकर मेरे हृदयमें करुणा उत्पन्न हो गयी है। मैं इस बालकका अपने औरस पुत्रकी भाँति पालन-पोषण करना चाहती हूँ। परंतु इसके कुल और जन्म आदिका ज्ञान न होनेके