भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 495

* शतरुद्रसंहिता * ४८१

भक्तिभावकी परीक्षा लेनेके लिये भगवान् शंकर उनके समीप पधारे। उस समय शिवने देवराज इन्द्रका, पार्वती ने शचीका, नन्दीश्वर वृषभने ऐरावत हाथीका तथा शिवके गणोंने सम्पूर्ण देवताओंका रूप धारण कर लिया। निकट आनेपर सुरेश्वर-रूपधारी शिवने बालक उपमन्युको वर माँगनेके लिये कहा। उपमन्युने पहले तो शिवभक्ति माँगी, फिर अपनेको इन्द्र बताकर जब उन्होंने शिवकी निन्दा की, तब उस बालकने भगवान् शिवके अतिरिक्त दूसरे किसीसे कुछ भी लेना अस्वीकार कर दिया। वे इन्द्रको मारकर स्वयं भी मर जानेको उद्यत हो गये। उन्होंने जो अघोरास्त्र चलाया, उसे नन्दीने पकड़ लिया और उन्होंने अपनेको जलानेके लिये जो अग्निकी धारणा की, उसे भगवान् शिवने शान्त कर दिया। फिर वे सब-के-सब अपने यथार्थ स्वरूपमें प्रकट हो गये। शिवने उपमन्युको अपना पुत्र माना और उनका मस्तक सूँघकर कहा— 'वत्स! मैं तुम्हारा पिता और ये पार्वतीदेवी तुम्हारी माता हैं। तुम्हें आजसे सनातनकुमारत्व प्राप्त होगा। मैं तुम्हारे लिये दूध, दही और मधुके सहस्रों समुद्र देता हूँ। भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थोंके भी समुद्र तुम्हारे लिये सुलभ होंगे। मैं तुम्हें अमरत्व तथा अपने गणोंका आधिपत्य प्रदान करता हूँ।' ऐसा कहकर शम्भुने उपमन्युको बहुतसे दिव्य वर दिये। पाशुपत-व्रत, पाशुपत-ज्ञान तथा व्रतयोगका उपदेश किया। प्रवचनकी शक्ति दी और अपना परम पद अर्पित किया। फिर दोनों हाथोंसे उपमन्युको हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा और देवी पार्वतीको सौंपते हुए कहा— 'यह तुम्हारा बेटा है।' पार्वती ने भी बड़े प्यारसे उनके मस्तकपर अपना करकमल रखा और उन्हें अक्षय कुमारपद प्रदान किया। शिवने संतुष्ट होकर उनके लिये पिण्डीभूत एवं अविनाशी साकार क्षीर-सागर प्रस्तुत कर दिया। साथ ही योगसम्बन्धी ऐश्वर्य, नित्य संतोष, अक्षय ब्रह्मविद्या तथा उत्तम समृद्धि प्रदान की। उनके कुल और गोत्रके अक्षय होनेका वरदान दिया और यह भी कहा कि मैं तुम्हारे इस आश्रमपर नित्य निवास करूँगा।

इतना कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। उपमन्यु वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक घर आये। उन्होंने मातासे सब बातें बतायीं। सुनकर माताको बड़ा हर्ष हुआ। उपमन्यु सबके पूजनीय और अधिक सुखी हो गये। तात! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन किया है। यह अवतार सत्पुरुषोंको सदा ही सुख देनेवाला है। सुरेश्वरावतारकी यह कथा पापको दूर करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाली है। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह सम्पूर्ण सुखोंको भोगकर अन्तमें भगवान् शिवको प्राप्त होता है।

(अध्याय ३२)

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789 संक्षिप्त शिवपुराण—16 A