भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 494

४८० * संक्षिप्त शिवपुराण *

उसका भाई हुआ। राजाका नाम धर्मगुप्त था। इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके राजा धर्मगुप्त अपनी उस रानीके साथ विदर्भदेशमें राजोचित सुखका उपभोग करने लगा। यह मैंने तुमसे शिवके भिक्षुवर्य अवतारका वर्णन किया है, जिन्होंने राजा धर्मगुप्तको बाल्यकालमें सुख प्रदान किया था। यह पवित्र आख्यान पापहारी, परम-पावन, चारों पुरुषार्थोंका साधक तथा सम्पूर्ण अभीष्टको देनेवाला है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर इसे सुनता या सुनाता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। (अध्याय ३१)


शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा, उपमन्युकी तपस्या और उन्हें उत्तम वरकी प्राप्ति

नन्दीश्वर कहते हैं—सनत्कुमारजी! अब मैं परमात्मा शिवके सुरेश्वरावतारका वर्णन करूँगा, जिन्होंने धौम्यके बड़े भाई उपमन्युका हितसाधन किया था। उपमन्यु व्याघ्रपाद मुनिके पुत्र थे। उन्होंने पूर्वजन्ममें ही सिद्धि प्राप्त कर ली थी और वर्तमान जन्ममें मुनिकुमारके रूपमें प्रकट हुए थे। वे शैशवावस्थासे ही माताके साथ मामाके घरमें रहते थे और दैववश दरिद्र थे। एक दिन उन्हें बहुत कम दूध पीनेको मिला। इसलिये अपनी मातासे वे बारंबार दूध माँगने लगे। उनकी तपस्विनी माताने घरके भीतर जाकर एक उपाय किया। उंछवृत्तिसे लाये हुए कुछ बीजोंको सिलपर पीसा और उन्हें पानीमें घोलकर कृत्रिम दूध तैयार किया। फिर बेटेको पुचकारकर वह उसे पीनेको दिया। माँके दिये हुए उस नकली दूधको पीकर बालक उपमन्यु बोले—'यह तो दूध नहीं है।' इतना कहकर वे फिर रोने लगे। बेटेका रोना-धोना सुनकर माँको बड़ा दुःख हुआ। अपने हाथसे उपमन्युकी दोनों आँखें पोंछकर उनकी लक्ष्मी-जैसी माताने कहा—'बेटा! हमलोग सदा वनमें निवास करते हैं। हमें यहाँ दूध कहाँसे मिल सकता है। भगवान् शिवकी कृपाके बिना किसीको दूध नहीं मिलता। वत्स ! पूर्वजन्ममें भगवान् शिवके लिये जो कुछ किया गया है, वर्तमान जन्ममें वही मिलता है।'

माताकी यह बात सुनकर उपमन्युने भगवान् शिवकी आराधना करनेका निश्चय किया। वे तपस्याके लिये हिमालय पर्वतपर गये और वहाँ वायु पीकर रहने लगे। उन्होंने आठ ईंटोंका एक मन्दिर बनाया और उसके भीतर मिट्टीके शिवलिंगकी स्थापना करके उसमें माता पार्वतीसहित शिवका आवाहन किया। तत्पश्चात् जंगलके पत्र-पुष्प आदि ले आकर भक्तिभावसे पंचाक्षर-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक साम्ब शिवकी पूजा करने लगे। माता पार्वती और शिवका ध्यान करके उनकी पूजा करनेके पश्चात् वे पंचाक्षर मन्त्रका जप किया करते थे। इस तरह दीर्घकालतक उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की।

मुने! बालक उपमन्युकी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित त्रिभुवन संतप्त हो उठा। तब देवताओंकी प्रार्थनासे उपमन्युके