शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवजीके किरातावतारके प्रसंगमें श्रीकृष्णद्वारा द्वैतवनमें दुर्वासाके शापसे पाण्डवोंकी रक्षा, व्यासजीका अर्जुनको शक्रविद्या और पार्थिवपूजनकी विधि बताकर तपके लिये सम्मति देना, अर्जुनका इन्द्रकील पर्वतपर तप, इन्द्रका आगमन और अर्जुनको वरदान, अर्जुनका शिवजीके उद्देश्यसे पुनः तपमें प्रवृत्त होना
तदनन्तर पार्वतीके विवाहप्रसंगमें हुए जटिल, नर्तक तथा द्विज अवतारोंकी, फिर अश्वत्थामा-अवतारकी बात कहकर नन्दीश्वरजी आगे कहते हैं—बुद्धिमान् सनत्कुमारजी! अब तुम पिनाकधारी भगवान् शिवके किरात नामक अवतारका वर्णन सुनो। उस अवतारमें उन्होंने मूक नामक दैत्यका वध और प्रसन्न होकर अर्जुनको वर प्रदान किया था। जब सुयोधनने महाबली पाण्डवोंको ( जूएमें ) जीत लिया, तब वे सती-साध्वी द्रौपदीके साथ द्वैतवनमें चले आये। वहीं वे पाण्डव सूर्यद्वारा दी हुई बटलोईका आश्रय लेकर सुखपूर्वक अपना समय बिताने लगे। प्रियवर! उसी समय सुयोधनने आदरपूर्वक मुनिवर दुर्वासाको छल करनेके प्रयोजनसे पाण्डवोंके निकट जानेके लिये प्रेरित किया। तब महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंके साथ आनन्दपूर्वक वहाँ गये और पाण्डवोंसे मनोऽनुकूल भोजनकी याचना की। तब उन सभी पाण्डवोंने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दुर्वासा आदि तपस्वी मुनियोंको स्नान करनेके लिये भेजा। मुनीश्वर! इधर अन्नाभावके कारण वे सभी पाण्डव बड़े संकटमें पड़ गये और मन-ही-मन प्राण त्याग देनेका विचार करने लगे। तब द्रौपदीने श्रीकृष्णका स्मरण किया। वे तत्काल ही वहाँ आ पहुँचे और शाक ( के पत्ते )-का भोग लगाकर उन सभी तपस्वियोंको तृप्त कर दिया। फिर तो महर्षि दुर्वासा अपने शिष्योंको तृप्त हुआ जानकर वहाँसे चलते बने। इस प्रकार श्रीकृष्णकी कृपासे उस समय पाण्डव संकटसे मुक्त हुए।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको शिवजीकी आराधना करनेकी सम्मति दी। फिर व्यासजीने भी आकर उन्हें शंकरके समाराधनका आदेश देते हुए कहा—'शिवजी सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाले हैं। वे भक्ति करनेसे थोड़े ही समयमें प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिये सभी लोगोंको शंकरजीकी सेवा करनी चाहिये। वे महेश्वर प्रसन्न होनेपर भक्तोंकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं, यहाँतक कि वे इस लोकमें सारा भोग और परलोकमें मोक्षतक दे डालते हैं—यह बिलकुल निश्चित बात है। इसलिये भुक्ति-मुक्तिरूपी फलकी कामनावाले मनुष्योंको सदा शम्भुकी सेवा करनी चाहिये; क्योंकि भगवान् शंकर साक्षात् परम पुरुष, दुष्टोंके संहारक और सत्पुरुषोंके आश्रय-स्वरूप हैं। अब अर्जुन पहले दृढ़तापूर्वक शक्रविद्याका जप करें। तब इन्द्र पहले परीक्षा लेंगे, पीछे संतुष्ट हो जायेंगे। प्रसन्न होनेपर वे सर्वदा विघ्नोंका नाश करते रहेंगे और फिर शिवजीका श्रेष्ठ मन्त्र प्रदान करेंगे।'
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