भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 515

* कोटिरुद्रसंहिता * ५०१

शम्भु बोले—साध्वि अनसूये! तुम्हारा यह कर्म देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। प्रिय पतिव्रते! वर माँगो; क्योंकि तुम मुझे बहुत ही प्रिय हो।

उस समय वे दोनों पति-पत्नी अद्भुत सुन्दर आकृति एवं पंचमुख आदिसे युक्त भगवान् शिवको वहाँ प्रकट हुआ देख बड़े विस्मित हुए; उन्होंने हाथ जोड़ नमस्कार और स्तुति करके बड़े भक्तिभावसे भगवान् शंकरका पूजन किया। फिर उन लोककल्याणकारी शिवसे कहा।

ब्राह्मणदम्पति बोले—देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और जगदम्बा गंगा भी प्रसन्न हैं तो आप इस तपोवनमें निवास कीजिये और समस्त लोकोंके लिये सुखदायक हो जाइये।

तब गंगा और शिव दोनों ही प्रसन्न हो उस स्थानपर, जहाँ वे ऋषिशिरोमणि रहते थे, प्रतिष्ठित हो गये। इन्हीं शिवका नाम वहाँ अत्रीश्वर हुआ। (अध्याय २–४)


ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें ‘नन्दिकेश’ नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गंगाका भी वहाँ आना

तदनन्तर श्रीसूतजीने जब बहुत-से शिवलिंगोंके कथाप्रसंग सुना दिये, तब ऋषियोंने पूछा—'महामते सूतजी! वैशाख शुक्ला सप्तमीके दिन गंगाजी नर्मदामें कैसे आयीं? इसका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये। वहाँ महादेवजीका नाम नन्दिकेश्वर कैसे हुआ? इस बातको भी प्रसन्नतापूर्वक बताइये।'

सूतजीने कहा—महर्षियो! एक ब्राह्मणी थी, जिसका नाम ऋषिका था। वह किसी ब्राह्मणकी पुत्री थी और एक ब्राह्मणको ही विधिपूर्वक ब्याही गयी थी। विप्रवरो! यद्यपि वह द्विजपत्नी उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी, तथापि अपने पूर्वजन्मके किसी अशुभ कर्मके प्रभावसे 'बालवैधव्य'-को प्राप्त हो गयी। तब वह ब्राह्मणपत्नी ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो पार्थिवपूजनपूर्वक अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगी। उस समय अवसर पाकर मूढ़ नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट और बलवान् असुर, जो बड़ा मायावी था, कामबाणसे पीड़ित होकर वहाँ गया। उस अत्यन्त सुन्दरी कामिनीको तपस्या करती देख वह असुर उसे नाना प्रकारके लोभ दिखाता हुआ उसके साथ सम्भोगकी याचना करने लगा। मुनीश्वरो! परंतु उत्तम व्रतका पालन करने तथा शिवके ध्यानमें तत्पर रहनेवाली वह साध्वी नारी कामभावसे उसपर दृष्टि न डाल सकी। तपस्यामें लगी हुई उस ब्राह्मणीने उस असुरका सम्मान नहीं किया; क्योंकि वह अत्यन्त तपोनिष्ठ और शिवध्यानपरायणा थी। उस कृशांगी युवतीसे तिरस्कृत हो उस दैत्यराज मूढ़ने उसके ऊपर क्रोध प्रकट किया और फिर अपना विकट रूप उसे दिखाया। इसके बाद उस दुष्टात्माने भयदायक दुर्वचन कहा और उस ब्राह्मणपत्नीको बारंबार त्रास