भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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५०२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

देना आरम्भ किया। उस समय वह उसके भयसे थर्रा उठी और अनेक बार स्नेहपूर्वक शिव-शिवकी पुकार करने लगी। उस तन्वंगी द्विजपत्नीने भगवान् शिवका पूर्णतया आश्रय ले रखा था। शिवका नाम जपनेवाली वह नारी अत्यन्त विह्वल हो अपने धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् शम्भुकी ही शरणमें गयी।

तब शरणागतकी रक्षा, सदाचारकी प्रतिष्ठा तथा उस ब्राह्मणीको आनन्द प्रदान करनेके लिये भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये। भक्तवत्सल परमेश्वर शंकरने उस कामविह्वल दैत्यराज मूढ़को तत्काल भस्म कर दिया और ब्राह्मणीकी ओर कृपादृष्टिसे देखकर भक्तकी रक्षाके लिये दत्तचित्त हो कहा—'वर माँगो।' महेश्वरका यह वचन सुनकर उस साध्वी ब्राह्मणपत्नीने उनके उस आनन्दजनक मंगलमय स्वरूपका दर्शन किया। फिर सबको सुख देनेवाले परमेश्वर शम्भुको प्रणाम करके शुद्ध अन्तःकरणवाली उस साध्वीने हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।

ऋषिका बोली—देवदेव महादेव! शरणागतवत्सल ! आप दीनबन्धु हैं। भक्तोंकी सदा रक्षा करनेवाले ईश्वर हैं। आपने मूढ़ नामक असुरसे मेरे धर्मकी रक्षा की है; क्योंकि आपके द्वारा यह दुष्ट असुर मारा गया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा की है। अब आप मुझे अपने चरणोंकी परम उत्तम एवं अनन्य भक्ति प्रदान कीजिये। नाथ! यही मेरे लिये वर है। इससे अधिक और क्या हो सकता है? प्रभो! महेश्वर! मेरी दूसरी प्रार्थना भी सुनिये। आप लोगोंके उपकारके लिये यहाँ सदा स्थित रहिये।

महादेवजीने कहा—ऋषिके! तुम सदाचारिणी और विशेषतः मुझमें भक्ति रखनेवाली हो। तुमने मुझसे जो-जो वर माँगे हैं, वे सब मैंने तुम्हें दे दिये।

ब्राह्मणो! इसी बीचमें श्रीविष्णु और ब्रह्मा आदि देवता वहाँ भगवान् शिवका आविर्भाव हुआ जान हर्षसे भरे हुए आये और अत्यन्त प्रेमपूर्वक शिवको प्रणाम करके उन सबने उनका भलीभाँति पूजन किया। फिर शुद्ध हृदयसे हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति भी की। इसी समय साध्वी देवनदी गंगा उस ऋषिकासे उसके भाग्यकी सराहना करती हुई प्रसन्नचित्त हो बोलीं।

गंगाने कहा—ऋषिके! वैशाखमासमें एक दिन यहाँ रहनेके लिये मुझे भी तुम्हें वचन देना चाहिये। उस दिन मैं भी इस तीर्थमें निवास करना चाहती हूँ।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! गंगाजीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका

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