शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सम्पूर्ण दुःख और भयका नाश करनेवाले शम्भु लोगोंका उपकार करने और भक्तोंको दर्शन देनेके लिये स्वयं केदारेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हो वहाँ रहते हैं। वे दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तोंको सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करते हैं। उसी दिनसे लेकर जिसने भी भक्तिभावसे केदारेश्वरका पूजन किया, उसके लिये स्वप्नमें भी दुःख दुर्लभ हो गया। जो भगवान् शिवका प्रिय भक्त वहाँ शिवलिंगके निकट शिवके रूपसे अंकित वलय (कंकण या कड़ा) चढ़ाता है, वह उस वलययुक्त स्वरूपका दर्शन करके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, साथ ही जीवन्मुक्त भी हो जाता है। जो बदरीवनकी यात्रा करता है, उसे भी जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है। नर और नारायणके तथा केदारेश्वर शिवके रूपका दर्शन करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। केदारेश्वरमें भक्ति रखनेवाले जो पुरुष वहाँकी यात्रा आरम्भ करके उनके पासतक पहुँचनेके पहले मार्गमें ही मर जाते हैं, वे भी मोक्ष पा जाते हैं—इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।* केदारतीर्थमें पहुँचकर वहाँ प्रेमपूर्वक केदारेश्वरकी पूजा करके वहाँका जल पी लेनेके पश्चात् मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता। ब्राह्मणो! इस भारतवर्षमें सम्पूर्ण जीवोंको भक्तिभावसे भगवान् नर-नारायणकी तथा केदारेश्वर शम्भुकी पूजा करनी चाहिये।
अब मैं भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य कहूँगा। कामरूप देशमें लोकहितकी कामनासे साक्षात् भगवान् शंकर ज्योतिर्लिंगके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उनका वह स्वरूप कल्याण और सुखका आश्रय है। ब्राह्मणो! पूर्वकालमें एक महापराक्रमी राक्षस हुआ था, जिसका नाम भीम था। वह सदा धर्मका विध्वंस करता और समस्त प्राणियोंको दुःख देता था। वह महाबली राक्षस कुम्भकर्णके वीर्य और कर्कटीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था तथा अपनी माताके साथ सह्य पर्वतपर निवास करता था। एक दिन समस्त लोकोंको दुःख देनेवाले भयानक पराक्रमी दुष्ट भीमने अपनी मातासे पूछा—'माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं? तुम अकेली क्यों रहती हो? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। अतः यथार्थ बात बताओ।'
कर्कटी बोली—बेटा! रावणके छोटे भाई कुम्भकर्ण तेरे पिता थे। भाईसहित उस महाबली वीरको श्रीरामने मार डाला। मेरे पिताका नाम कर्कट और माताका नाम पुष्कसी था। विराध मेरे पति थे, जिन्हें पूर्वकालमें रामने मार डाला। अपने प्रिय स्वामीके मारे जानेपर मैं अपने माता-पिताके पास रहती थी। एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त्य मुनिके शिष्य सुतीक्ष्णको अपना आहार बनानेके लिये गये। वे बड़े तपस्वी और महात्मा थे। उन्होंने कुपित होकर मेरे माता-पिताको भस्म कर डाला। वे दोनों मर गये। तबसे मैं अकेली होकर बड़े दुःखके साथ इस पर्वतपर रहने लगी। मेरा कोई अवलम्ब नहीं रह गया। मैं असहाय और
* केदारेशस्य भक्ता ये मार्गस्थास्तस्य वै मृताः। तेऽपि मुक्ता भवन्त्येव नात्र कार्या विचारणा॥
(शि० पु० कोटिरुद्रसंहिता १९। २२)