भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 850 में से

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पृष्ठ 529

* कोटिरुद्रसंहिता * ५१५

दुःखसे आतुर होकर यहाँ निवास करती थी। इसी समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राक्षस कुम्भकर्ण जो रावणके छोटे भाई थे, यहाँ आये। उन्होंने बलात् मेरे साथ समागम किया। फिर वे मुझे छोड़कर लंका चले गये। तत्पश्चात् तुम्हारा जन्म हुआ। तुम भी पिताके समान ही महान् बलवान् और पराक्रमी हो। अब मैं तुम्हारा ही सहारा लेकर यहाँ कालक्षेप करती हूँ।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! कर्कटीकी यह बात सुनकर भयानक पराक्रमी भीम कुपित हो यह विचार करने लगा कि ‘मैं विष्णुके साथ कैसा बर्ताव करूँ? इन्होंने मेरे पिताको मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके भक्तके हाथसे मारे गये। विराधको भी इन्होंने ही मार डाला और इस प्रकार मुझे बहुत दुःख दिया। यदि मैं अपने पिताका पुत्र हूँ तो श्रीहरिको अवश्य पीड़ा दूँगा।'

ऐसा निश्चय करके भीम महान् तप करनेके लिये चला गया। उसने ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये एक हजार वर्षोंतक महान् तप किया। तपस्याके साथ-साथ वह मन-ही-मन इष्टदेवका ध्यान किया करता था। तब लोकपितामह ब्रह्मा उसे वर देनेके लिये गये और इस प्रकार बोले।

ब्रह्माजीने कहा—भीम! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।

भीम बोला—देवेश्वर! कमलासन! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो आज मुझे ऐसा बल दीजिये, जिसकी कहीं तुलना न हो।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर उस राक्षसने ब्रह्माजीको नमस्कार किया और ब्रह्माजी भी उसे अभीष्ट वर देकर अपने धामको चले गये। ब्रह्माजीसे अत्यन्त बल पाकर राक्षस अपने घर आया और माताको प्रणाम करके शीघ्रतापूर्वक बड़े गर्वसे बोला—'माँ! अब तुम मेरा बल देखो। मैं इन्द्र आदि देवताओं तथा इनकी सहायता करनेवाले श्रीहरिका महान् संहार कर डालूँगा।' ऐसा कहकर भयानक पराक्रमी भीमने पहले इन्द्र आदि देवताओंको जीता और उन सबको अपने-अपने स्थानसे निकाल बाहर किया। तदनन्तर देवताओंकी प्रार्थनासे उनका पक्ष लेनेवाले श्रीहरिको भी उसने युद्धमें हराया। फिर प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीको जीतना प्रारम्भ किया। सबसे पहले वह कामरूप देशके राजा सुदक्षिणको जीतनेके लिये गया। वहाँ राजाके साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ। दुष्ट असुर भीमने ब्रह्माजीके दिये हुए वरके प्रभावसे शिवके आश्रित रहनेवाले महावीर महाराज सुदक्षिणको परास्त कर दिया और सब सामग्रियोंसहित उनका राज्य तथा सर्वस्व अपने अधिकारमें कर लिया। भगवान् शिवके प्रिय भक्त धर्मप्रेमी परम धर्मात्मा राजाको भी उसने कैद कर लिया और उनके पैरोंमें बेड़ी डालकर उन्हें एकान्त स्थानमें बंद कर दिया। वहाँ उन्होंने भगवान्‌की प्रीतिके लिये शिवकी उत्तम पार्थिवमूर्ति बनाकर उन्हींका भजन-पूजन आरम्भ कर दिया। उन्होंने बारंबार गंगाजीकी स्तुति की और मानसिक स्नान आदि करके पार्थिव-पूजनकी विधिसे शंकरजीकी पूजा सम्पन्न की। विधिपूर्वक भगवान् शिवका ध्यान करके वे प्रणवयुक्त पंचाक्षरमन्त्र (ॐ नमः


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