भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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* कोटिरुद्रसंहिता * ५१७

अतः 'सब सामग्रियोंसहित इस नरेशको मैं बलपूर्वक अभी नष्ट कर देता हूँ, ऐसा विचारकर उस महाक्रोधी राक्षसने राजाको बहुत डाँटा और पूछा 'क्या कर रहे हो?' राजाने भगवान् शंकरपर रक्षाका भार सौंपकर कहा—'मैं चराचर जगत्के स्वामी भगवान् शिवका पूजन करता हूँ।' तब राक्षस भीमने भगवान् शंकरके प्रति बहुत तिरस्कारयुक्त दुर्वचन कहकर राजाको धमकाया और भगवान् शंकरके पार्थिव-लिंगपर तलवार चलायी। वह तलवार उस पार्थिवलिंगका स्पर्श भी नहीं करने पायी कि उससे साक्षात् भगवान् हर वहाँ प्रकट हो गये और बोले—'देखो, मैं भीमेश्वर हूँ और अपने भक्तकी रक्षाके लिये प्रकट हुआ हूँ। मेरा पहलेसे ही यह व्रत है कि मैं सदा अपने भक्तकी रक्षा करूँ। इसलिये भक्तोंको सुख देनेवाले मेरे बलकी ओर दृष्टिपात करो।'

ऐसा कहकर भगवान् शिवने पिनाकसे उसकी तलवारके दो टुकड़े कर दिये। तब उस राक्षसने फिर अपना त्रिशूल चलाया, परंतु शम्भुने उस दुष्टके त्रिशूलके भी सैकड़ों टुकड़े कर डाले। तदनन्तर शंकरजीके साथ उसका घोर युद्ध हुआ जिससे सारा जगत् क्षुब्ध हो उठा। तब नारदजीने आकर भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।

नारद बोले—लोगोंको भ्रममें डालने-वाले महेश्वर ! मेरे नाथ ! आप क्षमा करें, क्षमा करें। तिनकेको काटनेके लिये कुल्हाड़ा चलानेकी क्या आवश्यकता है। शीघ्र ही इसका संहार कर डालिये।

नारदजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शम्भुने हुंकारमात्रसे उस समय समस्त राक्षसोंको भस्म कर डाला। मुने ! सब देवताओंके देखते-देखते शिवजीने उन सारे राक्षसोंको दग्ध कर दिया। तदनन्तर भगवान् शंकरकी कृपासे इन्द्र आदि समस्त देवताओं और मुनीश्वरोंको शान्ति मिली तथा सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ हुआ। उस समय देवताओं और विशेषतः मुनियोंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की कि 'प्रभो ! आप यहाँ लोगोंको सुख देनेके लिये सदा निवास करें। यह देश निन्दित माना गया है। यहाँ आनेवाले लोगोंको प्रायः दुःख ही प्राप्त होता है। परंतु आपका दर्शन करनेसे यहाँ सबका कल्याण होगा। आप भीमशंकरके नामसे विख्यात होंगे और सबके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करेंगे। आपका यह ज्योतिर्लिंग सदा पूजनीय और समस्त आपत्तियोंका निवारण करनेवाला होगा।'

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर लोकहितकारी एवं भक्तवत्सल परम स्वतन्त्र शिव प्रसन्नता-पूर्वक वहीं स्थित हो गये।

(अध्याय १९—२१)


विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग और उनकी महिमाके प्रसंगमें पंचक्रोशीकी महत्ताका प्रतिपादन

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो ! अब मैं काशीके विश्वेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य बताऊँगा, जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। तुमलोग सुनो, इस भूतलपर जो कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर होती है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्विकार एवं

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