शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सनातन ब्रह्मरूप है। अपने कैवल्य (अद्वैत)-भावमें ही रमनेवाले उन अद्वितीय परमात्मामें कभी एकसे दो हो जानेकी इच्छा जाग्रत् हुई।* फिर वे ही परमात्मा सगुणरूपमें प्रकट हो शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री दो रूपोंमें प्रकट हो गये। उनमें जो पुरुष था, उसका ‘शिव’ नाम हुआ और जो स्त्री हुई, उसे ‘शक्ति’ कहते हैं। उन चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्तिने स्वयं अदृष्ट रहकर स्वभावसे ही दो चेतनों (प्रकृति और पुरुष)-की सृष्टि की। मुनिवरो! उन दोनों माता-पिताओंको उस समय सामने न देखकर वे दोनों प्रकृति और पुरुष महान् संशयमें पड़ गये। उस समय निर्गुण परमात्मासे आकाशवाणी प्रकट हुई—‘तुम दोनोंको तपस्या करनी चाहिये। फिर तुमसे परम उत्तम सृष्टिका विस्तार होगा।’
वे प्रकृति और पुरुष बोले—‘प्रभो! शिव! तपस्याके लिये तो कोई स्थान है ही नहीं। फिर हम दोनों इस समय कहाँ स्थित होकर आपकी आज्ञाके अनुसार तप करें।’
तब निर्गुण शिवने तेजके सारभूत पाँच कोस लंबे-चौड़े शुभ एवं सुन्दर नगरका निर्माण किया, जो उनका अपना ही स्वरूप था। वह सभी आवश्यक उपकरणोंसे युक्त था। उस नगरका निर्माण करके उन्होंने उसे उन दोनोंके लिये भेजा। वह नगर आकाशमें पुरुषके समीप आकर स्थित हो गया। तब पुरुष—श्रीहरिने उस नगरमें स्थित हो सृष्टिकी कामनासे शिवका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। उस समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे श्वेत जलकी अनेक धाराएँ प्रकट हुईं, जिनसे सारा शून्य आकाश व्याप्त हो गया। वहाँ दूसरा कुछ भी दिखायी नहीं देता था। उसे देखकर भगवान् विष्णु मन-ही-मन बोल उठे—यह कैसी अद्भुत वस्तु दिखायी देती है? उस समय इस आश्चर्यको देखकर उन्होंने अपना सिर हिलाया, जिससे उन प्रभुके सामने ही उनके एक कानसे मणि गिर पड़ी। जहाँ वह मणि गिरी, वह स्थान मणिकर्णिका नामक महान् तीर्थ हो गया। जब पूर्वोक्त जलराशिमें वह सारी पंचक्रोशी डूबने और बहने लगी, तब निर्गुण शिवने शीघ्र ही उसे अपने त्रिशूलके द्वारा धारण कर लिया। फिर विष्णु अपनी पत्नी प्रकृतिके साथ वहीं सोये। तब उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ और उस कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उनकी उत्पत्तिमें भी शंकरका आदेश ही कारण था। तदनन्तर
* ‘स द्वितीयमैच्छत्’ (बृहदारण्यक उ०—१।४।३) इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।