भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 533

* कोटिरुद्रसंहिता * ५१९

उन्होंने शिवकी आज्ञा पाकर अद्भुत सृष्टि आरम्भ की। ब्रह्माजीने ब्रह्माण्डमें चौदह भुवन बनाये। ब्रह्माण्डका विस्तार महर्षियोंने पचास करोड़ योजनका बताया है। फिर भगवान् शिवने यह सोचा कि 'ब्रह्माण्डके भीतर कर्मपाशसे बँधे हुए प्राणी मुझे कैसे प्राप्त कर सकेंगे?' यह सोचकर उन्होंने मुक्तिदायिनी पंचक्रोशीको इस जगत्में छोड़ दिया।

“यह पंचक्रोशी काशी लोकमें कल्याणदायिनी, कर्मबन्धनका नाश करनेवाली, ज्ञानदात्री तथा मोक्षको प्रकाशित करनेवाली मानी गयी है। अतएव मुझे परम प्रिय है। यहाँ स्वयं परमात्माने 'अविमुक्त' लिंगकी स्थापना की है। अतः मेरे अंशभूत हरे! तुम्हें कभी इस क्षेत्रका त्याग नहीं करना चाहिये।'' ऐसा कहकर भगवान् हरने काशीपुरीको स्वयं अपने त्रिशूलसे उतार कर मर्त्यलोकके जगत्में छोड़ दिया। ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होनेपर जब सारे जगत्का प्रलय हो जाता है, तब भी निश्चय ही इस काशीपुरीका नाश नहीं होता। उस समय भगवान् शिव इसे त्रिशूलपर धारण कर लेते हैं और जब ब्रह्माद्वारा पुनः नयी सृष्टि की जाती है, तब इसे फिर वे इस भूतलपर स्थापित कर देते हैं। कर्मोंका कर्षण करनेसे ही इस पुरीको 'काशी' कहते हैं। काशीमें अविमुक्तेश्वरलिंग सदा विराजमान रहता है। वह महापातकी पुरुषोंको भी मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मुनीश्वरो! अन्य मोक्षदायक धामोंमें सारूप्य आदि मुक्ति प्राप्त होती है। केवल इस काशीमें ही जीवोंको सायुज्य नामक सर्वोत्तम मुक्ति सुलभ होती है। जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनके लिये वाराणसी पुरी ही गति है। महापुण्यमयी पंचक्रोशी करोड़ों हत्याओंका विनाश करनेवाली है। यहाँ समस्त अमरगण भी मरणकी इच्छा करते हैं। फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। यह शंकरकी प्रिय नगरी काशी सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है।

कैलासके पति, जो भीतरसे सत्त्वगुणी और बाहरसे तमोगुणी कहे गये हैं, कालाग्नि रुद्रके नामसे विख्यात हैं। वे निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपमें प्रकट हुए शिव हैं। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके निर्गुण शिवसे इस प्रकार कहा।

रुद्र बोले—विश्वनाथ! महेश्वर! मैं आपका ही हूँ, इसमें संशय नहीं है। साम्ब महादेव! मुझ आत्मजपर कृपा कीजिये। जगत्पते! लोकहितकी कामनासे आपको सदा यहीं रहना चाहिये। जगन्नाथ! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप यहाँ रहकर जीवोंका उद्धार करें।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले अविमुक्तने भी शंकरसे बारंबार प्रार्थना करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए ही प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा।

अविमुक्त बोले—कालरूपी रोगके सुन्दर औषध देवाधिदेव महादेव! आप वास्तवमें तीनों लोकोंके स्वामी तथा ब्रह्मा और विष्णु आदिके द्वारा भी सेवनीय हैं। देव! काशीपुरीको आप अपनी राजधानी स्वीकार करें। मैं अचिन्त्य सुखकी प्राप्तिके लिये यहाँ सदा आपका ध्यान लगाये स्थिरभावसे बैठा रहूँगा। आप ही मुक्ति देनेवाले तथा सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक हैं, दूसरा कोई नहीं। अतः आप परोपकारके