शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५२३
किंतु दूसरोंके दुःखका निवारण ही करते हैं। दयालु, अभिमानशून्य, उपकारी और जितेन्द्रिय—ये पुण्यके चार खंभे हैं, जिनके आधारपर यह पृथ्वी टिकी हुई है।$^१$
तदनन्तर गौतमजी वहाँ उस परम दुर्लभ जलको पाकर विधिपूर्वक नित्य-नैमित्तिक कर्म करने लगे। उन मुनीश्वरने वहाँ नित्य-होमकी सिद्धिके लिये धान, जौ और अनेक प्रकारके नीवार बोआ दिये। तरह-तरहके धान्य, भाँति-भाँतिके वृक्ष और अनेक प्रकारके फल-फूल वहाँ लहलहा उठे। यह समाचार सुनकर वहाँ दूसरे-दूसरे सहस्रों ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी तथा बहुसंख्यक जीव जाकर रहने लगे। वह वन इस भूमण्डलमें बड़ा सुन्दर हो गया। उस अक्षय जलके संयोगसे अनावृष्टि वहाँके लिये दुःखदायिनी नहीं रह गयी। उस वनमें अनेक शुभकर्मपरायण ऋषि अपने शिष्य, भार्या और पुत्र आदिके साथ वास करने लगे। उन्होंने कालक्षेप करनेके लिये वहाँ धान बोआ दिये। गौतमजीके प्रभावसे उस वनमें सब ओर आनन्द छा गया।
एक बार वहाँ गौतमके आश्रममें जाकर बसे हुए ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ जलके प्रसंगको लेकर अहल्यापर नाराज हो गयीं। उन्होंने अपने पतियोंको उकसाया। उन लोगोंने गौतमका अनिष्ट करनेके लिये गणेशजीकी आराधना की। भक्तपराधीन गणेशजीने प्रकट होकर वर माँगनेके लिये कहा—तब ये बोले—'भगवन्! यदि आप हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समस्त ऋषि डाँट-फटकारकर गौतमको आश्रमसे बाहर निकाल दें।'
गणेशजीने कहा—ऋषियो! तुम सब लोग सुनो। इस समय तुम उचित कार्य नहीं कर रहे हो। बिना किसी अपराधके उनपर क्रोध करनेके कारण तुम्हारी हानि ही होगी। जिन्होंने पहले उपकार किया हो, उन्हें यदि दुःख दिया जाय तो वह अपने लिये हितकारक नहीं होता। जब उपकारीको दुःख दिया जाता है, तब उससे इस जगत्में अपना ही नाश होता है।$^२$ ऐसी तपस्या करके उत्तम फलकी सिद्धि की जाती है। स्वयं ही शुभ फलका परित्याग करके अहितकारक फलको नहीं ग्रहण किया जाता। ब्रह्माजीने जो यह कहा है कि असाधु कभी साधुताको और साधु कभी असाधुताको नहीं ग्रहण करता, यह बात निश्चय ही ठीक जान
१-उत्तमानां स्वभावोऽयं परदुःखासहिष्णुता ॥
स्वयं दुःखं च सम्प्राप्तं मन्यतेऽन्यस्य वार्यते ।
दयालुर्मदस्पर्श उपकारी जितेन्द्रियः ॥
एतैश्च पुण्यस्तम्भैस्तु चतुर्भिर्धार्यते मही।
(शि० पु० कोटि० सं० २४। २४–२६)
२-अपराधं बिना तस्मै क्रुध्यतां हानिरेव च॥
उपस्कृतं पुरा यैस्तु तेभ्यो दुःखं हितं नहि।
यदा च दीयते दुःखं तदा नाशो भवेदिह॥
(शि० पु० को० रु० सं० २५। १४-१५)