शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पड़ती है। पहले उपवासके कारण जब तुमलोगोंको दुःख भोगना पड़ा था, तब महर्षि गौतमने जलकी व्यवस्था करके तुम्हें सुख दिया। परंतु इस समय तुम सब लोग उन्हें दुःख दे रहे हो। संसारमें ऐसा कार्य करना कदापि उचित नहीं। इस बातपर तुम सब लोग सर्वथा विचार कर लो। स्त्रियोंकी शक्तिसे मोहित हुए तुमलोग यदि मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम्हारा यह बर्ताव गौतमके लिये अत्यन्त हितकारक ही होगा, इसमें संशय नहीं है। ये मुनिश्रेष्ठ गौतम तुम्हें पुनः निश्चय ही सुख देंगे। अतः उनके साथ छल करना कदापि उचित नहीं। इसलिये तुमलोग कोई दूसरा वर माँगो।
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! महात्मा गणेशने ऋषियोंसे जो यह बात कही, वह यद्यपि उनके लिये हितकर थी, तो भी उन्होंने इसे नहीं स्वीकार किया। तब भक्तोंके अधीन होनेके कारण उन शिवकुमारने कहा—'तुमलोगों ने जिस वस्तुके लिये प्रार्थना की है, उसे मैं अवश्य करूँगा। पीछे जो होनहार होगी, वह होकर ही रहेगी।' ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये। मुनीश्वरो! उसके बाद उन दुष्ट ऋषियोंके प्रभावसे तथा उन्हें प्राप्त हुए वरके कारण जो घटना घटित हुई, उसे सुनो। वहाँ गौतमके खेतमें जो धान और जौ थे, उनके पास गणेशजी एक दुर्बल गाय बनकर गये। दिये हुए वरके कारण वह गौ काँपती हुई वहाँ जाकर धान और जौ चरने लगी। इसी समय दैववश गौतमजी वहाँ आ गये। वे दयालु ठहरे, इसलिये मुट्ठीभर तिनके लेकर उन्हींसे उस गौको हाँकने लगे। उन तिनकोंका स्पर्श होते ही वह गौ पृथ्वीपर गिर पड़ी और ऋषिके देखते-देखते उसी क्षण मर गयी।
वे दूसरे-दूसरे (द्वेषी) ब्राह्मण और उनकी दुष्ट स्त्रियाँ वहाँ छिपे हुए सब कुछ देख रहे थे। उस गौके गिरते ही वे सब-के-सब बोल उठे—'गौतमने यह क्या कर डाला?' गौतम भी आश्चर्यचकित हो, अहल्याको बुलाकर व्यथित हृदयसे दुःखपूर्वक बोले—'देवि! यह क्या हुआ, कैसे हुआ? जान पड़ता है परमेश्वर मुझपर कुपित हो गये हैं। अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मुझे हत्या लग गयी।'
इसी समय ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ गौतमको डाँटने और दुर्वचनोंद्वारा अहल्याको पीड़ित करने लगीं। उनके दुर्बुद्धि शिष्य और पुत्र भी गौतमको बारंबार फटकारने और धिक्कारने लगे।
ब्राह्मण बोले—अब तुम्हें अपना मुँह नहीं दिखाना चाहिये। यहाँसे जाओ, जाओ। गोहत्यारेका मुँह देखनेपर तत्काल वस्त्र-सहित स्नान करना चाहिये। जबतक तुम इस आश्रममें रहोगे, तबतक अग्निदेव और पितर हमारे दिये हुए किसी भी हव्य-कव्यको ग्रहण नहीं करेंगे। इसलिये पापी गोहत्यारे! तुम परिवारसहित यहाँसे अन्यत्र चले जाओ। विलम्ब न करो।
सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर उन सबने उन्हें पत्थरोंसे मारना आरम्भ किया। वे गालियाँ दे-देकर गौतम और अहल्याको सताने लगे। उन दुष्टोंके मारने और धमकानेपर गौतम बोले—'मुनियो! मैं यहाँसे अन्यत्र जाकर रहूँगा' ऐसा कहकर गौतम उस स्थानसे तत्काल निकल गये और उन सबकी आज्ञासे एक कोस दूर जाकर