भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५२६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

लोग तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो जाते हैं। फिर सदा मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले तुम क्या पापी हो? मुने! जिन दुरात्माओंने तुमपर अत्याचार किया है, वे ही पापी, दुराचारी और हत्यारे हैं। उनके दर्शनसे दूसरे लोग पापिष्ठ हो जायँगे। वे सब-के-सब कृतघ्न हैं। उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता।

महादेवजीकी यह बात सुनकर महर्षि गौतम मन-ही-मन बड़े विस्मित हुए। उन्होंने भक्तिपूर्वक शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़ पुनः इस प्रकार कहा।

गौतम बोले—महेश्वर! उन ऋषियोंने तो मेरा बहुत बड़ा उपकार किया। यदि उन्होंने यह बर्ताव न किया होता तो मुझे आपका दर्शन कैसे होता? धन्य हैं वे महर्षि, जिन्होंने मेरे लिये परम कल्याणकारी कार्य किया है। उनके इस दुराचारसे ही मेरा महान् स्वार्थ सिद्ध हुआ है।

गौतमजीकी यह बात सुनकर महेश्वर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने गौतमको कृपादृष्टिसे देखकर उन्हें शीघ्र ही यों उत्तर दिया।

शिवजी बोले—विप्रवर! तुम धन्य हो, सभी ऋषियोंमें श्रेष्ठतर हो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुआ हूँ। ऐसा जानकर तुम मुझसे उत्तम वर माँगो।

गौतम बोले—नाथ! आप सच कहते हैं, तथापि पाँच आदमियोंने जो कह दिया या कर दिया, वह अन्यथा नहीं हो सकता। अतः जो हो गया, सो रहे। देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गंगा प्रदान कीजिये और ऐसा करके लोकका महान् उपकार कीजिये। आपको मेरा नमस्कार है, नमस्कार है।

यों कहकर गौतमने देवेश्वर भगवान् शिवके दोनों चरणारविन्द पकड़ लिये और लोकहितकी कामनासे उन्हें नमस्कार किया। तब शंकरदेवने पृथिवी और स्वर्गके सारभूत जलको निकालकर, जिसे उन्होंने पहलेसे ही रख छोड़ा था और विवाहमें ब्रह्माजीके दिये हुए जलमेंसे जो कुछ शेष रह गया था, वह सब भक्तवत्सल शम्भुने उन गौतम मुनिको दे दिया। उस समय गंगाजीका जल परम सुन्दर स्त्रीका रूप धारण करके वहाँ खड़ा हुआ। तब मुनिवर गौतमने उन गंगाजीकी स्तुति करके उन्हें नमस्कार किया।

गौतम बोले—गंगे! तुम धन्य हो, कृतकृत्य हो। तुमने सम्पूर्ण भुवनको पवित्र किया है। इसलिये निश्चितरूपसे नरकमें गिरते हुए मुझ गौतमको पवित्र करो।

तदनन्तर शिवजीने गंगासे कहा—देवि! तुम मुनिको पवित्र करो और तुरंत वापस न जाकर वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें कलियुगतक यहीं रहो।

गंगाने कहा—महेश्वर! यदि मेरा