शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५२७
माहात्म्य सब नदियोंसे अधिक हो और अम्बिका तथा गणोंके साथ आप भी यहाँ रहें, तभी मैं इस धरातलपर रहूँगी।
गंगाजीकी यह बात सुनकर भगवान् शिव बोले—गंगे! तुम धन्य हो। मेरी बात सुनो। मैं तुमसे अलग नहीं हूँ, तथापि मैं तुम्हारे कथनानुसार यहाँ स्थित रहूँगा। तुम भी स्थित होओ।
अपने स्वामी परमेश्वर शिवकी यह बात सुनकर गंगाने मन-ही-मन प्रसन्न हो उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसी समय देवता, प्राचीन ऋषि, अनेक उत्तम तीर्थ और नाना प्रकारके क्षेत्र वहाँ आ पहुँचे। उन सबने बड़े आदरसे जय-जयकार करते हुए गौतम, गंगा तथा गिरिशायी शिवका पूजन किया। तदनन्तर उन सब देवताओंने मस्तक झुका हाथ जोड़कर उन सबकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति की। उस समय प्रसन्न हुई गंगा और गिरीशने उनसे कहा—'श्रेष्ठ देवताओ! वर माँगो। तुम्हारा प्रिय करनेकी इच्छासे वह वर हम तुम्हें देंगे।'
देवता बोले—देवेश्वर! यदि आप संतुष्ट हैं और सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! यदि आप भी प्रसन्न हैं तो हमारा तथा मनुष्योंका प्रिय करनेके लिये आपलोग कृपापूर्वक यहाँ निवास करें।
गंगा बोलीं—देवताओ! फिर तो सबका प्रिय करनेके लिये आपलोग स्वयं ही यहाँ क्यों नहीं रहते? मैं तो गौतमजीके पापका प्रक्षालन करके जैसे आयी हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगी। आपके समाजमें यहाँ मेरी कोई विशेषता समझी जाती है, इस बातका पता कैसे लगे? यदि आप यहाँ मेरी विशेषता सिद्ध कर सकें तो मैं अवश्य यहाँ रहूँगी—इसमें संशय नहीं है।
सब देवताओंने कहा—सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! सबके परम सुहृद् बृहस्पतिजी जब-जब सिंहराशिपर स्थित होंगे, तब-तब हम सब लोग यहाँ आया करेंगे, इसमें संशय नहीं है। ग्यारह वर्षोंतक लोगोंका जो पातक यहाँ प्रक्षालित होगा, उससे मलिन हो जानेपर हम उसी पापराशिको धोनेके लिये आदरपूर्वक तुम्हारे पास आयेंगे। हमने यह सर्वथा सच्ची बात कही है। सरिद्वरे! महादेवि! अतः तुमको और भगवान् शंकरको समस्त लोकोंपर अनुग्रह तथा हमारा प्रिय करनेके लिये यहाँ नित्य निवास करना चाहिये। गुरु जबतक सिंहराशिपर रहेंगे, तभीतक हम यहाँ निवास करेंगे। उस समय तुम्हारे जलमें त्रिकालस्नान और भगवान् शंकरका दर्शन करके हम शुद्ध होंगे। फिर तुम्हारी आज्ञा लेकर अपने स्थानको लौटेंगे।