भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 548

५३४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

रूपमें स्थित हो गये। तीनों लोकोंमें रामेश्वरके नामसे उनकी प्रसिद्धि हुई। उनके प्रभावसे ही अपार समुद्रको अनायास पार करके श्रीरामने रावण आदि राक्षसोंका शीघ्र ही संहार किया और अपनी प्रिया सीताको प्राप्त कर लिया। तबसे इस भूतलपर रामेश्वरकी अद्भुत महिमाका प्रसार हुआ। भगवान् रामेश्वर सदा भोग और मोक्ष देनेवाले तथा भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले हैं। जो दिव्य गंगाजलसे रामेश्वर शिवको भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त ही है। इस संसारमें देवदुर्लभ समस्त भोगोंका उपभोग करके अन्तमें उत्तम ज्ञान पाकर वह निश्चय ही कैवल्य मोक्षको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे भगवान् शिवके रामेश्वर नामक दिव्य ज्योतिर्लिंगका वर्णन किया, जो अपनी महिमा सुननेवालोंके समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला है।

(अध्याय ३१)


घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन

सूतजी कहते हैं—अब मैं घुश्मेश नामक ज्योतिर्लिंगके प्रादुर्भावका और उसके माहात्म्यका वर्णन करूँगा। मुनिवरो ! ध्यान देकर सुनो। दक्षिणदिशामें एक श्रेष्ठ पर्वत है, जिसका नाम देवगिरि है। वह देखनेमें अद्भुत तथा नित्य परम शोभासे सम्पन्न है। उसीके निकट कोई भरद्वाजकुलमें उत्पन्न सुधर्मा नामक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे। उनकी प्रिय पत्नीका नाम सुदेहा था, वह सदा शिवधर्मके पालनमें तत्पर रहती थी, घरके काम-काजमें कुशल थी और सदा पतिकी सेवामें लगी रहती थी। द्विजश्रेष्ठ सुधर्मा भी देवताओं और अतिथियोंके पूजक थे। वे वेदवर्णित मार्गपर चलते और नित्य अग्निहोत्र किया करते थे। तीनों कालकी संध्या करनेसे उनकी कान्ति सूर्यके समान उद्दीप्त थी। वे वेद-शास्त्रके मर्मज्ञ थे और शिष्योंको पढ़ाया करते थे। धनवान् होनेके साथ ही बड़े दाता थे। सौजन्य आदि सद्गुणोंके भाजन थे। शिवसम्बन्धी पूजनादि कार्यमें ही सदा लगे रहते थे। वे स्वयं तो शिवभक्त थे ही, शिवभक्तोंसे बड़ा प्रेम रखते थे। शिवभक्तोंको भी वे बहुत प्रिय थे।

यह सब कुछ होनेपर भी उनके पुत्र नहीं था। इससे ब्राह्मणको तो दुःख नहीं होता था, परंतु उनकी पत्नी बहुत दुःखी रहती थी। पड़ोसी और दूसरे लोग भी उसे ताना मारा करते थे। वह पतिसे बार-बार पुत्रके लिये प्रार्थना करती थी। पति उसको ज्ञानोपदेश देकर समझाते थे, परंतु उसका मन नहीं मानता था। अन्ततोगत्वा ब्राह्मणने कुछ उपाय भी किया, परंतु वह सफल नहीं हुआ। तब ब्राह्मणीने अत्यन्त दुःखी हो बहुत हठ करके अपनी बहिन घुश्मासे पतिका दूसरा विवाह करा दिया। विवाहसे पहले सुधर्माने उसको समझाया कि ‘इस समय तो तुम बहिनसे प्यार कर रही हो; परंतु जब इसके पुत्र हो जायगा, तब इससे स्पर्धा करने लगोगी।’ उसने वचन दिया कि मैं बहिनसे