शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- कोटिरुद्रसंहिता * ५३५
कभी डाह नहीं करूँगी। विवाह हो जानेपर घुश्मा दासीकी भाँति बड़ी बहिनकी सेवा करने लगी। सुदेहा भी उसे बहुत प्यार करती रही। घुश्मा अपनी शिवभक्ता बहिनकी आज्ञासे नित्य एक सौ एक पार्थिव शिव-लिंग बनाकर विधिपूर्वक पूजा करने लगी। पूजा करके वह निकटवर्ती तालाबमें उनका विसर्जन कर देती थी।
शंकरजीकी कृपासे उसके एक सुन्दर सौभाग्यवान् और सद्गुणसम्पन्न पुत्र हुआ। घुश्माका कुछ मान बढ़ा। इससे सुदेहाके मनमें डाह पैदा हो गयी। समयपर उस पुत्रका विवाह हुआ। पुत्रवधू घरमें आ गयी। अब तो वह और भी जलने लगी। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी और एक दिन उसने रातमें सोते हुए पुत्रको छुरेसे उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके मार डाला और कटे हुए अंगोंको उसी तालाबमें ले जाकर डाल दिया, जहाँ घुश्मा प्रतिदिन पार्थिवलिंगोंका विसर्जन करती थी। पुत्रके अंगोंको उस तालाबमें फेंककर वह लौट आयी और घरमें सुखपूर्वक सो गयी। घुश्मा सबेरे उठकर प्रतिदिनका पूजनादि कर्म करने लगी। श्रेष्ठ ब्राह्मण सुधर्मा स्वयं भी नित्यकर्ममें लग गये। इसी समय उनकी ज्येष्ठ पत्नी सुदेहा भी उठी और बड़े आनन्दसे घरके काम-काज करने लगी; क्योंकि उसके हृदयमें पहले जो ईर्ष्याकी आग जलती थी, वह अब बुझ गयी थी। प्रातःकाल जब बहूने उठकर पतिकी शय्याको देखा तो वह खूनसे भीगी दिखायी दी और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दृष्टिगोचर हुए, इससे उसको बड़ा दुःख हुआ। उसने सास (घुश्मा)-के पास जाकर निवेदन किया—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली आर्ये! आपके पुत्र कहाँ गये? उनकी शय्या रक्तसे भीगी हुई है और उसपर शरीरके कुछ टुकड़े दिखायी देते हैं। हाय! मैं मारी गयी! किसने यह दुष्ट कर्म किया है?' ऐसा कहकर वह बेटेकी प्रिय पत्नी भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करती हुई रोने लगी। सुधर्माकी बड़ी पत्नी सुदेहा भी उस समय 'हाय! मैं मारी गयी।' ऐसा कहकर दुःखमें डूब गयी। उसने ऊपरसे तो दुःख किया, किंतु मन-ही-मन वह हर्षसे भरी हुई थी! घुश्मा भी उस समय उस वधूके दुःखको सुनकर अपने नित्य पार्थिव-पूजनके व्रतसे विचलित नहीं हुई। उसका मन बेटेको देखनेके लिये तनिक भी उत्सुक नहीं हुआ। उसके पतिकी भी ऐसी ही अवस्था थी। जबतक नित्य-नियम पूरा नहीं हुआ, तबतक उन्हें दूसरी किसी बातकी चिन्ता नहीं हुई। दोपहरको पूजन समाप्त होनेपर घुश्माने अपने पुत्रकी भयंकर शय्यापर दृष्टिपात किया, तथापि उसने मनमें किंचिन्मात्र भी दुःख नहीं माना। वह सोचने लगी—'जिन्होंने यह बेटा दिया था, वे ही इसकी रक्षा करेंगे। वे भक्तप्रिय कहलाते हैं, कालके भी काल हैं और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। एकमात्र वे प्रभु सर्वेश्वर शम्भु ही हमारे रक्षक हैं। वे माला गूँथनेवाले पुरुषकी भाँति जिनको जोड़ते हैं, उनको अलग भी करते हैं। अतः अब मेरे चिन्ता करनेसे क्या होगा।' इस तत्त्वका विचार करके उसने शिवके भरोसे धैर्य धारण किया और उस समय दुःखका अनुभव नहीं किया। वह पूर्ववत् पार्थिव शिवलिंगोंको लेकर स्वस्थचित्तसे शिवके नामोंका उच्चारण करती