भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५३६* संक्षिप्त शिवपुराण *

हुई उस तालाबके किनारे गयी। उन पार्थिव लिंगोंको तालाबमें डालकर जब वह लौटने लगी तो उसे अपना पुत्र उसी तालाबके किनारे खड़ा दिखायी दिया।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! उस समय वहाँ अपने पुत्रको जीवित देखकर उसकी माता घुश्माको न तो हर्ष हुआ और न विषाद। वह पूर्ववत् स्वस्थ बनी रही। इसी समय उसपर संतुष्ट हुए ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिव शीघ्र उसके सामने प्रकट हो गये।

शिव बोले—सुमुखि ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तेरी दुष्टा सौतने इस बच्चेको मार डाला था। अतः मैं उसे त्रिशूलसे मारूँगा।

सूतजी कहते हैं—तब घुश्माने शिवको प्रणाम करके उस समय यह वर माँगा—'नाथ ! यह सुदेहा मेरी बड़ी बहिन है, अतः आपको इसकी रक्षा करनी चाहिये।'

शिव बोले—उसने तो बड़ा भारी अपकार किया है, तुम उसपर उपकार क्यों करती हो ? दुष्ट कर्म करनेवाली सुदेहा तो मार डालनेके ही योग्य है।

घुश्माने कहा—देव ! आपके दर्शनमात्रसे पातक नहीं ठहरता। इस समय आपका दर्शन करके उसका पाप भस्म हो जाय। 'जो अपकार करनेवालोंपर भी उपकार करता है, उसके दर्शनमात्रसे पाप बहुत दूर भाग जाता है।'* प्रभो ! यह अद्भुत भगवद्वाक्य मैंने सुन रखा है। इसलिये सदाशिव ! जिसने ऐसा कुकर्म किया है, वही करे; मैं ऐसा क्यों करूँ ( मुझे तो बुरा करनेवालेका भी भला ही करना है)।

सूतजी कहते हैं—घुश्माके ऐसा कहनेपर दयासिन्धु भक्तवत्सल महेश्वर और भी प्रसन्न हुए तथा इस प्रकार बोले—'घुश्मे ! तुम कोई और भी वर माँगो। मैं तुम्हारे लिये हितकर वर अवश्य दूँगा; क्योंकि तुम्हारी इस भक्तिसे और विकारशून्य स्वभावसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।'

भगवान् शिवकी बात सुनकर घुश्मा बोली—'प्रभो! यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोगोंकी रक्षाके लिये सदा यहाँ निवास कीजिये और मेरे नामसे ही आपकी ख्याति हो।' तब महेश्वर शिवने अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—'मैं तुम्हारे ही नामसे घुश्मेश्वर कहलाता हुआ सदा यहाँ निवास करूँगा और सबके लिये सुखदायक होऊँगा। मेरा शुभ ज्योतिर्लिंग घुश्मेश नामसे प्रसिद्ध हो।


* अपकारेषु यश्चैव ह्युपकारं करोति वै। तस्य दर्शनमात्रेण पापं दूरतरं व्रजेत् ॥
(शि० पु० को० रु० सं० ३३। २९)