भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 551

* कोटिरुद्रसंहिता * ५३७

यह सरोवर शिवलिंगोंका आलय हो जाय और इसीलिये इसकी तीनों लोकोंमें शिवालय नामसे प्रसिद्धि हो। यह सरोवर सदा दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंका देनेवाला हो। सुव्रते! तुम्हारे वंशमें होनेवाली एक सौ एक पीढ़ियोंतक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है। वे सब-के-सब सुन्दरी स्त्री, उत्तम धन और पूर्ण आयुसे सम्पन्न होंगे, चतुर और विद्वान् होंगे, उदार तथा भोग और मोक्षरूपी फल पानेके अधिकारी होंगे। एक सौ एक पीढ़ियोंतक सभी पुत्र गुणोंमें बढ़े-चढ़े होंगे। तुम्हारे वंशका ऐसा विस्तार बड़ा शोभादायक होगा।'

ऐसा कहकर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये। उनकी घुश्मेश नामसे प्रसिद्धि हुई और उस सरोवरका नाम शिवालय हो गया। सुधर्मा, घुश्मा और सुदेहा—तीनोंने आकर तत्काल ही उस शिवलिंगकी एक सौ एक दक्षिणावर्त परिक्रमा की। पूजा करके परस्पर मिलकर मनका मैल दूर करके वे सब वहाँ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। पुत्रको जीवित देख सुदेहा बहुत लज्जित हुई और पति तथा घुश्मासे क्षमा-प्रार्थना करके उसने अपने पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्त किया। मुनीश्वरो! इस प्रकार वह घुश्मेश्वर लिंग प्रकट हुआ। उसका दर्शन और पूजन करनेसे सदा सुखकी वृद्धि होती है। ब्राह्मणो! इस तरह मैंने तुमसे बारह ज्योतिर्लिंगोंकी महिमा बतायी। ये सभी लिंग सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक तथा भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। जो इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथाको पढ़ता और सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है।
(अध्याय ३२-३३)


द्वादश ज्योतिर्लिंगोंके माहात्म्यकी समाप्ति