शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३७
यह सरोवर शिवलिंगोंका आलय हो जाय और इसीलिये इसकी तीनों लोकोंमें शिवालय नामसे प्रसिद्धि हो। यह सरोवर सदा दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण अभीष्टोंका देनेवाला हो। सुव्रते! तुम्हारे वंशमें होनेवाली एक सौ एक पीढ़ियोंतक ऐसे ही श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न होंगे, इसमें संशय नहीं है। वे सब-के-सब सुन्दरी स्त्री, उत्तम धन और पूर्ण आयुसे सम्पन्न होंगे, चतुर और विद्वान् होंगे, उदार तथा भोग और मोक्षरूपी फल पानेके अधिकारी होंगे। एक सौ एक पीढ़ियोंतक सभी पुत्र गुणोंमें बढ़े-चढ़े होंगे। तुम्हारे वंशका ऐसा विस्तार बड़ा शोभादायक होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव वहाँ ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये। उनकी घुश्मेश नामसे प्रसिद्धि हुई और उस सरोवरका नाम शिवालय हो गया। सुधर्मा, घुश्मा और सुदेहा—तीनोंने आकर तत्काल ही उस शिवलिंगकी एक सौ एक दक्षिणावर्त परिक्रमा की। पूजा करके परस्पर मिलकर मनका मैल दूर करके वे सब वहाँ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। पुत्रको जीवित देख सुदेहा बहुत लज्जित हुई और पति तथा घुश्मासे क्षमा-प्रार्थना करके उसने अपने पापके निवारणके लिये प्रायश्चित्त किया। मुनीश्वरो! इस प्रकार वह घुश्मेश्वर लिंग प्रकट हुआ। उसका दर्शन और पूजन करनेसे सदा सुखकी वृद्धि होती है। ब्राह्मणो! इस तरह मैंने तुमसे बारह ज्योतिर्लिंगोंकी महिमा बतायी। ये सभी लिंग सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक तथा भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। जो इन ज्योतिर्लिंगोंकी कथाको पढ़ता और सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता तथा भोग और मोक्ष पाता है।
(अध्याय ३२-३३)
द्वादश ज्योतिर्लिंगोंके माहात्म्यकी समाप्ति
५३८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार
व्यासजी कहते हैं—सूतका यह वचन सुनकर उन मुनीश्वरोंने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके लोकहितकी कामनासे इस प्रकार कहा।
ऋषि बोले—सूतजी ! आप सब जानते हैं। इसलिये हम आपसे पूछते हैं। प्रभो ! हरीश्वरलिंगकी महिमाका वर्णन कीजिये। तात ! हमने पहलेसे सुन रखा है कि भगवान् विष्णुने शिवकी आराधनासे सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। अतः उस कथापर भी विशेषरूपसे प्रकाश डालिये।
सूतजीने कहा—मुनिवरो ! हरीश्वर-लिंगकी शुभ कथा सुनो ! भगवान् विष्णुने पूर्वकालमें हरीश्वर शिवसे ही सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। एक समयकी बात है, दैत्य अत्यन्त प्रबल होकर लोगोंको पीड़ा देने और धर्मका लोप करने लगे। उन महाबली और पराक्रमी दैत्योंसे पीड़ित हो देवताओंने देवरक्षक भगवान् विष्णुसे अपना सारा दुःख कहा। तब श्रीहरि कैलासपर जाकर भगवान् शिवकी विधिपूर्वक आराधना करने लगे। वे हजार नामोंसे शिवकी स्तुति करते तथा प्रत्येक नामपर एक कमल चढ़ाते थे। तब भगवान् शंकरने विष्णुके भक्तिभावकी परीक्षा करनेके लिये उनके लाये हुए एक हजार कमलोंमेंसे एकको छिपा दिया। शिवकी मायाके कारण घटित हुई इस अद्भुत घटनाका भगवान् विष्णुको पता नहीं लगा। उन्होंने एक फूल कम जानकर उसकी खोज आरम्भ की। दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीहरिने भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये उस एक फूलकी प्राप्तिके उद्देश्यसे सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया, परंतु कहीं भी उन्हें वह फूल नहीं मिला। तब विशुद्धचेता विष्णुने एक फूलकी पूर्तिके लिये अपने कमलसदृश एक नेत्रको ही निकालकर चढ़ा दिया। यह देख सबका दुःख दूर करनेवाले भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए और वहीं उनके सामने प्रकट हो गये। प्रकट होकर वे श्रीहरिसे बोले—'हरे! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो। मैं तुम्हें मनोवांछित वस्तु दूँगा। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'
विष्णु बोले—नाथ! आपके सामने मुझे क्या कहना है। आप अन्तर्यामी हैं, अतः सब कुछ जानते हैं, तथापि आपके आदेशका गौरव रखनेके लिये कहता हूँ। दैत्योंने सारे जगत्को पीड़ित कर रखा है। सदाशिव! हमलोगोंको सुख नहीं मिलता। स्वामिन्! मेरा अपना अस्त्र-शस्त्र दैत्योंके वधमें काम नहीं देता। परमेश्वर! इसीलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ।
सूतजी कहते हैं—श्रीविष्णुका यह वचन सुनकर देवाधिदेव महेश्वरने तेजो-राशिमय अपना सुदर्शन चक्र उन्हें दे दिया। उसको पाकर भगवान् विष्णुने उन समस्त प्रबल दैत्योंका उस चक्रके द्वारा बिना परिश्रमके ही संहार कर डाला। इससे सारा जगत् स्वस्थ हो गया। देवताओंको भी सुख मिला और अपने लिये उस आयुधको पाकर भगवान् विष्णु भी अत्यन्त प्रसन्न एवं परम सुखी हो गये।
* कोटिरुद्रसंहिता * ५३९
ऋषियोंने पूछा—शिवके वे सहस्र नाम कौन-कौन हैं, बताइये, जिनसे संतुष्ट होकर महेश्वरने श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था? उन नामोंके माहात्म्यका भी वर्णन कीजिये। श्रीविष्णुके ऊपर शंकरजीकी जैसी कृपा हुई थी, उसका यथार्थरूपसे प्रतिपादन कीजिये।
शुद्ध अन्तःकरणवाले उन मुनियोंकी वैसी बात सुनकर सूतने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया। (अध्याय ३४)
भगवान् विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्रनामस्तोत्र
सूत उवाच
श्रूयतां भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः।
तदहं कथयाम्यद्य शैवं नामसहस्रकम्॥ १॥
सूतजी बोले— मुनिवरो! सुनो, जिससे महेश्वर संतुष्ट होते हैं, वह शिवसहस्रनाम-स्तोत्र आज तुम सबको सुना रहा हूँ॥ १॥
विष्णुरुवाच
शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्करः पुष्पलोचनः।
अर्थिगम्यः सदाचारः शर्वः शम्भुर्महेश्वरः॥ २॥
भगवान् विष्णुने कहा— १ शिवः—कल्याणस्वरूप, २ हरः—भक्तोंके पाप-ताप हर लेनेवाले, ३ मृडः—सुखदाता, ४ रुद्रः—दुःख दूर करनेवाले, ५ पुष्करः—आकाशस्वरूप, ६ पुष्पलोचनः—पुष्पके समान खिले हुए नेत्रवाले, ७ अर्थिगम्यः—प्रार्थियोंको प्राप्त होनेवाले, ८ सदाचारः—श्रेष्ठ आचरणवाले, ९ शर्वः—संहारकारी, १० शम्भुः—कल्याणनिकेतन, ११ महेश्वरः—महान् ईश्वर ॥ २॥
चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विश्वं विश्वम्भ्रेश्वरः।
वेदान्तसारसंदोहः कपाली नीललोहितः॥ ३॥
१२ चन्द्रापीडः—चन्द्रमाको शिरोभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, १३ चन्द्रमौलिः—सिरपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले, १४ विश्वम्—सर्वस्वरूप, १५ विश्वम्भरेश्वरः—विश्वका भरण-पोषण करनेवाले श्रीविष्णुके भी ईश्वर, १६ वेदान्तसारसंदोहः—वेदान्तके सारतत्त्व सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकी साकार मूर्ति, १७ कपाली—हाथमें कपाल धारण करनेवाले, १८ नीललोहितः—(गलेमें) नील और (शेष अंगोंमें) लोहित-वर्णवाले॥ ३॥
ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः।
अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गस्वर्गसाधनः ॥४॥
१९ ध्यानाधारः—ध्यानके आधार, २० अपरिच्छेद्यः—देश, काल और वस्तुकी सीमासे अविभाज्य, २१ गौरीभर्ता—गौरी अर्थात् पार्वतीजीके पति, २२ गणेश्वरः—प्रमथगणोंके स्वामी, २३ अष्टमूर्तिः—जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और यजमान—इन आठ रूपोंवाले, २४ विश्व-मूर्तिः—अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् पुरुष, २५ त्रिवर्गस्वर्गसाधनः—धर्म, अर्थ, काम तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले ॥४॥
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः।
वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढः॥५॥
२६ ज्ञानगम्यः—ज्ञानसे ही अनुभवमें आनेके योग्य, २७ दृढप्रज्ञः—सुस्थिर बुद्धिवाले, २८ देवदेवः—देवताओंके भी आराध्य, २९ त्रिलोचनः—सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रोंवाले, ३० वामदेवः—लोकके विपरीत स्वभाववाले देवता, ३१ महादेवः—महान् देवता ब्रह्मादिकोंके भी पूजनीय, ३२ पटुः—सब कुछ करनेमें समर्थ
५४० * संक्षिप्त शिवपुराण *
एवं कुशल, ३३ परिवृढः—स्वामी, ३४ दृढः— कभी विचलित न होनेवाले ॥ ५ ॥
विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिसत्तमः।
सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः॥ ६॥
३५ विश्वरूपः—जगत्स्वरूप, ३६ विरूपाक्षः—विकट नेत्रवाले, ३७ वागीशः—वाणीके अधिपति, ३८ शुचिसत्तमः—पवित्र पुरुषोंमें भी सबसे श्रेष्ठ, ३९ सर्वप्रमाणसंवादी—सम्पूर्ण प्रमाणोंमें सामंजस्य स्थापित करनेवाले, ४० वृषाङ्कः—अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, ४१ वृषवाहनः—वृषभ या धर्मको वाहन बनानेवाले ॥ ६॥
ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरंतनः।
तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटिः॥ ७॥
४२ ईशः—स्वामी या शासक, ४३ पिनाकी—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ४४ खट्वाङ्गी—खाटके पायेकी आकृतिका एक आयुध धारण करनेवाले, ४५ चित्रवेषः—विचित्र वेषधारी, ४६ चिरंतनः—पुराण (अनादि) पुरुषोत्तम, ४७ तमोहरः—अज्ञानान्धकारको दूर करनेवाले, ४८ महायोगी—महान् योगसे सम्पन्न, ४९ गोप्ता—रक्षक, ५० ब्रह्मा— सृष्टिकर्ता, ५१ धूर्जटिः—जटाके भारसे युक्त॥ ७॥
कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः।
उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्वासाः पुरशासनः॥ ८॥
५२ कालकालः—कालके भी काल, ५३ कृत्तिवासाः—गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, ५४ सुभगः—सौभाग्यशाली, ५५ प्रणवात्मकः— ओंकारस्वरूप अथवा प्रणवके वाच्यार्थ, ५६ उन्नध्रः—बन्धनरहित, ५७ पुरुषः— अन्तर्यामी आत्मा, ५८ जुष्यः—सेवन करनेयोग्य, ५९ दुर्वासाः—'दुर्वासा' नामक मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ६० पुरशासनः—तीन मायामय असुरपुरोंका दमन करनेवाले ॥ ८ ॥
दिव्यायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी परात्परः।
अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधवः॥ ९॥
६१ दिव्यायुधः—'पाशुपत' आदि दिव्य अस्त्र धारण करनेवाले, ६२ स्कन्दगुरुः—कार्तिकेयजीके पिता, ६३ परमेष्ठी—अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेवाले, ६४ परात्परः—कारणके भी कारण, ६५ अनादिमध्यनिधनः—आदि, मध्य और अन्तसे रहित, ६६ गिरीशः—कैलासके अधिपति, ६७ गिरिजाधवः—पार्वतीके पति॥ ९॥
कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदुः।
समाधिवेद्यः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी ॥ १०॥
६८ कुबेरबन्धुः—कुबेरको अपना बन्धु (मित्र) माननेवाले, ६९ श्रीकण्ठः—श्यामसुषमासे सुशोभित कण्ठवाले, ७० लोकवर्णोत्तमः—समस्त लोकों और वर्णोंसे श्रेष्ठ, ७१ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ७२ समाधिवेद्यः—समाधि अथवा चित्तवृत्तियोंके निरोधसे अनुभवमें आनेयोग्य, ७३ कोदण्डी—धनुर्धर, ७४ नीलकण्ठः—कण्ठमें हालाहल विषका नील चिह्न धारण करनेवाले, ७५ परश्वधी—परशुधारी ॥ १० ॥
विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः।
धर्मधाम क्षमाक्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् ॥ ११॥
७६ विशालाक्षः—बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, ७७ मृगव्याधः—वनमें व्याध या किरातके रूपमें प्रकट हो शूकरके ऊपर बाण चलानेवाले, ७८ सुरेशः—देवताओंके स्वामी, ७९ सूर्यतापनः— सूर्यको भी दण्ड देनेवाले,
* कोटिरुद्रसंहिता * ५४१
८० धर्मधाम—धर्मके आश्रय, ८१ क्षमाक्षेत्रम्—क्षमाके उत्पत्ति-स्थान, ८२ भगवान्—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्यके आश्रय, ८३ भगनेत्रभित्—भगदेवताके नेत्रका भेदन करनेवाले ॥ ११ ॥
उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परंतपः।
दाता दयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः ॥ १२ ॥
८४ उग्रः—संहारकालमें भयंकर रूप धारण करनेवाले, ८५ पशुपतिः—मायारूपमें बँधे हुए पाशबद्ध पशुओं (जीवों)-को तत्त्वज्ञानके द्वारा मुक्त करके यथार्थरूपसे उनका पालन करनेवाले, ८६ तार्क्ष्यः—गरुड़रूप, ८७ प्रियभक्तः—भक्तोंसे प्रेम करनेवाले, ८८ परंतपः—शत्रुता रखनेवालोंको संताप देनेवाले, ८९ दाता—दानी, ९० दयाकरः—दयानिधान अथवा कृपा करनेवाले, ९१ दक्षः—कुशल, ९२ कपर्दी—जटाजूटधारी, ९३ कामशासनः—कामदेवका दमन करनेवाले ॥ १२ ॥
श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः।
लोककर्ता मृगपतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥ १३ ॥
९४ श्मशाननिलयः—श्मशानवासी, ९५ सूक्ष्मः—इन्द्रियातीत एवं सर्वव्यापी, ९६ श्मशानस्थः—श्मशानभूमिमें विश्राम करनेवाले, ९७ महेश्वरः—महान् ईश्वर या परमेश्वर, ९८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ९९ मृगपतिः—मृगके पालक या पशुपति, १०० महाकर्ता—विराट् ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेके समय महान् कर्तृत्वसे सम्पन्न, १०१ महौषधिः—भवरोगका निवारण करनेके लिये महान् ओषधिरूप ॥ १३ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमरतः सुखी ॥ १४ ॥
१०२ उत्तरः—संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, १०३ गोपतिः—स्वर्ग, पृथ्वी, पशु, वाणी, किरण, इन्द्रिय और जलके स्वामी, १०४ गोप्ता—रक्षक, १०५ ज्ञानगम्यः—तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञानस्वरूपसे ही जाननेयोग्य, १०६ पुरातनः—सबसे पुराने, १०७ नीतिः—न्यायस्वरूप, १०८ सुनीतिः—उत्तम नीतिवाले, १०९ शुद्धात्मा—विशुद्ध आत्मस्वरूप, ११० सोमः—उमासहित, १११ सोमरतः—चन्द्रमापर प्रेम रखनेवाले, ११२ सुखी—आत्मानन्दसे परिपूर्ण ॥ १४ ॥
सोमपोऽमृतपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः।
तेजोमयोऽमृतमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः ॥ १५ ॥
११३ सोमपः—सोमपान करनेवाले अथवा सोमनाथरूपसे चन्द्रमाके पालक, ११४ अमृतपः—समाधिके द्वारा स्वरूपभूत अमृतका आस्वादन करनेवाले, ११५ सौम्यः—भक्तोंके लिये सौम्यरूपधारी, ११६ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, ११७ महाद्युतिः—परमकान्तिमान्, ११८ तेजोमयः—प्रकाशस्वरूप, ११९ अमृतमयः—अमृतरूप, १२० अन्नमयः—अन्नरूप, १२१ सुधापतिः—अमृतके पालक ॥ १५ ॥
अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः।
लोककरो वेदकरः सूत्रकारः सनातनः ॥ १६ ॥
१२२ अजातशत्रुः—जिनके मनमें कभी किसीके प्रति शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ, ऐसे समदर्शी, १२३ आलोकः—प्रकाशस्वरूप, १२४ सम्भाव्यः—सम्माननीय, १२५ हव्यवाहनः—अग्निस্বরূপ, १२६ लोककरः—जगत्के स्रष्टा, १२७ वेदकरः—वेदोंके प्रकट करनेवाले, १२८ सूत्रकारः—ढक्कानादके रूपमें चतुर्दश माहेश्वर सूत्रोंके प्रणेता, १२९ सनातनः—नित्यस्वरूप ॥ १६ ॥
५४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
महर्षिकपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।
पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सुधीः ॥ १७॥
१३० महर्षिकपिलाचार्यः—सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, १३१ विश्वदीप्तिः—अपनी प्रभासे सबको प्रकाशित करनेवाले, १३२ त्रिलोचनः—तीनों लोकोंके द्रष्टा, १३३ पिनाकपाणिः—हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, १३४ भूदेवः— पृथ्वीके देवता—ब्राह्मण अथवा पार्थिवलिंगरूप; १३५ स्वस्तिदः—कल्याणदाता, १३६ स्वस्तिकृत्— कल्याणकारी, १३७ सुधीः—विशुद्ध बुद्धिवाले ॥ १७ ॥
धातुधामा धामकरः सर्वगः सर्वगोचरः।
ब्रह्मसृग्विश्वासृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कविः ॥ १८ ॥
१३८ धातुधामा—विश्वका धारण-पोषण करनेमें समर्थ तेजवाले, १३९ धामकरः—तेजकी सृष्टि करनेवाले, १४० सर्वगः—सर्वव्यापी, १४१ सर्वगोचरः—सबमें व्याप्त, १४२ ब्रह्मसृक्—ब्रह्माजीके उत्पादक, १४३ विश्वसृक्—जगत्के स्रष्टा, १४४ सर्गः—सृष्टिस्वरूप, १४५ कर्णिकारप्रियः—कनेरके फूलको पसंद करनेवाले, १४६ कविः—त्रिकालदर्शी ॥ १८ ॥
शाखो विशाखो गोशाखः शिवो भिषगनुत्तमः।
गङ्गाप्लवोदको भव्यः पुष्कलः स्थपतिः स्थिरः ॥ १९ ॥
१४७ शाखः—कार्तिकेयके छोटे भाई शाखस्वरूप, १४८ विशाखः—स्कन्दके छोटे भाई विशाखस्वरूप अथवा विशाख नामक ऋषि, १४९ गोशाखः—वेदवाणीकी शाखाओंका विस्तार करनेवाले, १५० शिवः—मंगलमय, १५१ भिषगनुत्तमः—भवरोगका निवारण करनेवाले वैद्यों (ज्ञानियों)—में सर्वश्रेष्ठ, १५२ गङ्गाप्लवोदकः—गङ्गाके प्रवाहरूप जलको सिरपर धारण करनेवाले, १५३ भव्यः—कल्याणस्वरूप, १५४ पुष्कलः—पूर्णतम अथवा व्यापक, १५५ स्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी भवनके निर्माता (थवई), १५६ स्थिरः—अचंचल अथवा स्थाणुरूप ॥ १९ ॥
विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।
सगणो गणकायश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ २०॥
१५७ विजितात्मा—मनको वशमें रखनेवाले, १५८ विधेयात्मा—शरीर, मन और इन्द्रियोंसे अपनी इच्छाके अनुसार काम लेनेवाले, १५९ भूतवाहनसारथिः— पांचभौतिक रथ (शरीर)—का संचालन करनेवाले बुद्धिरूप सारथि, १६० सगणः— प्रमथगणोंके साथ रहनेवाले, १६१ गणकायः—गणस्वरूप, १६२ सुकीर्तिः—उत्तम कीर्तिवाले, १६३ छिन्नसंशयः—संशयोंको काट देनेवाले ॥ २० ॥
कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।
भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः ॥ २१ ॥
१६४ कामदेवः—मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, १६५ कामपालः—सकाम भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, १६६ भस्मोद्धूलितविग्रहः—अपने श्रीअंगोंमें भस्म रमानेवाले, १६७ भस्मप्रियः—भस्मके प्रेमी, १६८ भस्मशायी—भस्मपर शयन करनेवाले, १६९ कामी—अपने प्रिय भक्तोंको चाहनेवाले, १७० कान्तः—परम कमनीय प्राणवल्लभस्वरूप, १७१ कृतागमः—समस्त तन्त्रशास्त्रोंके रचयिता ॥ २१ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा धर्मपुञ्जः सदाशिवः।
अकल्मषश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ २२ ॥
१७२ समावर्तः—संसारचक्रको भलीभाँति
- कोटिरुद्रसंहिता * ५४३
घुमानेवाले, १७३ अनिवृत्तात्मा—सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा नहीं है, ऐसे, १७४ धर्मपुञ्जः—धर्म या पुण्यकी राशि, १७५ सदाशिवः—निरन्तर कल्याणकारी, १७६ अकल्मषः—पापरहित, १७७ चतुर्बाहुः—चार भुजाधारी, १७८ दुरावासः— जिन्हें योगीजन भी बड़ी कठिनाईसे अपने हृदयमन्दिरमें बसा पाते हैं, ऐसे, १७९ दुरासदः—परम दुर्जय ॥ २२ ॥
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गः सर्व switchायुधविशारदः। अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ २३॥
१८० दुर्लभः—भक्तिहीन पुरुषोंको कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, १८१ दुर्गमः—जिनके निकट पहुँचना किसीके लिये भी कठिन है ऐसे, १८२ दुर्गः—पाप-तापसे रक्षा करनेके लिये दुर्गरूप अथवा दुर्ज्ञेय, १८३ सर्वायुधविशारदः—सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगकी कलामें कुशल, १८४ अध्यात्मयोगनिलयः—अध्यात्मयोगमें स्थित, १८५ सुतन्तुः—सुन्दर विस्तृत जगत्-रूप तन्तुवाले, १८६ तन्तुवर्धनः—जगत्-रूप तन्तुको बढ़ानेवाले ॥ २३ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीश जनार्दनः। भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ २४॥
१८७ शुभाङ्गः—सुन्दर अंगोंवाले, १८८ लोकसारङ्गः—लोकसारग्राही, १८९ जगदीशः—जगत्के स्वामी, १९० जनार्दनः—भक्तजनोंकी याचनाके आलम्बन, १९१ भस्मशुद्धिकरः—भस्मसे शुद्धिका सम्पादन करनेवाले, १९२ मेरुः—सुमेरु पर्वतके समान केन्द्ररूप, १९३ ओजस्वी—तेज और बलसे सम्पन्न, १९४ शुद्धविग्रहः—निर्मल शरीरवाला॥ २४॥
असाध्यः साधुसाध्यश्च भृत्यमर्करूपधृक्। हिरण्यरेताः पौराणो रिपुजीवहरो बली॥ २५॥
१९५ असाध्यः—साधन-भजनसे दूर रहनेवाले लोगोंके लिये अलभ्य, १९६ साधुसाध्यः—साधन-भजनपरायण सत्पुरुषोंके लिये सुलभ, १९७ भृत्यमर्कटरूपधृक्—श्रीरामके सेवक वानर हनुमान्का रूप धारण करनेवाले, १९८ हिरण्यरेताः—अग्निस्वरूप अथवा सुवर्णमय वीर्यवाले, १९९ पौराणः—पुराणोंद्वारा प्रतिपादित, २०० रिपुजीवहरः—शत्रुओंके प्राण हर लेनेवाले, २०१ बली—बलशाली ॥ २५ ॥
महाह्रदो महागर्तः सिद्धवृन्दारवन्दितः। व्याघ्रचर्माम्बरो व्याली महाभूतो महानिधिः॥ २६॥
२०२ महाह्रदः—परमानन्दके महान् सरोवर, २०३ महागर्तः—महान् आकाशरूप, २०४ सिद्धवृन्दारवन्दितः—सिद्धों और देवताओंद्धारा वन्दित, २०५ व्याघ्रचर्माम्बरः—व्याघ्रचर्मको वस्त्रके समान धारण करनेवाले, २०६ व्याली—सर्पोंको आभूषणकी भाँति धारण करनेवाले, २०७ महाभूतः—त्रिकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, २०८ महानिधिः—सबके महान् निवासस्थान॥ २६॥
अमृताशोऽमृतवपुः पाञ्चजन्यः प्रभञ्जनः। पञ्चविंशतितत्त्वस्थः पारिजातः परावरः॥ २७॥
२०९ अमृताशः—जिनकी आशा कभी विफल न हो ऐसे अमोघसंकल्प, २१० अमृतवपुः—जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो ऐसे—नित्यविग्रह, २११ पाञ्चजन्यः—पांचजन्य नामक शंखस्वरूप, २१२ प्रभञ्जनः—वायुस्वरूप अथवा संहारकारी, २१३ पञ्चविंशतितत्त्वस्थः—प्रकृति, महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार, चक्षु, श्रोत्र,
| ५४४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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घ्राण, रसना, त्वक्, वाक्, पाणि, पायु, पाद, उपस्थ, मन, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन चौबीस जड तत्त्वोंसहित पचीसवें चेतनतत्त्वपुरुषमें व्याप्त, २१४ पारिजातः—याचकोंकी इच्छा पूर्ण करनेमें कल्पवृक्षरूप, २१५ परावरः—कारण-कार्यरूप ॥ २७ ॥
सुलभः सुव्रतः शूरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधिः ।
वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ २८ ॥
२१६ सुलभः—नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, २१७ सुव्रतः—उत्तम व्रतधारी, २१८ शूरः—शौर्यसम्पन्न, २१९ ब्रह्मवेदनिधिः—ब्रह्मा और वेदके प्रादुर्भावके स्थान, २२० निधिः—जगत्-रूपी रत्नके उत्पत्तिस्थान, २२१ वर्णाश्रमगुरुः—वर्णों और आश्रमोंके गुरु (उपदेष्टा), २२२ वर्णी—ब्रह्मचारी, २२३ शत्रुजित्—अन्धकासुर आदि शत्रुओंको जीतनेवाले, २२४ शत्रुतापनः—शत्रुओंको संताप देनेवाले ॥ २८ ॥
आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलेश्वरः ।
प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ २९ ॥
२२५ आश्रमः—सबके विश्रामस्थान, २२६ क्षपणः—जन्म-मरणके कष्टका मूलोच्छेद करनेवाले, २२७ क्षामः—प्रलयकालमें प्रजाको क्षीण करनेवाले, २२८ ज्ञानवान्—ज्ञानी, २२९ अचलेश्वरः—पर्वतों अथवा स्थावर पदार्थोंके स्वामी, २३० प्रमाणभूतः—नित्यसिद्ध प्रमाणरूप, २३१ दुर्ज्ञेयः—कठिनतासे जाननेयोग्य, २३२ सुपर्णः—वेदमय सुन्दर पंखवाले, गरुड़रूप, २३३ वायुवाहनः—अपने भयसे वायुको प्रवाहित करनेवाले ॥ २९ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः ।
सत्यः सत्यपरोऽदीनो धर्माङ्गो धर्मसाधनः ॥ ३० ॥
२३४ धनुर्धरः—पिनाकधारी, २३५ धनुर्वेदः—धनुर्वेदके ज्ञाता, २३६ गुणराशिः—अनन्त कल्याणमय गुणोंकी राशि, २३७ गुणाकरः—सद्गुणोंकी खानि, २३८ सत्यः—सत्यस्वरूप, २३९ सत्यपरः—सत्यपरायण, २४० अदीनः—दीनतासे रहित—उदार, २४१ धर्माङ्गः—धर्ममय विग्रहवाले, २४२ धर्मसाधनः—धर्मका अनुष्ठान करनेवाले ॥ ३० ॥
अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः ।
अभिवाद्यो महामायो विश्वकर्मविशारदः ॥ ३१ ॥
२४३ अनन्तदृष्टिः—असीमित दृष्टिवाले, २४४ आनन्दः—परमानन्दमय, २४५ दण्डः—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले अथवा दण्डस्वरूप, २४६ दमयिता—दुर्दान्त दानवोंका दमन करनेवाले, २४७ दमः—दमनस्वरूप, २४८ अभिवाद्यः—प्रणाम करनेयोग्य, २४९ महामायः—मायावियोंको भी मोहनेवाले महामायावी, २५० विश्वकर्मविशारदः—संसारकी सृष्टि करनेमें कुशल ॥ ३१ ॥
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः ।
उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः ॥ ३२ ॥
२५१ वीतरागः—पूर्णतया विरक्त, २५२ विनीतात्मा—मनसे विनयशील अथवा मनको वशमें रखनेवाले, २५३ तपस्वी—तपस्यापरायण, २५४ भूतभावनः—सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक एवं रक्षक, २५५ उन्मत्तवेषः—पागलोंके समान वेष धारण करनेवाले, २५६ प्रच्छन्नः—मायाके पर्देमें छिपे हुए, २५७ जितकामः—कामविजयी, २५८ अजितप्रियः—भगवान् विष्णुके प्रेमी ॥ ३२ ॥
* कोटिरुद्रसंहिता *
५४५
कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वलोकप्रजापतिः।
तरस्वी तारको धीमान् प्रधानः प्रभुरव्ययः ॥ ३३ ॥
२५९ कल्याणप्रकृतिः—कल्याणकारी स्वभाववाले, २६० कल्पः—समर्थ, २६१ सर्वलोकप्रजापतिः—सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाके पालक, २६२ तरस्वी—वेगशाली, २६३ तारकः—उद्धारक, २६४ धीमान्—विशुद्ध बुद्धिसे युक्त, २६५ प्रधानः—सबसे श्रेष्ठ, २६६ प्रभुः—सर्वसमर्थ, २६७ अव्ययः—अविनाशी ॥ ३३ ॥
लोकपालोऽन्तर्हितात्मा कल्पादिः कमलेक्षणः।
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञोऽनियमो नियताश्रयः ॥ ३४ ॥
२६८ लोकपालः—समस्त लोकोंकी रक्षा करनेवाले, २६९ अन्तर्हितात्मा—अन्तर्यामी आत्मा अथवा अदृश्य स्वरूपवाले, २७० कल्पादिः—कल्पके आदिकारण, २७१ कमलेक्षणः—कमलके समान नेत्रवाले, २७२ वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः—वेदों और शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वको जाननेवाले, २७३ अनियमः—नियन्त्रणरहित, २७४ नियताश्रयः—सबके सुनिश्चित आश्रयस्थान ॥ ३४ ॥
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्वराङ्गो विद्रुमच्छविः।
भक्तिवश्यः परब्रह्म मृगबाणार्पणोऽनघः ॥ ३५ ॥
२७५ चन्द्रः—चन्द्रमारूपसे आह्लादकारी, २७६ सूर्यः—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, २७७ शनिः—शनैश्चररूप, २७८ केतुः—केतु नामक ग्रहस्वरूप, २७९ वराङ्गः—सुन्दर शरीरवाले, २८० विद्रुमच्छविः—मूँगेकी-सी लाल कान्तिवाले, २८१ भक्तिवश्यः—भक्तिके द्वारा भक्तके वशमें होनेवाले, २८२ परब्रह्म—परमात्मा, २८३ मृगबाणार्पणः—मृगरूपधारी यज्ञपर बाण चलानेवाले, २८४ अनघः—पापरहित ॥ ३५ ॥
अद्रिरद्र्यालयः कान्तः परमात्मा जगद्गुरुः।
सर्वकर्मालयस्तुष्टो मङ्गल्यो मङ्गलावृतः ॥ ३६ ॥
२८५ अद्रिः—कैलास आदि पर्वतस्वरूप, २८६ अद्र्यालयः—कैलास और मन्दर आदि पर्वतोंपर निवास करनेवाले, २८७ कान्तः—सबके प्रियतम, २८८ परमात्मा—परब्रह्म परमेश्वर, २८९ जगद्गुरुः—समस्त संसारके गुरु, २९० सर्वकर्मालयः—सम्पूर्ण कर्मोंके आश्रयस्थान, २९१ तुष्टः—सदा प्रसन्न, २९२ मङ्गल्यः—मंगलकारी, २९३ मङ्गलावृतः—मंगलकारिणी शक्तिसे संयुक्त ॥ ३६ ॥
महातपा दीर्घतपाः स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः।
अहःसंवत्सरो व्याप्तिः प्रमाणं परमं तपः ॥ ३७ ॥
२९४ महातपाः—महान् तपस्वी, २९५ दीर्घतपाः—दीर्घकालतक तप करनेवाले, २९६ स्थविष्ठः—अत्यन्त स्थूल, २९७ स्थविरो ध्रुवः—अति प्राचीन एवं अत्यन्त स्थिर, २९८ अहःसंवत्सरः—दिन एवं संवत्सर आदि कालरूपसे स्थित, अंश-कालस्वरूप, २९९ व्याप्तिः—व्यापकतास्वरूप, ३०० प्रमाणम्—प्रत्यक्षादि प्रमाणस्वरूप, ३०१ परमं तपः—उत्कृष्ट तपस्या-स्वरूप ॥ ३७ ॥
संवत्सरकरो मन्त्रप्रत्ययः सर्वदर्शनः।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धो महारेता महाबलः ॥ ३८ ॥
३०२ संवत्सरकरः—संवत्सर आदि कालविभागके उत्पादक, ३०३ मन्त्र-प्रत्ययः—वेद आदि मन्त्रोंसे प्रतीत (प्रत्यक्ष) होनेयोग्य, ३०४ सर्वदर्शनः—सबके साक्षी, ३०५ अजः—अजन्मा, ३०६ सर्वेश्वरः—सबके शासक, ३०७ सिद्धः—सिद्धियोंके आश्रय, ३०८ महारेताः—श्रेष्ठ वीर्यवाले,
५४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
३०९ महाबलः— प्रमथगणोंकी महती सेनासे सम्पन्न ॥ ३८ ॥
योगी योग्यो महातेजाः सिद्धिः सर्वादिराग्रहः।
वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः ॥ ३९ ॥
३१० योगी योग्यः—सुयोग्य योगी, ३११ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, ३१२ सिद्धिः—समस्त साधनोंके फल, ३१३ सर्वादिः—सब भूतोंके आदिकारण, ३१४ अग्रहः—इन्द्रियोंकी ग्रहणशक्तिके अविषय, ३१५ वसुः—सब भूतोंके वासस्थान, ३१६ वसुमनाः—उदार मनवाले, ३१७ सत्यः—सत्यस्वरूप, ३१८ सर्वपापहरो हरः—समस्त पापोंका अपहरण करनेके कारण हर नामसे प्रसिद्ध ॥ ३९ ॥
सुकीर्तिशोभनः श्रीमान् वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनाथो दुराधरः ॥ ४० ॥
३१९ सुकीर्तिशोभनः—उत्तम कीर्तिसे सुशोभित होनेवाले, ३२० श्रीमान्—विभूतिस्वरूपा उमासे सम्पन्न, ३२१ वेदाङ्गः—वेदरूप अंगोंवाले, ३२२ वेदविन्मुनिः—वेदोंका विचार करनेवाले मननशील मुनि, ३२३ भ्राजिष्णुः—एकरस प्रकाशस्वरूप, ३२४ भोजनम्—ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, ३२५ भोक्ता—पुरुषरूपसे उपभोग करनेवाले, ३२६ लोकनाथः—भगवान् विश्वनाथ, ३२७ दुराधरः—अजितेन्द्रिय पुरुषोंद्वारा जिनकी आराधना अत्यन्त कठिन है, ऐसे ॥ ४० ॥
अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।
कमण्डलुधरो धन्वी अवाङ्मनसगोचरः ॥ ४१ ॥
३२८ अमृतः शाश्वतः—सनातन अमृतस्वरूप, ३२९ शान्तः—शान्तिमय, ३३० बाणहस्तः प्रतापवान्—हाथमें बाण धारण करनेवाले प्रतापी वीर, ३३१ कमण्डलुधरः—कमण्डलु धारण करनेवाले, ३३२ धन्वी—पिनाकधारी, ३३३ अवाङ्मनसगोचरः—मन और वाणीके अविषय ॥ ४१ ॥
अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः।
कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः ॥ ४२ ॥
३३४ अतीन्द्रियो महामायः—इन्द्रियातीत एवं महामायावी, ३३५ सर्वावासः—सबके वासस्थान, ३३६ चतुष्पथः—चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धिके एकमात्र मार्ग, ३३७ कालयोगी—प्रलयके समय सबको कालसे संयुक्त करनेवाले, ३३८ महानादः— गम्भीर शब्द करनेवाले अथवा अनाहत नादरूप, ३३९ महोत्साहो महाबलः—महान् उत्साह और बलसे सम्पन्न ॥ ४२ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरंदरः।
निशाचरः प्रेतचारी महाशक्तिर्महाद्युतिः ॥ ४३ ॥
३४० महाबुद्धिः—श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ३४१ महावीर्यः—अनन्त पराक्रमी, ३४२ भूतचारी—भूतगणोंके साथ विचरनेवाले, ३४३ पुरंदरः—त्रिपुरसंहारक, ३४४ निशाचरः—रात्रिमें विचरण करनेवाले, ३४५ प्रेतचारी—प्रेतोंके साथ भ्रमण करनेवाले, ३४६ महाशक्तिर्महाद्युतिः—अनन्तशक्ति एवं श्रेष्ठ कान्तिसे सम्पन्न ॥ ४३ ॥
अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वचार्यमनोगतिः।
बहुश्रुतोऽमहामायो नियतात्मा ध्रुवोऽध्रुवः ॥ ४४ ॥
३४७ अनिर्देश्यवपुः—अनिर्वचनीय स्वरूपवाले, ३४८ श्रीमान्—ऐश्वर्यवान्, ३४९ सर्वचार्यमनोगतिः—सबके लिये अविचार्य मनोगतिवाले, ३५० बहुश्रुतः—बहुज्ञ अथवा सर्वज्ञ, ३५१ अमहामायः—बड़ी-से-बड़ी माया भी जिनपर प्रभाव नहीं डाल सकती ऐसे, ३५२ नियतात्मा—मनको वशमें रखनेवाले, ३५३ ध्रुवोऽध्रुवः—ध्रुव (नित्य कारण) और अध्रुव
789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 B
* कोटिरुद्रसंहिता * ५४७
( अनित्यकार्य ) -रूप ॥ ४४ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरो जनकः सर्वशासनः ।
नृत्यप्रियो नित्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रकाशकः ॥ ४५ ॥
३५४ ओजस्तेजोद्युतिधरः—ओज ( प्राण और बल ), तेज ( शौर्य आदि गुण ) तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले, ३५५ जनकः—सबके उत्पादक, ३५६ सर्वशासनः—सबके शासक, ३५७ नृत्यप्रियः—नृत्यके प्रेमी, ३५८ नित्यनृत्यः—प्रतिदिन ताण्डव नृत्य करनेवाले, ३५९ प्रकाशात्मा—प्रकाशस्वरूप, ३६० प्रकाशकः—सूर्य आदिको भी प्रकाश देनेवाले ॥ ४५ ॥
स्पष्टाक्षरो बुधो मन्त्रः समानः सारसम्प्लवः ।
युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः ॥ ४६ ॥
३६१ स्पष्टाक्षरः—ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले, ३६२ बुधः—ज्ञानवान्, ३६३ मन्त्रः—ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रस्वरूप, ३६४ समानः—सबके प्रति समान भाव रखनेवाले, ३६५ सारसम्प्लवः—संसारसागरसे पार होनेके लिये नौकारूप, ३६६ युगादिकृद्युगावर्तः—युगादिका आरम्भ करनेवाले तथा चारों युगोंको चक्रकी तरह घुमानेवाले, ३६७ गम्भीरः—गाम्भीर्यसे युक्त, ३६८ वृषवाहनः—नन्दी नामक वृषभपर सवार होनेवाले ॥ ४६ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः सुलभः सारशोधनः ।
तीर्थरूपस्तीर्थनामा तीर्थदृश्यस्तु तीर्थदः ॥ ४७ ॥
३६९ इष्टः—परमानन्दस्वरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३७० अविशिष्टः—सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, ३७१ शिष्टेष्टः—शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ३७२ सुलभः—अनन्यचित्तसे निरन्तर स्मरण करनेवाले भक्तोंके लिये सुगमतासे प्राप्त होनेयोग्य, ३७३ सारशोधनः—सारतत्त्वकी खोज करनेवाले, ३७४ तीर्थरूपः—तीर्थस्वरूप, ३७५ तीर्थनामा—तीर्थनामधारी अथवा जिनका नाम भवसागरसे पार लगानेवाला है, ऐसे, ३७६ तीर्थदृश्यः—तीर्थसेवनसे अपने स्वरूपका दर्शन करानेवाले अथवा गुरु-कृपासे प्रत्यक्ष होनेवाले, ३७७ तीर्थदः—चरणोदक स्वरूप तीर्थको देनेवाले ॥ ४७ ॥
अपांनिधिरधिष्ठानं दुर्जयो जयकालवित् ।
प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः ॥ ४८ ॥
३७८ अपांनिधिः—जलके निधान समुद्ररूप, ३७९ अधिष्ठानम्—उपादान-कारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय अथवा जगत्-रूप प्रपंचके अधिष्ठान, ३८० दुर्जयः—जिनको जीतना कठिन है, ऐसे, ३८१ जयकालवित्—विजयके अवसरको समझनेवाले, ३८२ प्रतिष्ठितः—अपनी महिमामें स्थित, ३८३ प्रमाणज्ञः—प्रमाणोंके ज्ञाता, ३८४ हिरण्यकवचः—सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, ३८५ हरिः—श्रीहरिस्वरूप ॥ ४८ ॥
विमोचनः सुरगणो विद्येशो विन्दुसंश्रयः ।
बालरूपोऽबलोन्मत्तोऽविकर्ता गहनो गुहः ॥ ४९ ॥
३८६ विमोचनः—संसारबन्धनसे सदाके लिये छुड़ा देनेवाले, ३८७ सुरगणः—देवसमुदायरूप, ३८८ विद्येशः—सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, ३८९ विन्दुसंश्रयः—बिन्दुरूप प्रणवके आश्रय, ३९० बालरूपः—बालकका रूप धारण करनेवाले, ३९१ अबलोन्मत्तः—बलसे उन्मत्त न होनेवाले, ३९२ अविकर्ता—विकाररहित, ३९३ गहनः—दुर्बोधस्वरूप या अगम्य, ३९४ गुहः—मायासे अपने यथार्थ स्वरूपको छिपाये रखनेवाले ॥ ४९ ॥
789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 C
५४८ / * संक्षिप्त शिवपुराण *
करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।
व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः॥ ५०॥
३९५ करणम्—संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, ३९६ कारणम्—जगत्के उपादान और निमित्त कारण, ३९७ कर्ता—सबके रचयिता, ३९८ सर्वबन्धविमोचनः—सम्पूर्ण बन्धनोंसे छुड़ानेवाले, ३९९ व्यवसायः—निश्चयात्मक ज्ञानस्वरूप, ४०० व्यवस्थानः—सम्पूर्ण जगत्की व्यवस्था करनेवाले, ४०१ स्थानदः—ध्रुव आदि भक्तोंको अविचल स्थिति प्रदान कर देनेवाले, ४०२ जगदादिजः—हिरण्यगर्भरूपसे जगत्के आदिमें प्रकट होनेवाले॥ ५०॥
गुरुदो ललितोऽभेदो भावात्माऽऽत्मनि संस्थितः।
वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरासनविधिविराट्॥ ५१॥
४०३ गुरुदः—श्रेष्ठ वस्तु प्रदान करनेवाले अथवा जिज्ञासुओंको गुरुकी प्राप्ति करानेवाले, ४०४ ललितः—सुन्दर स्वरूपवाले, ४०५ अभेदः—भेदरहित, ४०६ भावात्माऽऽत्मनि संस्थितः—सत्स्वरूप आत्मामें प्रतिष्ठित, ४०७ वीरेश्वरः—वीरशिरोमणि, ४०८ वीरभद्रः—वीरभद्र नामक गणाध्यक्ष, ४०९ वीरासनविधिः—वीरासनसे बैठनेवाले, ४१० विराट्—अखिलब्रह्माण्डस्वरूप॥ ५१॥
वीरचूडामणिर्वेत्ता चिदानन्दो नदीधरः।
आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः॥ ५२॥
४११ वीरचूडामणिः—वीरोंमें श्रेष्ठ, ४१२ वेत्ता—विद्वान्, ४१३ चिदानन्दः—विज्ञानानन्दस्वरूप, ४१४ नदीधरः—मस्तकपर गंगाजीको धारण करनेवाले, ४१५ आज्ञाधारः—आज्ञाका पालन करनेवाले, ४१६ त्रिशूली—त्रिशूलधारी, ४१७ शिपिविष्टः—तेजोमयी किरणोंसे व्याप्त, ४१८ शिवालयः—भगवती शिवाके आश्रय॥ ५२॥
वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्बधिरः खगः।
अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः॥ ५३॥
४१९ वालखिल्यः—वालखिल्य ऋषिरूप, ४२० महाचापः—महान् धनुर्धर, ४२१ तिग्मांशुः—सूर्यरूप, ४२२ बधिरः—लौकिक विषयोंकी चर्चा न सुननेवाले, ४२३ खगः—आकाशचारी, ४२४ अभिरामः—परम सुन्दर, ४२५ सुशरणः—सबके लिये सुन्दर आश्रयरूप, ४२६ सुब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंके परम हितैषी, ४२७ सुधापतिः—अमृतकलशके रक्षक॥ ५३॥
मघवान्कौशिको गोमान्विरामः सर्वसाधनः।
ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्॥ ५४॥
४२८ मघवान् कौशिकः—कुशिकवंशीय इन्द्रस्वरूप, ४२९ गोमान्—प्रकाशकिरणोंसे युक्त, ४३० विरामः—समस्त प्राणियोंके लयके स्थान, ४३१ सर्वसाधनः—समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाले, ४३२ ललाटाक्षः—ललाटमें तीसरा नेत्र धारण करनेवाले, ४३३ विश्वदेहः—जगत्स्वरूप, ४३४ सारः—सारतत्त्वरूप, ४३५ संसारचक्रभृत्—संसारचक्रको धारण करनेवाले॥ ५४॥
अमोघदण्डो मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी।
परमार्थः परो मायी शम्बरो व्याघ्रलोचनः॥ ५५॥
४३६ अमोघदण्डः—जिनका दण्ड कभी व्यर्थ नहीं जाता है, ऐसे, ४३७ मध्यस्थः—उदासीन, ४३८ हिरण्यः—सुवर्ण अथवा तेजःस्वरूप, ४३९ ब्रह्मवर्चसी—ब्रह्मतेजसे सम्पन्न, ४४० परमार्थः—मोक्षरूप उत्कृष्ट अर्थकी प्राप्ति करानेवाले, ४४१ परो मायी—महामायावी, ४४२ शम्बरः—कल्याणप्रद,
789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 D
* कोटिरुद्रसंहिता * ५४९
४४३ व्याघ्रलोचनः—व्याघ्रके समान भयानक नेत्रोंवाले॥ ५५॥
रुचिर्विरञ्चिः स्वर्बन्धुर्वाचस्पतिरहर्पतिः।
रविर्विरोचनः स्कन्दः शास्ता वैवस्वतो यमः॥ ५६॥
४४४ रुचिः—दीप्तिरूप, ४४५ विरञ्चिः—ब्रह्मस्वरूप, ४४६ स्वर्बन्धुः—स्वर्लोकमें बन्धुके समान सुखद, ४४७ वाचस्पतिः—वाणीके अधिपति, ४४८ अहर्पतिः—दिनके स्वामी सूर्यरूप, ४४९ रविः—समस्त रसोंका शोषण करनेवाले, ४५० विरोचनः—विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ४५१ स्कन्दः—स्वामी कार्तिकेयरूप, ४५२ शास्ता वैवस्वतो यमः—सबपर शासन करनेवाले सूर्यकुमार यम॥ ५६॥
युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च सानुरागः परञ्जयः।
कैलासाधिपतिः कान्तः सविता रविलोचनः॥ ५७॥
४५३ युक्तिरुन्नतकीर्तिः—अष्टांगयोग-स्वरूप तथा ऊर्ध्वलोकमें फैली हुई कीर्तिसे युक्त, ४५४ सानुरागः—भक्तजनोंपर प्रेम रखनेवाले, ४५५ परञ्जयः—दूसरोंपर विजय पानेवाले, ४५६ कैलासाधिपतिः—कैलासके स्वामी, ४५७ कान्तः—कमनीय अथवा कान्तिमान्, ४५८ सविता—समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ४५९ रविलोचनः—सूर्यरूप नेत्रवाले॥ ५७॥
विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्त्तानिवारितः।
नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥ ५८॥
४६० विद्वत्तमः—विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, परम विद्वान्, ४६१ वीतभयः—सब प्रकारके भयसे रहित, ४६२ विश्वभर्त्ता—जगत्का भरण-पोषण करनेवाले, ४६३ अनिवारितः—जिन्हें कोई रोक नहीं सकता ऐसे, ४६४ नित्यः—सत्यस्वरूप, ४६५ नियतकल्याणः—सुनिश्चितरूपसे कल्याणकारी, ४६६ पुण्यश्रवणकीर्तनः—जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपके श्रवण तथा कीर्तन परम पावन हैं, ऐसे॥ ५८॥
दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः।
उत्तारणो दुष्कृतिहा विज्ञेयो दुस्सहोऽभवः॥ ५९॥
४६७ दूरश्रवाः—सर्वव्यापी होनेके कारण दूरकी बात भी सुन लेनेवाले, ४६८ विश्वसहः—भक्तजनोंके सब अपराधोंको कृपापूर्वक सह लेनेवाले, ४६९ ध्येयः—ध्यान करनेयोग्य, ४७० दुःस्वप्ननाशनः—चिन्तन करनेमात्रसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ४७१ उत्तारणः—संसारसागरसे पार उतारनेवाले, ४७२ दुष्कृतिहा—पापोंका नाश करनेवाले, ४७३ विज्ञेयः—जाननेके योग्य, ४७४ दुस्सहः—जिनके वेगको सहन करना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है, ऐसे, ४७५ अभवः—संसारबन्धनसे रहित अथवा अजन्मा॥ ५९॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटी त्रिदशाधिपः।
विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिराङ्गदः॥ ६०॥
४७६ अनादिः—जिनका कोई आदि नहीं है, ऐसे सबके कारणस्वरूप, ४७७ भूर्भुवो लक्ष्मीः—भूर्लोक और भुवर्लोककी शोभा, ४७८ किरीटी—मुकुटधारी, ४७९ त्रिदशाधिपः—देवताओंके स्वामी, ४८० विश्वगोप्ता—जगत्के रक्षक, ४८१ विश्वकर्ता—संसारकी सृष्टि करनेवाले, ४८२ सुवीरः—श्रेष्ठ वीर, ४८३ रुचिराङ्गदः—सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले॥ ६०॥
जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्धवः।
वसिष्ठः कश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः॥ ६१॥
४८४ जननः—प्राणिमात्रको जन्म देनेवाले, ४८५ जनजन्मादिः—जन्म लेने-
५५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
वालोंके जन्मके मूल कारण, ४८६ प्रीतिमान्— प्रसन्न, ४८७ नीतिमान्— सदा नीतिपरायण, ४८८ धवः— सबके स्वामी, ४८९ वसिष्ठः— मन और इन्द्रियोंको अत्यन्त वशमें रखनेवाले अथवा वसिष्ठ ऋषिरूप, ४९० कश्यपः— द्रष्टा अथवा कश्यप मुनिरूप, ४९१ भानुः— प्रकाशमान अथवा सूर्यरूप, ४९२ भीमः— दुष्टोंको भय देनेवाले, ४९३ भीमपराक्रमः— अतिशय भयदायक पराक्रमसे युक्त ॥ ६१ ॥
प्रणवः सत्पथाचारो महाकोशो महाधनः।
जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः॥ ६२॥
४९४ प्रणवः—ओंकारस्वरूप, ४९५ सत्पथाचारः—सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले, ४९६ महाकोशः—अन्नमयादि पाँचों कोशोंको अपने भीतर धारण करनेके कारण महाकोशरूप, ४९७ महाधनः— अपरिमित ऐश्वर्यवाले अथवा कुबेरको भी धन देनेके कारण महाधनवान्, ४९८ जन्माधिपः—जन्म (उत्पादन)-रूपी कार्यके अध्यक्ष ब्रह्मा, ४९९ महादेवः—सर्वोत्कृष्ट देवता, ५०० सकलागमपारगः—समस्त शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् ॥ ६२ ॥
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा विभुर्विश्वविभूषणः।
ऋषिर्ब्राह्मण ऐश्वर्यजन्ममृत्युजरातिगः ॥ ६३ ॥
५०१ तत्त्वम्—यथार्थ तत्त्वरूप, ५०२ तत्त्ववित्—यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ५०३ एकात्मा—अद्वितीय आत्मरूप, ५०४ विभुः—सर्वत्र व्यापक, ५०५ विश्वभूषणः— सम्पूर्ण जगत्को उत्तम गुणोंसे विभूषित करनेवाले, ५०६ ऋषिः— मन्त्रद्रष्टा, ५०७ ब्राह्मणः—ब्रह्मवेत्ता, ५०८ ऐश्वर्यजन्ममृत्युजरातिगः— ऐश्वर्य, जन्म, मृत्यु और जरासे अतीत ॥ ६३ ॥
पञ्चयज्ञसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः।
आत्मयोनिरनाद्यन्तो वत्सलो भक्तलोकधृक् ॥ ६४ ॥
५०९ पञ्चयज्ञसमुत्पत्तिः— पंच महायज्ञोंकी उत्पत्तिके हेतु, ५१० विश्वेशः— विश्वनाथ, ५११ विमलोदयः—निर्मल अभ्युदयकी प्राप्ति करानेवाले धर्मरूप, ५१२ आत्मयोनिः— स्वयम्भू, ५१३ अनाद्यन्तः— आदि-अन्तसे रहित, ५१४ वत्सलः—भक्तोंके प्रति वात्सल्य-स्नेहसे युक्त, ५१५ भक्तलोकधृक्—भक्तजनोंके आश्रय ॥ ६४ ॥
गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः।
शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा ॥ ६५ ॥
५१६ गायत्रीवल्लभः— गायत्रीमन्त्रके प्रेमी, ५१७ प्रांशुः—ऊँचे शरीरवाले, ५१८ विश्वावासः—सम्पूर्ण जगत्के आवासस्थान, ५१९ प्रभाकरः—सूर्यरूप, ५२० शिशुः— बालकरूप, ५२१ गिरिरतः—कैलास पर्वतपर रमण करनेवाले, ५२२ सम्राट्—देवेश्वरोंके भी ईश्वर, ५२३ सुषेणः सुरशत्रुहा— प्रमथगणोंकी सुन्दर सेनासे युक्त तथा देवशत्रुओंका संहार करनेवाले ॥ ६५ ॥
अमोघोऽरिष्टनेमिश्च कुमुदो विगतज्वरः।
स्वयंज्योतिस्तनुज्योतिरात्मज्योतिरजञ्चलः ॥ ६६ ॥
५२४ अमोघोऽरिष्टनेमिः—अमोघ संकल्पवाले महर्षि कश्यपरूप, ५२५ कुमुदः—भूतलको आह्लाद प्रदान करनेवाले चन्द्रमारूप, ५२६ विगतज्वरः— चिन्तारहित, ५२७ स्वयंज्योतिस्तनुज्योतिः— अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले सूक्ष्मज्योतिःस्वरूप, ५२८ आत्मज्योतिः— अपने स्वरूपभूत ज्ञानकी प्रभासे प्रकाशित, ५२९ अचञ्चलः—चंचलतासे रहित ॥ ६६ ॥
* कोटिरुद्रसंहिता * ५५१
पिङ्गलः कपिलश्मश्रुर्भालनेत्रस्त्रयीतनुः। ज्ञानस्कन्दो महानीतिर्विश्वोत्पत्तिरुपप्लवः॥ ६७॥ ५३० पिङ्गलः— पिंगलवर्णवाले, ५३१ कपिलश्मश्रुः—कपिल वर्णकी दाढ़ी-मूँछ रखनेवाले दुर्वासा मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ५३२ भालनेत्रः— ललाटमें तृतीय नेत्र धारण करनेवाले, ५३३ त्रयीतनुः—तीनों लोक या तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, ऐसे, ५३४ ज्ञानस्कन्दो महानीतिः—ज्ञानप्रद और श्रेष्ठ नीतिवाले, ५३५ विश्वोत्पत्तिः—जगत्के उत्पादक, ५३६ उपप्लवः—संहारकारी॥ ६७॥
भगो विवस्वानादित्यो योगपारो दिवस्पतिः। कल्याणगुणनामा च पापहा पुण्यदर्शनः॥ ६८॥ ५३७ भगो विवस्वानादित्यः—अदितिनन्दन भग एवं विवस्वान्, ५३८ योगपारः—योगविद्यामें पारंगत, ५३९ दिवस्पतिः—स्वर्गलोकके स्वामी, ५४० कल्याणगुणनामा—कल्याणकारी गुण और नामवाले, ५४१ पापहा—पापनाशक, ५४२ पुण्यदर्शनः—पुण्यजनक दर्शनवाले अथवा पुण्यसे ही जिनका दर्शन होता है, ऐसे॥ ६८॥
उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः। नक्षत्रमाली नाकेशः स्वाधिष्ठानपदाश्रयः॥ ६९॥ ५४३ उदारकीर्तिः—उत्तम कीर्तिवाले, ५४४ उद्योगी—उद्योगशील, ५४५ सद्योगी—श्रेष्ठ योगी, ५४६ सदसन्मयः—सदसत्स्वरूप, ५४७ नक्षत्रमाली—नक्षत्रोंकी मालासे अलंकृत आकाशरूप, ५४८ नाकेशः—स्वर्गके स्वामी, ५४९ स्वाधिष्ठानपदाश्रयः—स्वाधिष्ठान चक्रके आश्रय॥ ६९॥
पवित्रः पापहारी च मणिपूरो नभोगतिः। हृत्पुण्डरीकमासीनः शक्रः शान्तो वृषाकपिः॥ ७०॥
५५० पवित्रः पापहारी—नित्य शुद्ध एवं पापनाशक, ५५१ मणिपूरः—मणिपूर नामक चक्रस्वरूप, ५५२ नभोगतिः—आकाशचारी, ५५३ हृत्पुण्डरीकमासीनः—हृदयकमलमें स्थित, ५५४ शक्रः—इन्द्ररूप, ५५५ शान्तः—शान्त-स्वरूप, ५५६ वृषाकपिः—हरिहर॥ ७०॥
उष्णो गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः। अधर्मशत्रुरज्ञेयः पुरुहूतः पुरुश्रुतः॥ ७१॥ ५५७ उष्णः—हालाहल विषकी गर्मीसे उष्णतायुक्त, ५५८ गृहपतिः—समस्त ब्रह्माण्डरूपी गृहके स्वामी, ५५९ कृष्णः—सच्चिदानन्दस्वरूप, ५६० समर्थः—सामर्थ्यशाली, ५६१ अनर्थनाशनः—अनर्थका नाश करनेवाले, ५६२ अधर्मशत्रुः—अधर्मनाशक, ५६३ अज्ञेयः—बुद्धिकी पहुँचसे परे अथवा जाननेमें न आनेवाले, ५६४ पुरुहूतः पुरुश्रुतः—बहुत-से नामोंद्वारा पुकारे और सुने जानेवाले॥ ७१॥
ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः। जगद्धितैषी सुगतः कुमारः कुशलागमः॥ ७२॥ ५६५ ब्रह्मगर्भः—ब्रह्मा जिनके गर्भस्थ शिशुके समान हैं, ऐसे, ५६६ बृहद्गर्भः—विश्वब्रह्माण्ड प्रलयकालमें जिनके गर्भमें रहता है, ऐसे, ५६७ धर्मधेनुः—धर्मरूपी वृषभको उत्पन्न करनेके लिये धेनुस्वरूप, ५६८ धनागमः—धनकी प्राप्ति करानेवाले, ५६९ जगद्धितैषी—समस्त संसारका हित चाहनेवाले, ५७० सुगतः—उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न अथवा बुद्धस्वरूप, ५७१ कुमारः—कार्तिकेयरूप, ५७२ कुशलागमः—कल्याणदाता॥ ७२॥
हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतरतो ध्वनिः। अरागो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेश्वरः॥ ७३॥
५५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
५७३ हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्—सुवर्णके समान गौरवर्णवाले तथा तेजस्वी, ५७४ नानाभूतरतः—नाना प्रकारके भूतोंके साथ क्रीडा करनेवाले, ५७५ ध्वनिः—नादस्वरूप, ५७६ अरागः—आसक्तिशून्य, ५७७ नयनाध्यक्षः—नेत्रोंमें द्रष्टारूपसे विद्यमान, ५७८ विश्वामित्रः—सम्पूर्ण जगत्के प्रति मैत्री भावना रखनेवाले मुनिस्वरूप, ५७९ धनेश्वरः—धनके स्वामी कुबेर॥ ७३॥
ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा महाज्योतिरुत्तमः।
मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक्॥ ७४॥
५८० ब्रह्मज्योतिः—ज्योतिःस्वरूप ब्रह्म, ५८१ वसुधामा—सुवर्ण और रत्नोंके तेजसे प्रकाशित अथवा वसुधास्वरूप, ५८२ महाज्योतिरुत्तमः—सूर्य आदि ज्योतियोंके प्रकाशक सर्वोत्तम महाज्योतिःस्वरूप, ५८३ मातामहः—मातृकाओंके जन्मदाता होनेके कारण मातामह, ५८४ मातरिश्वा नभस्वान्—आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, ५८५ नागहारधृक्—सर्पमय हार धारण करनेवाले॥ ७४॥
पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः।
निरावरणनिर्वारो वैरणच्यो विष्टरश्रवाः॥ ७५॥
५८६ पुलस्त्यः—पुलस्त्य नामक मुनि, ५८७ पुलहः—पुलह नामक ऋषि, ५८८ अगस्त्यः—कुम्भजन्मा अगस्त्य ऋषि, ५८९ जातूकर्ण्यः—इसी नामसे प्रसिद्ध मुनि, ५९० पराशरः—शक्तिके पुत्र तथा व्यासजीके पिता मुनिवर पराशर, ५९१ निरावरणनिर्वारः—आवरणशून्य तथा अवरोधरहित, ५९२ वैरणच्यः—ब्रह्माजीके पुत्र नीललोहित रुद्र, ५९३ विष्टरश्रवाः—विस्तृत यशवाले विष्णुस्वरूप॥ ७५॥
आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिर्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः।
लोकवीराग्रणीर्वीरश्चण्डः सत्यपराक्रमः॥ ७६॥
५९४ आत्मभूः—स्वयम्भू ब्रह्मा, ५९५ अनिरुद्धः—अकुण्ठित गतिवाले, ५९६ अत्रिः—अत्रि नामक ऋषि अथवा त्रिगुणातीत, ५९७ ज्ञानमूर्तिः—ज्ञानस्वरूप, ५९८ महायशाः—महायशस्वी, ५९९ लोकवीराग्रणीः—विश्वविख्यात वीरोंमें अग्रगण्य, ६०० वीरः—शूरवीर, ६०१ चण्डः—प्रलयके समय अत्यन्त क्रोध करनेवाले, ६०२ सत्यपराक्रमः—सच्चे पराक्रमी॥ ७६॥
व्यालाकल्पो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः।
अलंकरिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोन्नतः॥ ७७॥
६०३ व्यालाकल्पः—सर्पोंके आभूषणसे शृङ्गार करनेवाले, ६०४ महाकल्पः—महाकल्पसंज्ञक कालस्वरूपवाले, ६०५ कल्पवृक्षः—शरणागतोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान उदार, ६०६ कलाधरः—चन्द्रकलाधारी, ६०७ अलंकरिष्णुः—अलंकार धारण करने या करानेवाले, ६०८ अचलः—विचलित न होनेवाले, ६०९ रोचिष्णुः—प्रकाशमान, ६१० विक्रमोन्नतः—पराक्रममें बढ़े-चढ़े॥ ७७॥
आयुः शब्दपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः।
असंसृष्टोऽतिथिः शक्रप्रमाथी पादपासनः॥ ७८॥
६११ आयुः शब्दपतिः—आयु तथा वाणीके स्वामी, ६१२ वेगी प्लवनः—वेगशाली तथा कूदने या तैरनेवाले, ६१३ शिखिसारथिः—अग्निरूप सहायकवाले, ६१४ असंसृष्टः—निर्लेप, ६१५ अतिथिः—प्रेमी भक्तोंके घरपर अतिथिकी भाँति उपस्थित हो उनका सत्कार ग्रहण
* कोटिरुद्रसंहिता * ५५३
करनेवाले, ६१६ शक्रप्रमाथी—इन्द्रका मान मर्दन करनेवाले, ६१७ पादपासनः— वृक्षोंपर या वृक्षोंके नीचे आसन लगानेवाले ॥ ७८ ॥
वसुश्रवा हव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः।
जप्यो जरादिशमनो लोहितात्मा तनूनपात् ॥ ७९ ॥
६१८ वसुश्रवाः—यशरूपी धनसे सम्पन्न, ६१९ हव्यवाहः—अग्निस्वरूप, ६२० प्रतप्तः—सूर्यरूपसे प्रचण्ड ताप देनेवाले, ६२१ विश्वभोजनः—प्रलयकालमें विश्व-ब्रह्माण्डको अपना ग्रास बना लेनेवाले, ६२२ जप्यः—जपनेयोग्य नामवाले, ६२३ जरादिशमनः—बुढ़ापा आदि दोषोंका निवारण करनेवाले, ६२४ लोहितात्मा तनूनपात्—लोहितवर्णवाले अग्निरूप ॥ ७९ ॥
बृहदश्वो नभोयोनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा।
निदाघस्तपनो मेघः स्वक्षः परपुरञ्जयः ॥ ८० ॥
६२५ बृहदश्वः—विशाल अश्ववाले, ६२६ नभोयोनिः—आकाशकी उत्पत्तिके स्थान, ६२७ सुप्रतीकः—सुन्दर शरीरवाले, ६२८ तमिस्रहा—अज्ञानान्धकारनाशक, ६२९ निदाघस्तपनः—तपनेवाले ग्रीष्मरूप, ६३० मेघः—बादलोंसे उपलक्षित वर्षारूप, ६३१ स्वक्षः—सुन्दर नेत्रोंवाले, ६३२ परपुरञ्जयः—त्रिपुररूप शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले ॥ ८० ॥
सुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशिरात्मकः।
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ॥ ८१ ॥
६३३ सुखानिलः—सुखदायक वायुको प्रकट करनेवाले शरत्कालरूप, ६३४ सुनिष्पन्नः—जिसमें अन्नका सुन्दररूपसे परिपाक होता है, वह हेमन्तकालरूप, ६३५ सुरभिः शिशिरात्मकः—सुगन्धित मलयाानिलसे युक्त शिशिर-ऋतुरूप, ६३६ वसन्तो माधवः—चैत्र-वैशाख—इन दो मासोंसे युक्त वसन्तरूप, ६३७ ग्रीष्मः— ग्रीष्म-ऋतुरूप, ६३८ नभस्यः—भाद्रपदमासरूप, ६३९ बीजवाहनः—धान आदिके बीजोंकी प्राप्ति करानेवाला शरत्काल ॥ ८१ ॥
अङ्गिरा गुरुरात्रेयो विमलो विश्ववाहनः।
पावनः सुमतिर्विद्वांस्त्रैविद्यो वरवाहनः ॥ ८२ ॥
६४० अङ्गिरा गुरुः—अंगिरा नामक ऋषि तथा उनके पुत्र देवगुरु बृहस्पति, ६४१ आत्रेयः—अत्रिकुमार दुर्वासा, ६४२ विमलः—निर्मल, ६४३ विश्ववाहनः— सम्पूर्ण जगत्का निर्वाह करानेवाले, ६४४ पावनः—पवित्र करनेवाले, ६४५ सुमतिर्विद्वान्—उत्तम बुद्धिवाले विद्वान्, ६४६ त्रैविद्यः—तीनों वेदोंके विद्वान् अथवा तीनों वेदोंके द्वारा प्रतिपादित, ६४७ वरवाहनः—वृषभरूप श्रेष्ठ वाहनवाले ॥ ८२ ॥
मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः।
जमदग्निर्बलनिधिर्विगालो विश्वगालवः ॥ ८३ ॥
६४८ मनोबुद्धिरहंकारः—मन, बुद्धि और अहंकारस्वरूप, ६४९ क्षेत्रज्ञः—आत्मा, ६५० क्षेत्रपालकः—शरीररूपी क्षेत्रका पालन करनेवाले परमात्मा, ६५१ जमदग्निः—जमदग्नि नामक ऋषिरूप, ६५२ बलनिधिः—अनन्त बलके सागर, ६५३ विगालः—अपनी जटासे गङ्गाजीके जलको टपकानेवाले, ६५४ विश्वगालवः—विश्वविख्यात गालव मुनि अथवा प्रलयकालमें कालाग्निस্বরূপसे जगत्को निगल जानेवाले ॥ ८३ ॥
अघोरोऽनुत्तरो यज्ञः श्रेष्ठो निःश्रेयसप्रदः।
शैलो गगनकुन्दाभो दानवारिररिंदमः ॥ ८४ ॥
६५५ अघोरः—सौम्यरूपवाले, ६५६ अनुत्तरः—सर्वश्रेष्ठ, ६५७ यज्ञः श्रेष्ठः— श्रेष्ठ यज्ञरूप, ६५८ निःश्रेयसप्रदः—कल्याणदाता,
५५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
६५९ शैलः—शिलामय लिंगरूप, ६६० गगनकुन्दाभः — आकाशकुन्द — चन्द्रमाके समान गौर कान्तिवाले, ६६१ दानवारिः— दानव-शत्रु, ६६२ अरिंदमः—शत्रुओंका दमन करनेवाले॥ ८४॥
रजनीजनकश्चारुर्निःशल्यो लोकशल्यधृक्।
चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः ॥ ८५ ॥
६६३ रजनीजनकश्चारुः—सुन्दर निशाकर-रूप, ६६४ निःशल्यः—निष्कण्टक, ६६५ लोकशल्यधृक्—शरणागतजनोंके शोक-शल्यको निकालकर स्वयं धारण करनेवाले, ६६६ चतुर्वेदः—चारों वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य, ६६७ चतुर्भावः—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाले, ६६८ चतुरश्चतुरप्रियः—चतुर एवं चतुर पुरुषोंके प्रिय॥ ८५॥
आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवशिवालयः।
बहुरूपो महारूपः सर्वरूपश्चराचरः ॥ ८६ ॥
६६९ आम्नायः—वेदस्वरूप, ६७० समाम्नायः—अक्षरसमाम्नाय—शिवसूत्ररूप, ६७१ तीर्थदेवशिवालयः—तीर्थोंके देवता और शिवालयरूप, ६७२ बहुरूपः—अनेक रूपवाले, ६७३ महारूपः—विराट्-रूपधारी, ६७४ सर्वरूपश्चराचरः— चर और अचर सम्पूर्ण रूपवाले॥ ८६॥
न्यायनिर्मायको न्यायी न्यायगम्यो निरञ्जनः।
सहस्रमूर्द्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः ॥ ८७ ॥
६७५ न्यायनिर्मायको न्यायी—न्यायकर्ता तथा न्यायशील, ६७६ न्यायगम्यः—न्याययुक्त आचरणसे प्राप्त होनेयोग्य, ६७७ निरञ्जनः—निर्मल, ६७८ सहस्रमूर्द्धा—सहस्रों सिरवाले, ६७९ देवेन्द्रः—देवताओंके स्वामी, ६८० सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः—विपक्षी योद्धाओंके सम्पूर्ण शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले॥ ८७॥
मुण्डो विरूपो विक्रान्तो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः।
पिङ्गलाक्षो जनाध्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः॥ ८८॥
६८१ मुण्डः—मुँड़े हुए सिरवाले संन्यासी, ६८२ विरूपः—विविध रूपवाले, ६८३ विक्रान्तः—विक्रमशील, ६८४ दण्डी—दण्डधारी, ६८५ दान्तः—मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, ६८६ गुणोत्तमः—गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ, ६८७ पिङ्गलाक्षः—पिंगल नेत्रवाले, ६८८ जनाध्यक्षः—जीवमात्रके साक्षी, ६८९ नीलग्रीवः—नीलकण्ठ, ६९० निरामयः—नीरोग॥ ८८॥
सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकधृक्।
पद्मासनः परं ज्योतिः पारम्पर्य्यफलप्रदः॥ ८९ ॥
६९१ सहस्रबाहुः—सहस्रों भुजाओंसे युक्त, ६९२ सर्वेशः—सबके स्वामी, ६९३ शरण्यः—शरणागत हितैषी, ६९४ सर्वलोकधृक्—सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेवाले, ६९५ पद्मासनः—कमलके आसनपर विराजमान, ६९६ परं ज्योतिः—परम प्रकाशस्वरूप, ६९७ पारम्पर्य्यफलप्रदः—परम्परागत फलकी प्राप्ति करानेवाले॥ ८९॥
पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः।
परावरज्ञो वरदो वरेण्यश्च महास्वनः॥ ९० ॥
६९८ पद्मगर्भः—अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले विष्णुरूप, ६९९ महागर्भः—विराट् ब्रह्माण्डको गर्भमें धारण करनेके कारण महान् गर्भवाले, ७०० विश्वगर्भः—सम्पूर्ण जगत्को अपने उदरमें धारण करनेवाले, ७०१ विचक्षणः—चतुर, ७०२ परावरज्ञः—कारण और कार्यके ज्ञाता, ७०३ वरदः—अभीष्ट वर देनेवाले, ७०४ वरेण्यः—वरणीय अथवा श्रेष्ठ, ७०५ महास्वनः—डमरूका गम्भीर नाद करनेवाले॥ ९०॥
* कोटिरुद्रसंहिता * ५५५
देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।
देवासुरमहामित्रो देवासुरमहेश्वरः॥ ९१॥
७०६ देवासुरगुरुर्देवः—देवताओं तथा असुरोंके गुरुदेव एवं आराध्य, ७०७ देवासुरनमस्कृतः—देवताओं तथा असुरोंसे वन्दित, ७०८ देवासुरमहामित्रः—देवता तथा असुर दोनोंके बड़े मित्र, ७०९ देवासुरमहेश्वरः—देवताओं और असुरोंके महान् ईश्वर॥ ९१॥
देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहाश्रयः।
देवदेवमयोऽचिन्त्यो देवदेवात्मसम्भवः॥ ९२॥
७१० देवासुरेश्वरः—देवताओं और असुरोंके शासक, ७११ दिव्यः—अलौकिक स्वरूपवाले, ७१२ देवासुरमहाश्रयः—देवताओं और असुरोंके महान् आश्रय, ७१३ देवदेवमयः—देवताओंके लिये भी देवतारूप, ७१४ अचिन्त्यः—चित्तकी सीमासे परे विद्यमान, ७१५ देवदेवात्मसम्भवः—देवाधिदेव ब्रह्माजीसे रुद्ररूपमें उत्पन्न॥ ९२॥
सद्योनिरसुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः।
विबुधाग्रचरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः॥ ९३॥
७१६ सद्योनिः—सत्पदार्थोंकी उत्पत्तिके हेतु, ७१७ असुरव्याघ्रः—असुरोंका विनाश करनेके लिये व्याघ्ररूप, ७१८ देवसिंहः—देवताओंमें श्रेष्ठ, ७१९ दिवाकरः—सूर्यरूप, ७२० विबुधाग्रचरश्रेष्ठः—देवताओंके नायकोंमें सर्वश्रेष्ठ, ७२१ सर्वदेवोत्तमोत्तमः—सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंके भी शिरोमणि॥ ९३॥
शिवज्ञानरतः श्रीमाच्छिखिश्रीपर्वतप्रियः।
वज्रहस्तः सिद्धखड्गो नरसिंहनिपातनः॥ ९४॥
७२२ शिवज्ञानरतः—कल्याणमय शिवतत्त्वके विचारमें तत्पर, ७२३ श्रीमान्—अणिमा आदि विभूतियोंसे सम्पन्न, ७२४ शिखिश्रीपर्वतप्रियः—कुमार कार्तिकेयके निवासभूत श्रीशैल नामक पर्वतसे प्रेम करनेवाले, ७२५ वज्रहस्तः—वज्रधारी इन्द्ररूप, ७२६ सिद्धखड्गः—शत्रुओंको मार गिरानेमें जिनकी तलवार कभी असफल नहीं होती, ऐसे, ७२७ नरसिंहनिपातनः—शरभरूपसे नृसिंहको धराशायी करनेवाले॥ ९४॥
ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः।
नन्दी नन्दीश्वरोऽनन्तो नग्नव्रतधरः शुचिः॥ ९५॥
७२८ ब्रह्मचारी—भगवती उमाके प्रेमकी परीक्षा लेनेके लिये ब्रह्मचारीरूपसे प्रकट, ७२९ लोकचारी—समस्त लोकोंमें विचरनेवाले, ७३० धर्मचारी—धर्मका आचरण करनेवाले, ७३१ धनाधिपः—धनके अधिपति कुबेर, ७३२ नन्दी—नन्दी नामक गण, ७३३ नन्दीश्वरः—इसी नामसे प्रसिद्ध वृषभ, ७३४ अनन्तः—अन्तरहित, ७३५ नग्नव्रतधरः—दिगम्बर रहनेका व्रत धारण करनेवाले, ७३६ शुचिः—नित्यशुद्ध॥ ९५॥
लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः।
स्वधर्मा स्वर्गतः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः॥ ९६॥
७३७ लिङ्गाध्यक्षः—लिंगदेहके द्रष्टा, ७३८ सुराध्यक्षः—देवताओंके अधिपति, ७३९ योगाध्यक्षः—योगेश्वर, ७४० युगावहः—युगके निर्वाहक, ७४१ स्वधर्मा—आत्मविचाररूप धर्ममें स्थित अथवा स्वधर्मपरायण, ७४२ स्वर्गतः—स्वर्गलोकमें स्थित, ७४३ स्वर्गस्वरः—स्वर्गलोकमें जिनके यशका गान किया जाता है, ऐसे, ७४४ स्वरमयस्वनः—सात प्रकारके स्वरोंसे युक्त ध्वनिवाले॥ ९६॥
बाणाध्यक्षो बीजकर्ता धर्मकृद्धर्मसम्भवः।
दम्भोऽलोभोऽर्थविच्छम्भुः सर्वभूतमहेश्वरः॥ ९७॥
७४५ बाणाध्यक्षः—बाणासुरके स्वामी अथवा बाणलिंग नर्मदेश्वरमें अधिदेवतारूपसे स्थित, ७४६ बीजकर्ता—बीजके उत्पादक,
५५६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
७४७ धर्मकृद्धर्मसम्भवः—धर्मके पालक और उत्पादक, ७४८ दम्भः—मायामयरूपधारी, ७४९ अलोभः—लोभरहित, ७५० अर्थविच्छम्भुः—सबके प्रयोजनको जाननेवाले कल्याणनिकेतन शिव, ७५१ सर्वभूतमहेश्वरः—सम्पूर्ण प्राणियोंके परमेश्वर॥ ९७॥
श्मशाननिलयस्त्र्यक्षः सेतुरप्रतिमाकृतिः।
लोकोत्तरस्फुटालोकस्त्र्यम्बको नागभूषणः॥ ९८॥
७५२ श्मशाननिलयः—श्मशानवासी, ७५३ त्र्यक्षः—त्रिनेत्रधारी, ७५४ सेतुः—धर्ममर्यादाके पालक, ७५५ अप्रतिमाकृतिः—अनुपम रूपवाले, ७५६ लोकोत्तरस्फुटालोकः—अलौकिक एवं सुस्पष्ट प्रकाशसे युक्त, ७५७ त्र्यम्बकः—त्रिनेत्रधारी अथवा त्र्यम्बक नामक ज्योतिर्लिंग, ७५८ नागभूषणः—नागहारसे विभूषित॥ ९८॥
अन्धकारिर्मखद्वेषी विष्णुकन्धरपातनः।
हीनदोषोऽक्षयगुणो दक्षारिः पूषदन्तभित्॥ ९९॥
७५९ अन्धकारिः—अन्धकासुरका वध करनेवाले, ७६० मखद्वेषी—दक्षके यज्ञका विध्वंस करनेवाले, ७६१ विष्णुकन्धरपातनः—यज्ञमय विष्णुका गला काटनेवाले, ७६२ हीनदोषः—दोषरहित, ७६३ अक्षयगुणः—अविनाशी गुणोंसे सम्पन्न, ७६४ दक्षारिः—दक्षद्रोही, ७६५ पूषदन्तभित्—पूषा देवताके दाँत तोड़नेवाले॥ ९९॥
धूर्जटिः खण्डपरशुः सकलो निष्कलोऽनघः।
अकालः सकलाधारः पाण्डुराभो मृडो नटः॥ १००॥
७६६ धूर्जटिः—जटाके भारसे विभूषित, ७६७ खण्डपरशुः—खण्डित परशुवाले, ७६८ सकलो निष्कलः—साकार एवं निराकार परमात्मा, ७६९ अनघः—पापके स्पर्शसे शून्य, ७७० अकालः—कालके प्रभावसे रहित, ७७१ सकलाधारः—सबके आधार, ७७२ पाण्डुराभः—श्वेत कान्तिवाले, ७७३ मृडो नटः—सुखदायक एवं ताण्डवनृत्यकारी॥ १००॥
पूर्णः पूरयिता पुण्यः सुकुमारः सुलोचनः।
सामगेयप्रियोऽक्रूरः पुण्यकीर्तिरनामयः॥ १०१॥
७७४ पूर्णः—सर्वव्यापी परब्रह्म परमात्मा, ७७५ पूरयिता—भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेवाले, ७७६ पुण्यः—परम पवित्र, ७७७ सुकुमारः—सुन्दर कुमार हैं जिनके, ऐसे, ७७८ सुलोचनः—सुन्दर नेत्रवाले, ७७९ सामगेयप्रियः—सामगानके प्रेमी, ७८० अक्रूरः—क्रूरतारहित, ७८१ पुण्यकीर्तिः—पवित्र कीर्तिवाले, ७८२ अनामयः—रोग-शोकसे रहित॥ १०१॥
मनोजवस्तीर्थकरो जटिलो जीवितेश्वरः।
जीवितान्तकरो नित्यो वसुरेता वसुप्रदः॥ १०२॥
७८३ मनोजवः—मनके समान वेगशाली, ७८४ तीर्थकरः—तीर्थोंके निर्माता, ७८५ जटिलः—जटाधारी, ७८६ जीवितेश्वरः—सबके प्राणेश्वर, ७८७ जीवितान्तकरः—प्रलयकालमें सबके जीवनका अन्त करनेवाले, ७८८ नित्यः—सनातन, ७८९ वसुरेताः—सुवर्णमय वीर्यवाले, ७९० वसुप्रदः—धनदाता॥ १०२॥
सद्गतिः सत्कृतिः सिद्धिः सज्जातिः खलकण्टकः।
कलाधरो महाकालभूतः सत्यपरायणः॥ १०३॥
७९१ सद्गतिः—सत्पुरुषोंके आश्रय, ७९२ सत्कृतिः—शुभ कर्म करनेवाले, ७९३ सिद्धिः—सिद्धिस্বরূপ, ७९४ सज्जातिः—सत्पुरुषोंके जन्मदाता, ७९५ खलकण्टकः—दुष्टोंके लिये कण्टकरूप, ७९६ कलाधरः—कलाधारी, ७९७ महाकालभूतः—महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूप अथवा