शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० * संक्षिप्त शिवपुराण *
वालोंके जन्मके मूल कारण, ४८६ प्रीतिमान्— प्रसन्न, ४८७ नीतिमान्— सदा नीतिपरायण, ४८८ धवः— सबके स्वामी, ४८९ वसिष्ठः— मन और इन्द्रियोंको अत्यन्त वशमें रखनेवाले अथवा वसिष्ठ ऋषिरूप, ४९० कश्यपः— द्रष्टा अथवा कश्यप मुनिरूप, ४९१ भानुः— प्रकाशमान अथवा सूर्यरूप, ४९२ भीमः— दुष्टोंको भय देनेवाले, ४९३ भीमपराक्रमः— अतिशय भयदायक पराक्रमसे युक्त ॥ ६१ ॥
प्रणवः सत्पथाचारो महाकोशो महाधनः।
जन्माधिपो महादेवः सकलागमपारगः॥ ६२॥
४९४ प्रणवः—ओंकारस्वरूप, ४९५ सत्पथाचारः—सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले, ४९६ महाकोशः—अन्नमयादि पाँचों कोशोंको अपने भीतर धारण करनेके कारण महाकोशरूप, ४९७ महाधनः— अपरिमित ऐश्वर्यवाले अथवा कुबेरको भी धन देनेके कारण महाधनवान्, ४९८ जन्माधिपः—जन्म (उत्पादन)-रूपी कार्यके अध्यक्ष ब्रह्मा, ४९९ महादेवः—सर्वोत्कृष्ट देवता, ५०० सकलागमपारगः—समस्त शास्त्रोंके पारंगत विद्वान् ॥ ६२ ॥
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा विभुर्विश्वविभूषणः।
ऋषिर्ब्राह्मण ऐश्वर्यजन्ममृत्युजरातिगः ॥ ६३ ॥
५०१ तत्त्वम्—यथार्थ तत्त्वरूप, ५०२ तत्त्ववित्—यथार्थ तत्त्वको पूर्णतया जाननेवाले, ५०३ एकात्मा—अद्वितीय आत्मरूप, ५०४ विभुः—सर्वत्र व्यापक, ५०५ विश्वभूषणः— सम्पूर्ण जगत्को उत्तम गुणोंसे विभूषित करनेवाले, ५०६ ऋषिः— मन्त्रद्रष्टा, ५०७ ब्राह्मणः—ब्रह्मवेत्ता, ५०८ ऐश्वर्यजन्ममृत्युजरातिगः— ऐश्वर्य, जन्म, मृत्यु और जरासे अतीत ॥ ६३ ॥
पञ्चयज्ञसमुत्पत्तिर्विश्वेशो विमलोदयः।
आत्मयोनिरनाद्यन्तो वत्सलो भक्तलोकधृक् ॥ ६४ ॥
५०९ पञ्चयज्ञसमुत्पत्तिः— पंच महायज्ञोंकी उत्पत्तिके हेतु, ५१० विश्वेशः— विश्वनाथ, ५११ विमलोदयः—निर्मल अभ्युदयकी प्राप्ति करानेवाले धर्मरूप, ५१२ आत्मयोनिः— स्वयम्भू, ५१३ अनाद्यन्तः— आदि-अन्तसे रहित, ५१४ वत्सलः—भक्तोंके प्रति वात्सल्य-स्नेहसे युक्त, ५१५ भक्तलोकधृक्—भक्तजनोंके आश्रय ॥ ६४ ॥
गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्विश्वावासः प्रभाकरः।
शिशुर्गिरिरतः सम्राट् सुषेणः सुरशत्रुहा ॥ ६५ ॥
५१६ गायत्रीवल्लभः— गायत्रीमन्त्रके प्रेमी, ५१७ प्रांशुः—ऊँचे शरीरवाले, ५१८ विश्वावासः—सम्पूर्ण जगत्के आवासस्थान, ५१९ प्रभाकरः—सूर्यरूप, ५२० शिशुः— बालकरूप, ५२१ गिरिरतः—कैलास पर्वतपर रमण करनेवाले, ५२२ सम्राट्—देवेश्वरोंके भी ईश्वर, ५२३ सुषेणः सुरशत्रुहा— प्रमथगणोंकी सुन्दर सेनासे युक्त तथा देवशत्रुओंका संहार करनेवाले ॥ ६५ ॥
अमोघोऽरिष्टनेमिश्च कुमुदो विगतज्वरः।
स्वयंज्योतिस्तनुज्योतिरात्मज्योतिरजञ्चलः ॥ ६६ ॥
५२४ अमोघोऽरिष्टनेमिः—अमोघ संकल्पवाले महर्षि कश्यपरूप, ५२५ कुमुदः—भूतलको आह्लाद प्रदान करनेवाले चन्द्रमारूप, ५२६ विगतज्वरः— चिन्तारहित, ५२७ स्वयंज्योतिस्तनुज्योतिः— अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाले सूक्ष्मज्योतिःस्वरूप, ५२८ आत्मज्योतिः— अपने स्वरूपभूत ज्ञानकी प्रभासे प्रकाशित, ५२९ अचञ्चलः—चंचलतासे रहित ॥ ६६ ॥