शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५४९
४४३ व्याघ्रलोचनः—व्याघ्रके समान भयानक नेत्रोंवाले॥ ५५॥
रुचिर्विरञ्चिः स्वर्बन्धुर्वाचस्पतिरहर्पतिः।
रविर्विरोचनः स्कन्दः शास्ता वैवस्वतो यमः॥ ५६॥
४४४ रुचिः—दीप्तिरूप, ४४५ विरञ्चिः—ब्रह्मस्वरूप, ४४६ स्वर्बन्धुः—स्वर्लोकमें बन्धुके समान सुखद, ४४७ वाचस्पतिः—वाणीके अधिपति, ४४८ अहर्पतिः—दिनके स्वामी सूर्यरूप, ४४९ रविः—समस्त रसोंका शोषण करनेवाले, ४५० विरोचनः—विविध प्रकारसे प्रकाश फैलानेवाले, ४५१ स्कन्दः—स्वामी कार्तिकेयरूप, ४५२ शास्ता वैवस्वतो यमः—सबपर शासन करनेवाले सूर्यकुमार यम॥ ५६॥
युक्तिरुन्नतकीर्तिश्च सानुरागः परञ्जयः।
कैलासाधिपतिः कान्तः सविता रविलोचनः॥ ५७॥
४५३ युक्तिरुन्नतकीर्तिः—अष्टांगयोग-स्वरूप तथा ऊर्ध्वलोकमें फैली हुई कीर्तिसे युक्त, ४५४ सानुरागः—भक्तजनोंपर प्रेम रखनेवाले, ४५५ परञ्जयः—दूसरोंपर विजय पानेवाले, ४५६ कैलासाधिपतिः—कैलासके स्वामी, ४५७ कान्तः—कमनीय अथवा कान्तिमान्, ४५८ सविता—समस्त जगत्को उत्पन्न करनेवाले, ४५९ रविलोचनः—सूर्यरूप नेत्रवाले॥ ५७॥
विद्वत्तमो वीतभयो विश्वभर्त्तानिवारितः।
नित्यो नियतकल्याणः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥ ५८॥
४६० विद्वत्तमः—विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, परम विद्वान्, ४६१ वीतभयः—सब प्रकारके भयसे रहित, ४६२ विश्वभर्त्ता—जगत्का भरण-पोषण करनेवाले, ४६३ अनिवारितः—जिन्हें कोई रोक नहीं सकता ऐसे, ४६४ नित्यः—सत्यस्वरूप, ४६५ नियतकल्याणः—सुनिश्चितरूपसे कल्याणकारी, ४६६ पुण्यश्रवणकीर्तनः—जिनके नाम, गुण, महिमा और स्वरूपके श्रवण तथा कीर्तन परम पावन हैं, ऐसे॥ ५८॥
दूरश्रवा विश्वसहो ध्येयो दुःस्वप्ननाशनः।
उत्तारणो दुष्कृतिहा विज्ञेयो दुस्सहोऽभवः॥ ५९॥
४६७ दूरश्रवाः—सर्वव्यापी होनेके कारण दूरकी बात भी सुन लेनेवाले, ४६८ विश्वसहः—भक्तजनोंके सब अपराधोंको कृपापूर्वक सह लेनेवाले, ४६९ ध्येयः—ध्यान करनेयोग्य, ४७० दुःस्वप्ननाशनः—चिन्तन करनेमात्रसे बुरे स्वप्नोंका नाश करनेवाले, ४७१ उत्तारणः—संसारसागरसे पार उतारनेवाले, ४७२ दुष्कृतिहा—पापोंका नाश करनेवाले, ४७३ विज्ञेयः—जाननेके योग्य, ४७४ दुस्सहः—जिनके वेगको सहन करना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है, ऐसे, ४७५ अभवः—संसारबन्धनसे रहित अथवा अजन्मा॥ ५९॥
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः किरीटी त्रिदशाधिपः।
विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिराङ्गदः॥ ६०॥
४७६ अनादिः—जिनका कोई आदि नहीं है, ऐसे सबके कारणस्वरूप, ४७७ भूर्भुवो लक्ष्मीः—भूर्लोक और भुवर्लोककी शोभा, ४७८ किरीटी—मुकुटधारी, ४७९ त्रिदशाधिपः—देवताओंके स्वामी, ४८० विश्वगोप्ता—जगत्के रक्षक, ४८१ विश्वकर्ता—संसारकी सृष्टि करनेवाले, ४८२ सुवीरः—श्रेष्ठ वीर, ४८३ रुचिराङ्गदः—सुन्दर बाजूबंद धारण करनेवाले॥ ६०॥
जननो जनजन्मादिः प्रीतिमान्नीतिमान्धवः।
वसिष्ठः कश्यपो भानुर्भीमो भीमपराक्रमः॥ ६१॥
४८४ जननः—प्राणिमात्रको जन्म देनेवाले, ४८५ जनजन्मादिः—जन्म लेने-