भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४८ / * संक्षिप्त शिवपुराण *

करणं कारणं कर्ता सर्वबन्धविमोचनः।
व्यवसायो व्यवस्थानः स्थानदो जगदादिजः॥ ५०॥
३९५ करणम्—संसारकी उत्पत्तिके सबसे बड़े साधन, ३९६ कारणम्—जगत्के उपादान और निमित्त कारण, ३९७ कर्ता—सबके रचयिता, ३९८ सर्वबन्धविमोचनः—सम्पूर्ण बन्धनोंसे छुड़ानेवाले, ३९९ व्यवसायः—निश्चयात्मक ज्ञानस्वरूप, ४०० व्यवस्थानः—सम्पूर्ण जगत्की व्यवस्था करनेवाले, ४०१ स्थानदः—ध्रुव आदि भक्तोंको अविचल स्थिति प्रदान कर देनेवाले, ४०२ जगदादिजः—हिरण्यगर्भरूपसे जगत्के आदिमें प्रकट होनेवाले॥ ५०॥

गुरुदो ललितोऽभेदो भावात्माऽऽत्मनि संस्थितः।
वीरेश्वरो वीरभद्रो वीरासनविधिविराट्॥ ५१॥
४०३ गुरुदः—श्रेष्ठ वस्तु प्रदान करनेवाले अथवा जिज्ञासुओंको गुरुकी प्राप्ति करानेवाले, ४०४ ललितः—सुन्दर स्वरूपवाले, ४०५ अभेदः—भेदरहित, ४०६ भावात्माऽऽत्मनि संस्थितः—सत्स्वरूप आत्मामें प्रतिष्ठित, ४०७ वीरेश्वरः—वीरशिरोमणि, ४०८ वीरभद्रः—वीरभद्र नामक गणाध्यक्ष, ४०९ वीरासनविधिः—वीरासनसे बैठनेवाले, ४१० विराट्—अखिलब्रह्माण्डस्वरूप॥ ५१॥

वीरचूडामणिर्वेत्ता चिदानन्दो नदीधरः।
आज्ञाधारस्त्रिशूली च शिपिविष्टः शिवालयः॥ ५२॥
४११ वीरचूडामणिः—वीरोंमें श्रेष्ठ, ४१२ वेत्ता—विद्वान्, ४१३ चिदानन्दः—विज्ञानानन्दस्वरूप, ४१४ नदीधरः—मस्तकपर गंगाजीको धारण करनेवाले, ४१५ आज्ञाधारः—आज्ञाका पालन करनेवाले, ४१६ त्रिशूली—त्रिशूलधारी, ४१७ शिपिविष्टः—तेजोमयी किरणोंसे व्याप्त, ४१८ शिवालयः—भगवती शिवाके आश्रय॥ ५२॥

वालखिल्यो महाचापस्तिग्मांशुर्बधिरः खगः।
अभिरामः सुशरणः सुब्रह्मण्यः सुधापतिः॥ ५३॥
४१९ वालखिल्यः—वालखिल्य ऋषिरूप, ४२० महाचापः—महान् धनुर्धर, ४२१ तिग्मांशुः—सूर्यरूप, ४२२ बधिरः—लौकिक विषयोंकी चर्चा न सुननेवाले, ४२३ खगः—आकाशचारी, ४२४ अभिरामः—परम सुन्दर, ४२५ सुशरणः—सबके लिये सुन्दर आश्रयरूप, ४२६ सुब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंके परम हितैषी, ४२७ सुधापतिः—अमृतकलशके रक्षक॥ ५३॥

मघवान्कौशिको गोमान्विरामः सर्वसाधनः।
ललाटाक्षो विश्वदेहः सारः संसारचक्रभृत्॥ ५४॥
४२८ मघवान् कौशिकः—कुशिकवंशीय इन्द्रस्वरूप, ४२९ गोमान्—प्रकाशकिरणोंसे युक्त, ४३० विरामः—समस्त प्राणियोंके लयके स्थान, ४३१ सर्वसाधनः—समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाले, ४३२ ललाटाक्षः—ललाटमें तीसरा नेत्र धारण करनेवाले, ४३३ विश्वदेहः—जगत्स्वरूप, ४३४ सारः—सारतत्त्वरूप, ४३५ संसारचक्रभृत्—संसारचक्रको धारण करनेवाले॥ ५४॥

अमोघदण्डो मध्यस्थो हिरण्यो ब्रह्मवर्चसी।
परमार्थः परो मायी शम्बरो व्याघ्रलोचनः॥ ५५॥
४३६ अमोघदण्डः—जिनका दण्ड कभी व्यर्थ नहीं जाता है, ऐसे, ४३७ मध्यस्थः—उदासीन, ४३८ हिरण्यः—सुवर्ण अथवा तेजःस्वरूप, ४३९ ब्रह्मवर्चसी—ब्रह्मतेजसे सम्पन्न, ४४० परमार्थः—मोक्षरूप उत्कृष्ट अर्थकी प्राप्ति करानेवाले, ४४१ परो मायी—महामायावी, ४४२ शम्बरः—कल्याणप्रद,

789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 D