भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* कोटिरुद्रसंहिता * ५४७

( अनित्यकार्य ) -रूप ॥ ४४ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरो जनकः सर्वशासनः ।
नृत्यप्रियो नित्यनृत्यः प्रकाशात्मा प्रकाशकः ॥ ४५ ॥
३५४ ओजस्तेजोद्युतिधरः—ओज ( प्राण और बल ), तेज ( शौर्य आदि गुण ) तथा ज्ञानकी दीप्तिको धारण करनेवाले, ३५५ जनकः—सबके उत्पादक, ३५६ सर्वशासनः—सबके शासक, ३५७ नृत्यप्रियः—नृत्यके प्रेमी, ३५८ नित्यनृत्यः—प्रतिदिन ताण्डव नृत्य करनेवाले, ३५९ प्रकाशात्मा—प्रकाशस्वरूप, ३६० प्रकाशकः—सूर्य आदिको भी प्रकाश देनेवाले ॥ ४५ ॥

स्पष्टाक्षरो बुधो मन्त्रः समानः सारसम्प्लवः ।
युगादिकृद्युगावर्तो गम्भीरो वृषवाहनः ॥ ४६ ॥
३६१ स्पष्टाक्षरः—ओंकाररूप स्पष्ट अक्षरवाले, ३६२ बुधः—ज्ञानवान्, ३६३ मन्त्रः—ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रस्वरूप, ३६४ समानः—सबके प्रति समान भाव रखनेवाले, ३६५ सारसम्प्लवः—संसारसागरसे पार होनेके लिये नौकारूप, ३६६ युगादिकृद्युगावर्तः—युगादिका आरम्भ करनेवाले तथा चारों युगोंको चक्रकी तरह घुमानेवाले, ३६७ गम्भीरः—गाम्भीर्यसे युक्त, ३६८ वृषवाहनः—नन्दी नामक वृषभपर सवार होनेवाले ॥ ४६ ॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः सुलभः सारशोधनः ।
तीर्थरूपस्तीर्थनामा तीर्थदृश्यस्तु तीर्थदः ॥ ४७ ॥
३६९ इष्टः—परमानन्दस्वरूप होनेसे सर्वप्रिय, ३७० अविशिष्टः—सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, ३७१ शिष्टेष्टः—शिष्ट पुरुषोंके इष्टदेव, ३७२ सुलभः—अनन्यचित्तसे निरन्तर स्मरण करनेवाले भक्तोंके लिये सुगमतासे प्राप्त होनेयोग्य, ३७३ सारशोधनः—सारतत्त्वकी खोज करनेवाले, ३७४ तीर्थरूपः—तीर्थस्वरूप, ३७५ तीर्थनामा—तीर्थनामधारी अथवा जिनका नाम भवसागरसे पार लगानेवाला है, ऐसे, ३७६ तीर्थदृश्यः—तीर्थसेवनसे अपने स्वरूपका दर्शन करानेवाले अथवा गुरु-कृपासे प्रत्यक्ष होनेवाले, ३७७ तीर्थदः—चरणोदक स्वरूप तीर्थको देनेवाले ॥ ४७ ॥

अपांनिधिरधिष्ठानं दुर्जयो जयकालवित् ।
प्रतिष्ठितः प्रमाणज्ञो हिरण्यकवचो हरिः ॥ ४८ ॥
३७८ अपांनिधिः—जलके निधान समुद्ररूप, ३७९ अधिष्ठानम्—उपादान-कारणरूपसे सब भूतोंके आश्रय अथवा जगत्-रूप प्रपंचके अधिष्ठान, ३८० दुर्जयः—जिनको जीतना कठिन है, ऐसे, ३८१ जयकालवित्—विजयके अवसरको समझनेवाले, ३८२ प्रतिष्ठितः—अपनी महिमामें स्थित, ३८३ प्रमाणज्ञः—प्रमाणोंके ज्ञाता, ३८४ हिरण्यकवचः—सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, ३८५ हरिः—श्रीहरिस्वरूप ॥ ४८ ॥

विमोचनः सुरगणो विद्येशो विन्दुसंश्रयः ।
बालरूपोऽबलोन्मत्तोऽविकर्ता गहनो गुहः ॥ ४९ ॥
३८६ विमोचनः—संसारबन्धनसे सदाके लिये छुड़ा देनेवाले, ३८७ सुरगणः—देवसमुदायरूप, ३८८ विद्येशः—सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, ३८९ विन्दुसंश्रयः—बिन्दुरूप प्रणवके आश्रय, ३९० बालरूपः—बालकका रूप धारण करनेवाले, ३९१ अबलोन्मत्तः—बलसे उन्मत्त न होनेवाले, ३९२ अविकर्ता—विकाररहित, ३९३ गहनः—दुर्बोधस्वरूप या अगम्य, ३९४ गुहः—मायासे अपने यथार्थ स्वरूपको छिपाये रखनेवाले ॥ ४९ ॥

789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 C