भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

३०९ महाबलः— प्रमथगणोंकी महती सेनासे सम्पन्न ॥ ३८ ॥
योगी योग्यो महातेजाः सिद्धिः सर्वादिराग्रहः।
वसुर्वसुमनाः सत्यः सर्वपापहरो हरः ॥ ३९ ॥
३१० योगी योग्यः—सुयोग्य योगी, ३११ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, ३१२ सिद्धिः—समस्त साधनोंके फल, ३१३ सर्वादिः—सब भूतोंके आदिकारण, ३१४ अग्रहः—इन्द्रियोंकी ग्रहणशक्तिके अविषय, ३१५ वसुः—सब भूतोंके वासस्थान, ३१६ वसुमनाः—उदार मनवाले, ३१७ सत्यः—सत्यस्वरूप, ३१८ सर्वपापहरो हरः—समस्त पापोंका अपहरण करनेके कारण हर नामसे प्रसिद्ध ॥ ३९ ॥
सुकीर्तिशोभनः श्रीमान् वेदाङ्गो वेदविन्मुनिः।
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता लोकनाथो दुराधरः ॥ ४० ॥
३१९ सुकीर्तिशोभनः—उत्तम कीर्तिसे सुशोभित होनेवाले, ३२० श्रीमान्—विभूतिस्वरूपा उमासे सम्पन्न, ३२१ वेदाङ्गः—वेदरूप अंगोंवाले, ३२२ वेदविन्मुनिः—वेदोंका विचार करनेवाले मननशील मुनि, ३२३ भ्राजिष्णुः—एकरस प्रकाशस्वरूप, ३२४ भोजनम्—ज्ञानियोंद्वारा भोगनेयोग्य अमृतस्वरूप, ३२५ भोक्ता—पुरुषरूपसे उपभोग करनेवाले, ३२६ लोकनाथः—भगवान् विश्वनाथ, ३२७ दुराधरः—अजितेन्द्रिय पुरुषोंद्वारा जिनकी आराधना अत्यन्त कठिन है, ऐसे ॥ ४० ॥
अमृतः शाश्वतः शान्तो बाणहस्तः प्रतापवान्।
कमण्डलुधरो धन्वी अवाङ्मनसगोचरः ॥ ४१ ॥
३२८ अमृतः शाश्वतः—सनातन अमृतस्वरूप, ३२९ शान्तः—शान्तिमय, ३३० बाणहस्तः प्रतापवान्—हाथमें बाण धारण करनेवाले प्रतापी वीर, ३३१ कमण्डलुधरः—कमण्डलु धारण करनेवाले, ३३२ धन्वी—पिनाकधारी, ३३३ अवाङ्मनसगोचरः—मन और वाणीके अविषय ॥ ४१ ॥
अतीन्द्रियो महामायः सर्वावासश्चतुष्पथः।
कालयोगी महानादो महोत्साहो महाबलः ॥ ४२ ॥
३३४ अतीन्द्रियो महामायः—इन्द्रियातीत एवं महामायावी, ३३५ सर्वावासः—सबके वासस्थान, ३३६ चतुष्पथः—चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धिके एकमात्र मार्ग, ३३७ कालयोगी—प्रलयके समय सबको कालसे संयुक्त करनेवाले, ३३८ महानादः— गम्भीर शब्द करनेवाले अथवा अनाहत नादरूप, ३३९ महोत्साहो महाबलः—महान् उत्साह और बलसे सम्पन्न ॥ ४२ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो भूतचारी पुरंदरः।
निशाचरः प्रेतचारी महाशक्तिर्महाद्युतिः ॥ ४३ ॥
३४० महाबुद्धिः—श्रेष्ठ बुद्धिवाले, ३४१ महावीर्यः—अनन्त पराक्रमी, ३४२ भूतचारी—भूतगणोंके साथ विचरनेवाले, ३४३ पुरंदरः—त्रिपुरसंहारक, ३४४ निशाचरः—रात्रिमें विचरण करनेवाले, ३४५ प्रेतचारी—प्रेतोंके साथ भ्रमण करनेवाले, ३४६ महाशक्तिर्महाद्युतिः—अनन्तशक्ति एवं श्रेष्ठ कान्तिसे सम्पन्न ॥ ४३ ॥
अनिर्देश्यवपुः श्रीमान् सर्वचार्यमनोगतिः।
बहुश्रुतोऽमहामायो नियतात्मा ध्रुवोऽध्रुवः ॥ ४४ ॥
३४७ अनिर्देश्यवपुः—अनिर्वचनीय स्वरूपवाले, ३४८ श्रीमान्—ऐश्वर्यवान्, ३४९ सर्वचार्यमनोगतिः—सबके लिये अविचार्य मनोगतिवाले, ३५० बहुश्रुतः—बहुज्ञ अथवा सर्वज्ञ, ३५१ अमहामायः—बड़ी-से-बड़ी माया भी जिनपर प्रभाव नहीं डाल सकती ऐसे, ३५२ नियतात्मा—मनको वशमें रखनेवाले, ३५३ ध्रुवोऽध्रुवः—ध्रुव (नित्य कारण) और अध्रुव

789 संक्षिप्त शिवपुराण—18 B

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