भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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* कोटिरुद्रसंहिता * ५५१

पिङ्गलः कपिलश्मश्रुर्भालनेत्रस्त्रयीतनुः। ज्ञानस्कन्दो महानीतिर्विश्वोत्पत्तिरुपप्लवः॥ ६७॥ ५३० पिङ्गलः— पिंगलवर्णवाले, ५३१ कपिलश्मश्रुः—कपिल वर्णकी दाढ़ी-मूँछ रखनेवाले दुर्वासा मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ५३२ भालनेत्रः— ललाटमें तृतीय नेत्र धारण करनेवाले, ५३३ त्रयीतनुः—तीनों लोक या तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, ऐसे, ५३४ ज्ञानस्कन्दो महानीतिः—ज्ञानप्रद और श्रेष्ठ नीतिवाले, ५३५ विश्वोत्पत्तिः—जगत्के उत्पादक, ५३६ उपप्लवः—संहारकारी॥ ६७॥

भगो विवस्वानादित्यो योगपारो दिवस्पतिः। कल्याणगुणनामा च पापहा पुण्यदर्शनः॥ ६८॥ ५३७ भगो विवस्वानादित्यः—अदितिनन्दन भग एवं विवस्वान्, ५३८ योगपारः—योगविद्यामें पारंगत, ५३९ दिवस्पतिः—स्वर्गलोकके स्वामी, ५४० कल्याणगुणनामा—कल्याणकारी गुण और नामवाले, ५४१ पापहा—पापनाशक, ५४२ पुण्यदर्शनः—पुण्यजनक दर्शनवाले अथवा पुण्यसे ही जिनका दर्शन होता है, ऐसे॥ ६८॥

उदारकीर्तिरुद्योगी सद्योगी सदसन्मयः। नक्षत्रमाली नाकेशः स्वाधिष्ठानपदाश्रयः॥ ६९॥ ५४३ उदारकीर्तिः—उत्तम कीर्तिवाले, ५४४ उद्योगी—उद्योगशील, ५४५ सद्योगी—श्रेष्ठ योगी, ५४६ सदसन्मयः—सदसत्स्वरूप, ५४७ नक्षत्रमाली—नक्षत्रोंकी मालासे अलंकृत आकाशरूप, ५४८ नाकेशः—स्वर्गके स्वामी, ५४९ स्वाधिष्ठानपदाश्रयः—स्वाधिष्ठान चक्रके आश्रय॥ ६९॥

पवित्रः पापहारी च मणिपूरो नभोगतिः। हृत्पुण्डरीकमासीनः शक्रः शान्तो वृषाकपिः॥ ७०॥

५५० पवित्रः पापहारी—नित्य शुद्ध एवं पापनाशक, ५५१ मणिपूरः—मणिपूर नामक चक्रस्वरूप, ५५२ नभोगतिः—आकाशचारी, ५५३ हृत्पुण्डरीकमासीनः—हृदयकमलमें स्थित, ५५४ शक्रः—इन्द्ररूप, ५५५ शान्तः—शान्त-स्वरूप, ५५६ वृषाकपिः—हरिहर॥ ७०॥

उष्णो गृहपतिः कृष्णः समर्थोऽनर्थनाशनः। अधर्मशत्रुरज्ञेयः पुरुहूतः पुरुश्रुतः॥ ७१॥ ५५७ उष्णः—हालाहल विषकी गर्मीसे उष्णतायुक्त, ५५८ गृहपतिः—समस्त ब्रह्माण्डरूपी गृहके स्वामी, ५५९ कृष्णः—सच्चिदानन्दस्वरूप, ५६० समर्थः—सामर्थ्यशाली, ५६१ अनर्थनाशनः—अनर्थका नाश करनेवाले, ५६२ अधर्मशत्रुः—अधर्मनाशक, ५६३ अज्ञेयः—बुद्धिकी पहुँचसे परे अथवा जाननेमें न आनेवाले, ५६४ पुरुहूतः पुरुश्रुतः—बहुत-से नामोंद्वारा पुकारे और सुने जानेवाले॥ ७१॥

ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः। जगद्धितैषी सुगतः कुमारः कुशलागमः॥ ७२॥ ५६५ ब्रह्मगर्भः—ब्रह्मा जिनके गर्भस्थ शिशुके समान हैं, ऐसे, ५६६ बृहद्गर्भः—विश्वब्रह्माण्ड प्रलयकालमें जिनके गर्भमें रहता है, ऐसे, ५६७ धर्मधेनुः—धर्मरूपी वृषभको उत्पन्न करनेके लिये धेनुस्वरूप, ५६८ धनागमः—धनकी प्राप्ति करानेवाले, ५६९ जगद्धितैषी—समस्त संसारका हित चाहनेवाले, ५७० सुगतः—उत्तम ज्ञानसे सम्पन्न अथवा बुद्धस्वरूप, ५७१ कुमारः—कार्तिकेयरूप, ५७२ कुशलागमः—कल्याणदाता॥ ७२॥

हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्नानाभूतरतो ध्वनिः। अरागो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेश्वरः॥ ७३॥

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