भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५५२ * संक्षिप्त शिवपुराण *


५७३ हिरण्यवर्णो ज्योतिष्मान्—सुवर्णके समान गौरवर्णवाले तथा तेजस्वी, ५७४ नानाभूतरतः—नाना प्रकारके भूतोंके साथ क्रीडा करनेवाले, ५७५ ध्वनिः—नादस्वरूप, ५७६ अरागः—आसक्तिशून्य, ५७७ नयनाध्यक्षः—नेत्रोंमें द्रष्टारूपसे विद्यमान, ५७८ विश्वामित्रः—सम्पूर्ण जगत्के प्रति मैत्री भावना रखनेवाले मुनिस्वरूप, ५७९ धनेश्वरः—धनके स्वामी कुबेर॥ ७३॥
ब्रह्मज्योतिर्वसुधामा महाज्योतिरुत्तमः।
मातामहो मातरिश्वा नभस्वान्नागहारधृक्॥ ७४॥
५८० ब्रह्मज्योतिः—ज्योतिःस्वरूप ब्रह्म, ५८१ वसुधामा—सुवर्ण और रत्नोंके तेजसे प्रकाशित अथवा वसुधास्वरूप, ५८२ महाज्योतिरुत्तमः—सूर्य आदि ज्योतियोंके प्रकाशक सर्वोत्तम महाज्योतिःस्वरूप, ५८३ मातामहः—मातृकाओंके जन्मदाता होनेके कारण मातामह, ५८४ मातरिश्वा नभस्वान्—आकाशमें विचरनेवाले वायुदेव, ५८५ नागहारधृक्—सर्पमय हार धारण करनेवाले॥ ७४॥
पुलस्त्यः पुलहोऽगस्त्यो जातूकर्ण्यः पराशरः।
निरावरणनिर्वारो वैरणच्यो विष्टरश्रवाः॥ ७५॥
५८६ पुलस्त्यः—पुलस्त्य नामक मुनि, ५८७ पुलहः—पुलह नामक ऋषि, ५८८ अगस्त्यः—कुम्भजन्मा अगस्त्य ऋषि, ५८९ जातूकर्ण्यः—इसी नामसे प्रसिद्ध मुनि, ५९० पराशरः—शक्तिके पुत्र तथा व्यासजीके पिता मुनिवर पराशर, ५९१ निरावरणनिर्वारः—आवरणशून्य तथा अवरोधरहित, ५९२ वैरणच्यः—ब्रह्माजीके पुत्र नीललोहित रुद्र, ५९३ विष्टरश्रवाः—विस्तृत यशवाले विष्णुस्वरूप॥ ७५॥


आत्मभूरनिरुद्धोऽत्रिर्ज्ञानमूर्तिर्महायशाः।
लोकवीराग्रणीर्वीरश्चण्डः सत्यपराक्रमः॥ ७६॥
५९४ आत्मभूः—स्वयम्भू ब्रह्मा, ५९५ अनिरुद्धः—अकुण्ठित गतिवाले, ५९६ अत्रिः—अत्रि नामक ऋषि अथवा त्रिगुणातीत, ५९७ ज्ञानमूर्तिः—ज्ञानस्वरूप, ५९८ महायशाः—महायशस्वी, ५९९ लोकवीराग्रणीः—विश्वविख्यात वीरोंमें अग्रगण्य, ६०० वीरः—शूरवीर, ६०१ चण्डः—प्रलयके समय अत्यन्त क्रोध करनेवाले, ६०२ सत्यपराक्रमः—सच्चे पराक्रमी॥ ७६॥
व्यालाकल्पो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः।
अलंकरिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोन्नतः॥ ७७॥
६०३ व्यालाकल्पः—सर्पोंके आभूषणसे शृङ्गार करनेवाले, ६०४ महाकल्पः—महाकल्पसंज्ञक कालस्वरूपवाले, ६०५ कल्पवृक्षः—शरणागतोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षके समान उदार, ६०६ कलाधरः—चन्द्रकलाधारी, ६०७ अलंकरिष्णुः—अलंकार धारण करने या करानेवाले, ६०८ अचलः—विचलित न होनेवाले, ६०९ रोचिष्णुः—प्रकाशमान, ६१० विक्रमोन्नतः—पराक्रममें बढ़े-चढ़े॥ ७७॥
आयुः शब्दपतिर्वेगी प्लवनः शिखिसारथिः।
असंसृष्टोऽतिथिः शक्रप्रमाथी पादपासनः॥ ७८॥
६११ आयुः शब्दपतिः—आयु तथा वाणीके स्वामी, ६१२ वेगी प्लवनः—वेगशाली तथा कूदने या तैरनेवाले, ६१३ शिखिसारथिः—अग्निरूप सहायकवाले, ६१४ असंसृष्टः—निर्लेप, ६१५ अतिथिः—प्रेमी भक्तोंके घरपर अतिथिकी भाँति उपस्थित हो उनका सत्कार ग्रहण