शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५५३
करनेवाले, ६१६ शक्रप्रमाथी—इन्द्रका मान मर्दन करनेवाले, ६१७ पादपासनः— वृक्षोंपर या वृक्षोंके नीचे आसन लगानेवाले ॥ ७८ ॥
वसुश्रवा हव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः।
जप्यो जरादिशमनो लोहितात्मा तनूनपात् ॥ ७९ ॥
६१८ वसुश्रवाः—यशरूपी धनसे सम्पन्न, ६१९ हव्यवाहः—अग्निस्वरूप, ६२० प्रतप्तः—सूर्यरूपसे प्रचण्ड ताप देनेवाले, ६२१ विश्वभोजनः—प्रलयकालमें विश्व-ब्रह्माण्डको अपना ग्रास बना लेनेवाले, ६२२ जप्यः—जपनेयोग्य नामवाले, ६२३ जरादिशमनः—बुढ़ापा आदि दोषोंका निवारण करनेवाले, ६२४ लोहितात्मा तनूनपात्—लोहितवर्णवाले अग्निरूप ॥ ७९ ॥
बृहदश्वो नभोयोनिः सुप्रतीकस्तमिस्रहा।
निदाघस्तपनो मेघः स्वक्षः परपुरञ्जयः ॥ ८० ॥
६२५ बृहदश्वः—विशाल अश्ववाले, ६२६ नभोयोनिः—आकाशकी उत्पत्तिके स्थान, ६२७ सुप्रतीकः—सुन्दर शरीरवाले, ६२८ तमिस्रहा—अज्ञानान्धकारनाशक, ६२९ निदाघस्तपनः—तपनेवाले ग्रीष्मरूप, ६३० मेघः—बादलोंसे उपलक्षित वर्षारूप, ६३१ स्वक्षः—सुन्दर नेत्रोंवाले, ६३२ परपुरञ्जयः—त्रिपुररूप शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले ॥ ८० ॥
सुखानिलः सुनिष्पन्नः सुरभिः शिशिरात्मकः।
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहनः ॥ ८१ ॥
६३३ सुखानिलः—सुखदायक वायुको प्रकट करनेवाले शरत्कालरूप, ६३४ सुनिष्पन्नः—जिसमें अन्नका सुन्दररूपसे परिपाक होता है, वह हेमन्तकालरूप, ६३५ सुरभिः शिशिरात्मकः—सुगन्धित मलयाानिलसे युक्त शिशिर-ऋतुरूप, ६३६ वसन्तो माधवः—चैत्र-वैशाख—इन दो मासोंसे युक्त वसन्तरूप, ६३७ ग्रीष्मः— ग्रीष्म-ऋतुरूप, ६३८ नभस्यः—भाद्रपदमासरूप, ६३९ बीजवाहनः—धान आदिके बीजोंकी प्राप्ति करानेवाला शरत्काल ॥ ८१ ॥
अङ्गिरा गुरुरात्रेयो विमलो विश्ववाहनः।
पावनः सुमतिर्विद्वांस्त्रैविद्यो वरवाहनः ॥ ८२ ॥
६४० अङ्गिरा गुरुः—अंगिरा नामक ऋषि तथा उनके पुत्र देवगुरु बृहस्पति, ६४१ आत्रेयः—अत्रिकुमार दुर्वासा, ६४२ विमलः—निर्मल, ६४३ विश्ववाहनः— सम्पूर्ण जगत्का निर्वाह करानेवाले, ६४४ पावनः—पवित्र करनेवाले, ६४५ सुमतिर्विद्वान्—उत्तम बुद्धिवाले विद्वान्, ६४६ त्रैविद्यः—तीनों वेदोंके विद्वान् अथवा तीनों वेदोंके द्वारा प्रतिपादित, ६४७ वरवाहनः—वृषभरूप श्रेष्ठ वाहनवाले ॥ ८२ ॥
मनोबुद्धिरहङ्कारः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रपालकः।
जमदग्निर्बलनिधिर्विगालो विश्वगालवः ॥ ८३ ॥
६४८ मनोबुद्धिरहंकारः—मन, बुद्धि और अहंकारस्वरूप, ६४९ क्षेत्रज्ञः—आत्मा, ६५० क्षेत्रपालकः—शरीररूपी क्षेत्रका पालन करनेवाले परमात्मा, ६५१ जमदग्निः—जमदग्नि नामक ऋषिरूप, ६५२ बलनिधिः—अनन्त बलके सागर, ६५३ विगालः—अपनी जटासे गङ्गाजीके जलको टपकानेवाले, ६५४ विश्वगालवः—विश्वविख्यात गालव मुनि अथवा प्रलयकालमें कालाग्निस্বরূপसे जगत्को निगल जानेवाले ॥ ८३ ॥
अघोरोऽनुत्तरो यज्ञः श्रेष्ठो निःश्रेयसप्रदः।
शैलो गगनकुन्दाभो दानवारिररिंदमः ॥ ८४ ॥
६५५ अघोरः—सौम्यरूपवाले, ६५६ अनुत्तरः—सर्वश्रेष्ठ, ६५७ यज्ञः श्रेष्ठः— श्रेष्ठ यज्ञरूप, ६५८ निःश्रेयसप्रदः—कल्याणदाता,