भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५५४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

६५९ शैलः—शिलामय लिंगरूप, ६६० गगनकुन्दाभः — आकाशकुन्द — चन्द्रमाके समान गौर कान्तिवाले, ६६१ दानवारिः— दानव-शत्रु, ६६२ अरिंदमः—शत्रुओंका दमन करनेवाले॥ ८४॥

रजनीजनकश्चारुर्निःशल्यो लोकशल्यधृक्।
चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः ॥ ८५ ॥

६६३ रजनीजनकश्चारुः—सुन्दर निशाकर-रूप, ६६४ निःशल्यः—निष्कण्टक, ६६५ लोकशल्यधृक्—शरणागतजनोंके शोक-शल्यको निकालकर स्वयं धारण करनेवाले, ६६६ चतुर्वेदः—चारों वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य, ६६७ चतुर्भावः—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाले, ६६८ चतुरश्चतुरप्रियः—चतुर एवं चतुर पुरुषोंके प्रिय॥ ८५॥

आम्नायोऽथ समाम्नायस्तीर्थदेवशिवालयः।
बहुरूपो महारूपः सर्वरूपश्चराचरः ॥ ८६ ॥

६६९ आम्नायः—वेदस्वरूप, ६७० समाम्नायः—अक्षरसमाम्नाय—शिवसूत्ररूप, ६७१ तीर्थदेवशिवालयः—तीर्थोंके देवता और शिवालयरूप, ६७२ बहुरूपः—अनेक रूपवाले, ६७३ महारूपः—विराट्-रूपधारी, ६७४ सर्वरूपश्चराचरः— चर और अचर सम्पूर्ण रूपवाले॥ ८६॥

न्यायनिर्मायको न्यायी न्यायगम्यो निरञ्जनः।
सहस्रमूर्द्धा देवेन्द्रः सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः ॥ ८७ ॥

६७५ न्यायनिर्मायको न्यायी—न्यायकर्ता तथा न्यायशील, ६७६ न्यायगम्यः—न्याययुक्त आचरणसे प्राप्त होनेयोग्य, ६७७ निरञ्जनः—निर्मल, ६७८ सहस्रमूर्द्धा—सहस्रों सिरवाले, ६७९ देवेन्द्रः—देवताओंके स्वामी, ६८० सर्वशस्त्रप्रभञ्जनः—विपक्षी योद्धाओंके सम्पूर्ण शस्त्रोंको नष्ट कर देनेवाले॥ ८७॥

मुण्डो विरूपो विक्रान्तो दण्डी दान्तो गुणोत्तमः।
पिङ्गलाक्षो जनाध्यक्षो नीलग्रीवो निरामयः॥ ८८॥

६८१ मुण्डः—मुँड़े हुए सिरवाले संन्यासी, ६८२ विरूपः—विविध रूपवाले, ६८३ विक्रान्तः—विक्रमशील, ६८४ दण्डी—दण्डधारी, ६८५ दान्तः—मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, ६८६ गुणोत्तमः—गुणोंमें सबसे श्रेष्ठ, ६८७ पिङ्गलाक्षः—पिंगल नेत्रवाले, ६८८ जनाध्यक्षः—जीवमात्रके साक्षी, ६८९ नीलग्रीवः—नीलकण्ठ, ६९० निरामयः—नीरोग॥ ८८॥

सहस्रबाहुः सर्वेशः शरण्यः सर्वलोकधृक्।
पद्मासनः परं ज्योतिः पारम्पर्य्यफलप्रदः॥ ८९ ॥

६९१ सहस्रबाहुः—सहस्रों भुजाओंसे युक्त, ६९२ सर्वेशः—सबके स्वामी, ६९३ शरण्यः—शरणागत हितैषी, ६९४ सर्वलोकधृक्—सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेवाले, ६९५ पद्मासनः—कमलके आसनपर विराजमान, ६९६ परं ज्योतिः—परम प्रकाशस्वरूप, ६९७ पारम्पर्य्यफलप्रदः—परम्परागत फलकी प्राप्ति करानेवाले॥ ८९॥

पद्मगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षणः।
परावरज्ञो वरदो वरेण्यश्च महास्वनः॥ ९० ॥

६९८ पद्मगर्भः—अपनी नाभिसे कमलको प्रकट करनेवाले विष्णुरूप, ६९९ महागर्भः—विराट् ब्रह्माण्डको गर्भमें धारण करनेके कारण महान् गर्भवाले, ७०० विश्वगर्भः—सम्पूर्ण जगत्‌को अपने उदरमें धारण करनेवाले, ७०१ विचक्षणः—चतुर, ७०२ परावरज्ञः—कारण और कार्यके ज्ञाता, ७०३ वरदः—अभीष्ट वर देनेवाले, ७०४ वरेण्यः—वरणीय अथवा श्रेष्ठ, ७०५ महास्वनः—डमरूका गम्भीर नाद करनेवाले॥ ९०॥