शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५५५
देवासुरगुरुर्देवो देवासुरनमस्कृतः।
देवासुरमहामित्रो देवासुरमहेश्वरः॥ ९१॥
७०६ देवासुरगुरुर्देवः—देवताओं तथा असुरोंके गुरुदेव एवं आराध्य, ७०७ देवासुरनमस्कृतः—देवताओं तथा असुरोंसे वन्दित, ७०८ देवासुरमहामित्रः—देवता तथा असुर दोनोंके बड़े मित्र, ७०९ देवासुरमहेश्वरः—देवताओं और असुरोंके महान् ईश्वर॥ ९१॥
देवासुरेश्वरो दिव्यो देवासुरमहाश्रयः।
देवदेवमयोऽचिन्त्यो देवदेवात्मसम्भवः॥ ९२॥
७१० देवासुरेश्वरः—देवताओं और असुरोंके शासक, ७११ दिव्यः—अलौकिक स्वरूपवाले, ७१२ देवासुरमहाश्रयः—देवताओं और असुरोंके महान् आश्रय, ७१३ देवदेवमयः—देवताओंके लिये भी देवतारूप, ७१४ अचिन्त्यः—चित्तकी सीमासे परे विद्यमान, ७१५ देवदेवात्मसम्भवः—देवाधिदेव ब्रह्माजीसे रुद्ररूपमें उत्पन्न॥ ९२॥
सद्योनिरसुरव्याघ्रो देवसिंहो दिवाकरः।
विबुधाग्रचरश्रेष्ठः सर्वदेवोत्तमोत्तमः॥ ९३॥
७१६ सद्योनिः—सत्पदार्थोंकी उत्पत्तिके हेतु, ७१७ असुरव्याघ्रः—असुरोंका विनाश करनेके लिये व्याघ्ररूप, ७१८ देवसिंहः—देवताओंमें श्रेष्ठ, ७१९ दिवाकरः—सूर्यरूप, ७२० विबुधाग्रचरश्रेष्ठः—देवताओंके नायकोंमें सर्वश्रेष्ठ, ७२१ सर्वदेवोत्तमोत्तमः—सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवताओंके भी शिरोमणि॥ ९३॥
शिवज्ञानरतः श्रीमाच्छिखिश्रीपर्वतप्रियः।
वज्रहस्तः सिद्धखड्गो नरसिंहनिपातनः॥ ९४॥
७२२ शिवज्ञानरतः—कल्याणमय शिवतत्त्वके विचारमें तत्पर, ७२३ श्रीमान्—अणिमा आदि विभूतियोंसे सम्पन्न, ७२४ शिखिश्रीपर्वतप्रियः—कुमार कार्तिकेयके निवासभूत श्रीशैल नामक पर्वतसे प्रेम करनेवाले, ७२५ वज्रहस्तः—वज्रधारी इन्द्ररूप, ७२६ सिद्धखड्गः—शत्रुओंको मार गिरानेमें जिनकी तलवार कभी असफल नहीं होती, ऐसे, ७२७ नरसिंहनिपातनः—शरभरूपसे नृसिंहको धराशायी करनेवाले॥ ९४॥
ब्रह्मचारी लोकचारी धर्मचारी धनाधिपः।
नन्दी नन्दीश्वरोऽनन्तो नग्नव्रतधरः शुचिः॥ ९५॥
७२८ ब्रह्मचारी—भगवती उमाके प्रेमकी परीक्षा लेनेके लिये ब्रह्मचारीरूपसे प्रकट, ७२९ लोकचारी—समस्त लोकोंमें विचरनेवाले, ७३० धर्मचारी—धर्मका आचरण करनेवाले, ७३१ धनाधिपः—धनके अधिपति कुबेर, ७३२ नन्दी—नन्दी नामक गण, ७३३ नन्दीश्वरः—इसी नामसे प्रसिद्ध वृषभ, ७३४ अनन्तः—अन्तरहित, ७३५ नग्नव्रतधरः—दिगम्बर रहनेका व्रत धारण करनेवाले, ७३६ शुचिः—नित्यशुद्ध॥ ९५॥
लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावहः।
स्वधर्मा स्वर्गतः स्वर्गस्वरः स्वरमयस्वनः॥ ९६॥
७३७ लिङ्गाध्यक्षः—लिंगदेहके द्रष्टा, ७३८ सुराध्यक्षः—देवताओंके अधिपति, ७३९ योगाध्यक्षः—योगेश्वर, ७४० युगावहः—युगके निर्वाहक, ७४१ स्वधर्मा—आत्मविचाररूप धर्ममें स्थित अथवा स्वधर्मपरायण, ७४२ स्वर्गतः—स्वर्गलोकमें स्थित, ७४३ स्वर्गस्वरः—स्वर्गलोकमें जिनके यशका गान किया जाता है, ऐसे, ७४४ स्वरमयस्वनः—सात प्रकारके स्वरोंसे युक्त ध्वनिवाले॥ ९६॥
बाणाध्यक्षो बीजकर्ता धर्मकृद्धर्मसम्भवः।
दम्भोऽलोभोऽर्थविच्छम्भुः सर्वभूतमहेश्वरः॥ ९७॥
७४५ बाणाध्यक्षः—बाणासुरके स्वामी अथवा बाणलिंग नर्मदेश्वरमें अधिदेवतारूपसे स्थित, ७४६ बीजकर्ता—बीजके उत्पादक,