शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- कोटिरुद्रसंहिता * ५४३
घुमानेवाले, १७३ अनिवृत्तात्मा—सर्वत्र विद्यमान होनेके कारण जिनका आत्मा कहींसे भी हटा नहीं है, ऐसे, १७४ धर्मपुञ्जः—धर्म या पुण्यकी राशि, १७५ सदाशिवः—निरन्तर कल्याणकारी, १७६ अकल्मषः—पापरहित, १७७ चतुर्बाहुः—चार भुजाधारी, १७८ दुरावासः— जिन्हें योगीजन भी बड़ी कठिनाईसे अपने हृदयमन्दिरमें बसा पाते हैं, ऐसे, १७९ दुरासदः—परम दुर्जय ॥ २२ ॥
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गः सर्व switchायुधविशारदः। अध्यात्मयोगनिलयः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः॥ २३॥
१८० दुर्लभः—भक्तिहीन पुरुषोंको कठिनतासे प्राप्त होनेवाले, १८१ दुर्गमः—जिनके निकट पहुँचना किसीके लिये भी कठिन है ऐसे, १८२ दुर्गः—पाप-तापसे रक्षा करनेके लिये दुर्गरूप अथवा दुर्ज्ञेय, १८३ सर्वायुधविशारदः—सम्पूर्ण अस्त्रोंके प्रयोगकी कलामें कुशल, १८४ अध्यात्मयोगनिलयः—अध्यात्मयोगमें स्थित, १८५ सुतन्तुः—सुन्दर विस्तृत जगत्-रूप तन्तुवाले, १८६ तन्तुवर्धनः—जगत्-रूप तन्तुको बढ़ानेवाले ॥ २३ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गो जगदीश जनार्दनः। भस्मशुद्धिकरो मेरुरोजस्वी शुद्धविग्रहः॥ २४॥
१८७ शुभाङ्गः—सुन्दर अंगोंवाले, १८८ लोकसारङ्गः—लोकसारग्राही, १८९ जगदीशः—जगत्के स्वामी, १९० जनार्दनः—भक्तजनोंकी याचनाके आलम्बन, १९१ भस्मशुद्धिकरः—भस्मसे शुद्धिका सम्पादन करनेवाले, १९२ मेरुः—सुमेरु पर्वतके समान केन्द्ररूप, १९३ ओजस्वी—तेज और बलसे सम्पन्न, १९४ शुद्धविग्रहः—निर्मल शरीरवाला॥ २४॥
असाध्यः साधुसाध्यश्च भृत्यमर्करूपधृक्। हिरण्यरेताः पौराणो रिपुजीवहरो बली॥ २५॥
१९५ असाध्यः—साधन-भजनसे दूर रहनेवाले लोगोंके लिये अलभ्य, १९६ साधुसाध्यः—साधन-भजनपरायण सत्पुरुषोंके लिये सुलभ, १९७ भृत्यमर्कटरूपधृक्—श्रीरामके सेवक वानर हनुमान्का रूप धारण करनेवाले, १९८ हिरण्यरेताः—अग्निस्वरूप अथवा सुवर्णमय वीर्यवाले, १९९ पौराणः—पुराणोंद्वारा प्रतिपादित, २०० रिपुजीवहरः—शत्रुओंके प्राण हर लेनेवाले, २०१ बली—बलशाली ॥ २५ ॥
महाह्रदो महागर्तः सिद्धवृन्दारवन्दितः। व्याघ्रचर्माम्बरो व्याली महाभूतो महानिधिः॥ २६॥
२०२ महाह्रदः—परमानन्दके महान् सरोवर, २०३ महागर्तः—महान् आकाशरूप, २०४ सिद्धवृन्दारवन्दितः—सिद्धों और देवताओंद्धारा वन्दित, २०५ व्याघ्रचर्माम्बरः—व्याघ्रचर्मको वस्त्रके समान धारण करनेवाले, २०६ व्याली—सर्पोंको आभूषणकी भाँति धारण करनेवाले, २०७ महाभूतः—त्रिकालमें भी कभी नष्ट न होनेवाले महाभूतस्वरूप, २०८ महानिधिः—सबके महान् निवासस्थान॥ २६॥
अमृताशोऽमृतवपुः पाञ्चजन्यः प्रभञ्जनः। पञ्चविंशतितत्त्वस्थः पारिजातः परावरः॥ २७॥
२०९ अमृताशः—जिनकी आशा कभी विफल न हो ऐसे अमोघसंकल्प, २१० अमृतवपुः—जिनका कलेवर कभी नष्ट न हो ऐसे—नित्यविग्रह, २११ पाञ्चजन्यः—पांचजन्य नामक शंखस्वरूप, २१२ प्रभञ्जनः—वायुस्वरूप अथवा संहारकारी, २१३ पञ्चविंशतितत्त्वस्थः—प्रकृति, महत्तत्त्व (बुद्धि), अहंकार, चक्षु, श्रोत्र,