शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४४ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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घ्राण, रसना, त्वक्, वाक्, पाणि, पायु, पाद, उपस्थ, मन, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन चौबीस जड तत्त्वोंसहित पचीसवें चेतनतत्त्वपुरुषमें व्याप्त, २१४ पारिजातः—याचकोंकी इच्छा पूर्ण करनेमें कल्पवृक्षरूप, २१५ परावरः—कारण-कार्यरूप ॥ २७ ॥
सुलभः सुव्रतः शूरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधिः ।
वर्णाश्रमगुरुर्वर्णी शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥ २८ ॥
२१६ सुलभः—नित्य-निरन्तर चिन्तन करनेवाले एकनिष्ठ श्रद्धालु भक्तको सुगमतासे प्राप्त होनेवाले, २१७ सुव्रतः—उत्तम व्रतधारी, २१८ शूरः—शौर्यसम्पन्न, २१९ ब्रह्मवेदनिधिः—ब्रह्मा और वेदके प्रादुर्भावके स्थान, २२० निधिः—जगत्-रूपी रत्नके उत्पत्तिस्थान, २२१ वर्णाश्रमगुरुः—वर्णों और आश्रमोंके गुरु (उपदेष्टा), २२२ वर्णी—ब्रह्मचारी, २२३ शत्रुजित्—अन्धकासुर आदि शत्रुओंको जीतनेवाले, २२४ शत्रुतापनः—शत्रुओंको संताप देनेवाले ॥ २८ ॥
आश्रमः क्षपणः क्षामो ज्ञानवानचलेश्वरः ।
प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः सुपर्णो वायुवाहनः ॥ २९ ॥
२२५ आश्रमः—सबके विश्रामस्थान, २२६ क्षपणः—जन्म-मरणके कष्टका मूलोच्छेद करनेवाले, २२७ क्षामः—प्रलयकालमें प्रजाको क्षीण करनेवाले, २२८ ज्ञानवान्—ज्ञानी, २२९ अचलेश्वरः—पर्वतों अथवा स्थावर पदार्थोंके स्वामी, २३० प्रमाणभूतः—नित्यसिद्ध प्रमाणरूप, २३१ दुर्ज्ञेयः—कठिनतासे जाननेयोग्य, २३२ सुपर्णः—वेदमय सुन्दर पंखवाले, गरुड़रूप, २३३ वायुवाहनः—अपने भयसे वायुको प्रवाहित करनेवाले ॥ २९ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो गुणराशिर्गुणाकरः ।
सत्यः सत्यपरोऽदीनो धर्माङ्गो धर्मसाधनः ॥ ३० ॥
२३४ धनुर्धरः—पिनाकधारी, २३५ धनुर्वेदः—धनुर्वेदके ज्ञाता, २३६ गुणराशिः—अनन्त कल्याणमय गुणोंकी राशि, २३७ गुणाकरः—सद्गुणोंकी खानि, २३८ सत्यः—सत्यस्वरूप, २३९ सत्यपरः—सत्यपरायण, २४० अदीनः—दीनतासे रहित—उदार, २४१ धर्माङ्गः—धर्ममय विग्रहवाले, २४२ धर्मसाधनः—धर्मका अनुष्ठान करनेवाले ॥ ३० ॥
अनन्तदृष्टिरानन्दो दण्डो दमयिता दमः ।
अभिवाद्यो महामायो विश्वकर्मविशारदः ॥ ३१ ॥
२४३ अनन्तदृष्टिः—असीमित दृष्टिवाले, २४४ आनन्दः—परमानन्दमय, २४५ दण्डः—दुष्टोंको दण्ड देनेवाले अथवा दण्डस्वरूप, २४६ दमयिता—दुर्दान्त दानवोंका दमन करनेवाले, २४७ दमः—दमनस्वरूप, २४८ अभिवाद्यः—प्रणाम करनेयोग्य, २४९ महामायः—मायावियोंको भी मोहनेवाले महामायावी, २५० विश्वकर्मविशारदः—संसारकी सृष्टि करनेमें कुशल ॥ ३१ ॥
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भूतभावनः ।
उन्मत्तवेषः प्रच्छन्नो जितकामोऽजितप्रियः ॥ ३२ ॥
२५१ वीतरागः—पूर्णतया विरक्त, २५२ विनीतात्मा—मनसे विनयशील अथवा मनको वशमें रखनेवाले, २५३ तपस्वी—तपस्यापरायण, २५४ भूतभावनः—सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक एवं रक्षक, २५५ उन्मत्तवेषः—पागलोंके समान वेष धारण करनेवाले, २५६ प्रच्छन्नः—मायाके पर्देमें छिपे हुए, २५७ जितकामः—कामविजयी, २५८ अजितप्रियः—भगवान् विष्णुके प्रेमी ॥ ३२ ॥