शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
महर्षिकपिलाचार्यो विश्वदीप्तिस्त्रिलोचनः।
पिनाकपाणिर्भूदेवः स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्सुधीः ॥ १७॥
१३० महर्षिकपिलाचार्यः—सांख्यशास्त्रके प्रणेता भगवान् कपिलाचार्य, १३१ विश्वदीप्तिः—अपनी प्रभासे सबको प्रकाशित करनेवाले, १३२ त्रिलोचनः—तीनों लोकोंके द्रष्टा, १३३ पिनाकपाणिः—हाथमें पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, १३४ भूदेवः— पृथ्वीके देवता—ब्राह्मण अथवा पार्थिवलिंगरूप; १३५ स्वस्तिदः—कल्याणदाता, १३६ स्वस्तिकृत्— कल्याणकारी, १३७ सुधीः—विशुद्ध बुद्धिवाले ॥ १७ ॥
धातुधामा धामकरः सर्वगः सर्वगोचरः।
ब्रह्मसृग्विश्वासृक्सर्गः कर्णिकारप्रियः कविः ॥ १८ ॥
१३८ धातुधामा—विश्वका धारण-पोषण करनेमें समर्थ तेजवाले, १३९ धामकरः—तेजकी सृष्टि करनेवाले, १४० सर्वगः—सर्वव्यापी, १४१ सर्वगोचरः—सबमें व्याप्त, १४२ ब्रह्मसृक्—ब्रह्माजीके उत्पादक, १४३ विश्वसृक्—जगत्के स्रष्टा, १४४ सर्गः—सृष्टिस्वरूप, १४५ कर्णिकारप्रियः—कनेरके फूलको पसंद करनेवाले, १४६ कविः—त्रिकालदर्शी ॥ १८ ॥
शाखो विशाखो गोशाखः शिवो भिषगनुत्तमः।
गङ्गाप्लवोदको भव्यः पुष्कलः स्थपतिः स्थिरः ॥ १९ ॥
१४७ शाखः—कार्तिकेयके छोटे भाई शाखस्वरूप, १४८ विशाखः—स्कन्दके छोटे भाई विशाखस्वरूप अथवा विशाख नामक ऋषि, १४९ गोशाखः—वेदवाणीकी शाखाओंका विस्तार करनेवाले, १५० शिवः—मंगलमय, १५१ भिषगनुत्तमः—भवरोगका निवारण करनेवाले वैद्यों (ज्ञानियों)—में सर्वश्रेष्ठ, १५२ गङ्गाप्लवोदकः—गङ्गाके प्रवाहरूप जलको सिरपर धारण करनेवाले, १५३ भव्यः—कल्याणस्वरूप, १५४ पुष्कलः—पूर्णतम अथवा व्यापक, १५५ स्थपतिः—ब्रह्माण्डरूपी भवनके निर्माता (थवई), १५६ स्थिरः—अचंचल अथवा स्थाणुरूप ॥ १९ ॥
विजितात्मा विधेयात्मा भूतवाहनसारथिः।
सगणो गणकायश्च सुकीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ २०॥
१५७ विजितात्मा—मनको वशमें रखनेवाले, १५८ विधेयात्मा—शरीर, मन और इन्द्रियोंसे अपनी इच्छाके अनुसार काम लेनेवाले, १५९ भूतवाहनसारथिः— पांचभौतिक रथ (शरीर)—का संचालन करनेवाले बुद्धिरूप सारथि, १६० सगणः— प्रमथगणोंके साथ रहनेवाले, १६१ गणकायः—गणस्वरूप, १६२ सुकीर्तिः—उत्तम कीर्तिवाले, १६३ छिन्नसंशयः—संशयोंको काट देनेवाले ॥ २० ॥
कामदेवः कामपालो भस्मोद्धूलितविग्रहः।
भस्मप्रियो भस्मशायी कामी कान्तः कृतागमः ॥ २१ ॥
१६४ कामदेवः—मनुष्योंद्वारा अभिलषित समस्त कामनाओंके अधिष्ठाता परमदेव, १६५ कामपालः—सकाम भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, १६६ भस्मोद्धूलितविग्रहः—अपने श्रीअंगोंमें भस्म रमानेवाले, १६७ भस्मप्रियः—भस्मके प्रेमी, १६८ भस्मशायी—भस्मपर शयन करनेवाले, १६९ कामी—अपने प्रिय भक्तोंको चाहनेवाले, १७० कान्तः—परम कमनीय प्राणवल्लभस्वरूप, १७१ कृतागमः—समस्त तन्त्रशास्त्रोंके रचयिता ॥ २१ ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा धर्मपुञ्जः सदाशिवः।
अकल्मषश्चतुर्बाहुर्दुरावासो दुरासदः॥ २२ ॥
१७२ समावर्तः—संसारचक्रको भलीभाँति