भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 555

* कोटिरुद्रसंहिता * ५४१

८० धर्मधाम—धर्मके आश्रय, ८१ क्षमाक्षेत्रम्—क्षमाके उत्पत्ति-स्थान, ८२ भगवान्—सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान तथा वैराग्यके आश्रय, ८३ भगनेत्रभित्—भगदेवताके नेत्रका भेदन करनेवाले ॥ ११ ॥
उग्रः पशुपतिस्तार्क्ष्यः प्रियभक्तः परंतपः।
दाता दयाकरो दक्षः कपर्दी कामशासनः ॥ १२ ॥
८४ उग्रः—संहारकालमें भयंकर रूप धारण करनेवाले, ८५ पशुपतिः—मायारूपमें बँधे हुए पाशबद्ध पशुओं (जीवों)-को तत्त्वज्ञानके द्वारा मुक्त करके यथार्थरूपसे उनका पालन करनेवाले, ८६ तार्क्ष्यः—गरुड़रूप, ८७ प्रियभक्तः—भक्तोंसे प्रेम करनेवाले, ८८ परंतपः—शत्रुता रखनेवालोंको संताप देनेवाले, ८९ दाता—दानी, ९० दयाकरः—दयानिधान अथवा कृपा करनेवाले, ९१ दक्षः—कुशल, ९२ कपर्दी—जटाजूटधारी, ९३ कामशासनः—कामदेवका दमन करनेवाले ॥ १२ ॥
श्मशाननिलयः सूक्ष्मः श्मशानस्थो महेश्वरः।
लोककर्ता मृगपतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥ १३ ॥
९४ श्मशाननिलयः—श्मशानवासी, ९५ सूक्ष्मः—इन्द्रियातीत एवं सर्वव्यापी, ९६ श्मशानस्थः—श्मशानभूमिमें विश्राम करनेवाले, ९७ महेश्वरः—महान् ईश्वर या परमेश्वर, ९८ लोककर्ता—जगत्की सृष्टि करनेवाले, ९९ मृगपतिः—मृगके पालक या पशुपति, १०० महाकर्ता—विराट् ब्रह्माण्डकी सृष्टि करनेके समय महान् कर्तृत्वसे सम्पन्न, १०१ महौषधिः—भवरोगका निवारण करनेके लिये महान् ओषधिरूप ॥ १३ ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
नीतिः सुनीतिः शुद्धात्मा सोमः सोमरतः सुखी ॥ १४ ॥
१०२ उत्तरः—संसार-सागरसे पार उतारनेवाले, १०३ गोपतिः—स्वर्ग, पृथ्वी, पशु, वाणी, किरण, इन्द्रिय और जलके स्वामी, १०४ गोप्ता—रक्षक, १०५ ज्ञानगम्यः—तत्त्वज्ञानके द्वारा ज्ञानस्वरूपसे ही जाननेयोग्य, १०६ पुरातनः—सबसे पुराने, १०७ नीतिः—न्यायस्वरूप, १०८ सुनीतिः—उत्तम नीतिवाले, १०९ शुद्धात्मा—विशुद्ध आत्मस्वरूप, ११० सोमः—उमासहित, १११ सोमरतः—चन्द्रमापर प्रेम रखनेवाले, ११२ सुखी—आत्मानन्दसे परिपूर्ण ॥ १४ ॥
सोमपोऽमृतपः सौम्यो महातेजा महाद्युतिः।
तेजोमयोऽमृतमयोऽन्नमयश्च सुधापतिः ॥ १५ ॥
११३ सोमपः—सोमपान करनेवाले अथवा सोमनाथरूपसे चन्द्रमाके पालक, ११४ अमृतपः—समाधिके द्वारा स्वरूपभूत अमृतका आस्वादन करनेवाले, ११५ सौम्यः—भक्तोंके लिये सौम्यरूपधारी, ११६ महातेजाः—महान् तेजसे सम्पन्न, ११७ महाद्युतिः—परमकान्तिमान्, ११८ तेजोमयः—प्रकाशस्वरूप, ११९ अमृतमयः—अमृतरूप, १२० अन्नमयः—अन्नरूप, १२१ सुधापतिः—अमृतके पालक ॥ १५ ॥
अजातशत्रुरालोकः सम्भाव्यो हव्यवाहनः।
लोककरो वेदकरः सूत्रकारः सनातनः ॥ १६ ॥
१२२ अजातशत्रुः—जिनके मनमें कभी किसीके प्रति शत्रुभाव नहीं पैदा हुआ, ऐसे समदर्शी, १२३ आलोकः—प्रकाशस्वरूप, १२४ सम्भाव्यः—सम्माननीय, १२५ हव्यवाहनः—अग्निस্বরূপ, १२६ लोककरः—जगत्के स्रष्टा, १२७ वेदकरः—वेदोंके प्रकट करनेवाले, १२८ सूत्रकारः—ढक्कानादके रूपमें चतुर्दश माहेश्वर सूत्रोंके प्रणेता, १२९ सनातनः—नित्यस्वरूप ॥ १६ ॥

शिव पुराण · पृष्ठ 555, कुल 850 में से · BharatKosha