भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५४० * संक्षिप्त शिवपुराण *

एवं कुशल, ३३ परिवृढः—स्वामी, ३४ दृढः— कभी विचलित न होनेवाले ॥ ५ ॥

विश्वरूपो विरूपाक्षो वागीशः शुचिसत्तमः।
सर्वप्रमाणसंवादी वृषाङ्को वृषवाहनः॥ ६॥

३५ विश्वरूपः—जगत्स्वरूप, ३६ विरूपाक्षः—विकट नेत्रवाले, ३७ वागीशः—वाणीके अधिपति, ३८ शुचिसत्तमः—पवित्र पुरुषोंमें भी सबसे श्रेष्ठ, ३९ सर्वप्रमाणसंवादी—सम्पूर्ण प्रमाणोंमें सामंजस्य स्थापित करनेवाले, ४० वृषाङ्कः—अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले, ४१ वृषवाहनः—वृषभ या धर्मको वाहन बनानेवाले ॥ ६॥

ईशः पिनाकी खट्वाङ्गी चित्रवेषश्चिरंतनः।
तमोहरो महायोगी गोप्ता ब्रह्मा च धूर्जटिः॥ ७॥

४२ ईशः—स्वामी या शासक, ४३ पिनाकी—पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, ४४ खट्वाङ्गी—खाटके पायेकी आकृतिका एक आयुध धारण करनेवाले, ४५ चित्रवेषः—विचित्र वेषधारी, ४६ चिरंतनः—पुराण (अनादि) पुरुषोत्तम, ४७ तमोहरः—अज्ञानान्धकारको दूर करनेवाले, ४८ महायोगी—महान् योगसे सम्पन्न, ४९ गोप्ता—रक्षक, ५० ब्रह्मा— सृष्टिकर्ता, ५१ धूर्जटिः—जटाके भारसे युक्त॥ ७॥

कालकालः कृत्तिवासाः सुभगः प्रणवात्मकः।
उन्नध्रः पुरुषो जुष्यो दुर्वासाः पुरशासनः॥ ८॥

५२ कालकालः—कालके भी काल, ५३ कृत्तिवासाः—गजासुरके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, ५४ सुभगः—सौभाग्यशाली, ५५ प्रणवात्मकः— ओंकारस्वरूप अथवा प्रणवके वाच्यार्थ, ५६ उन्नध्रः—बन्धनरहित, ५७ पुरुषः— अन्तर्यामी आत्मा, ५८ जुष्यः—सेवन करनेयोग्य, ५९ दुर्वासाः—'दुर्वासा' नामक मुनिके रूपमें अवतीर्ण, ६० पुरशासनः—तीन मायामय असुरपुरोंका दमन करनेवाले ॥ ८ ॥

दिव्यायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी परात्परः।
अनादिमध्यनिधनो गिरीशो गिरिजाधवः॥ ९॥

६१ दिव्यायुधः—'पाशुपत' आदि दिव्य अस्त्र धारण करनेवाले, ६२ स्कन्दगुरुः—कार्तिकेयजीके पिता, ६३ परमेष्ठी—अपनी प्रकृष्ट महिमामें स्थित रहनेवाले, ६४ परात्परः—कारणके भी कारण, ६५ अनादिमध्यनिधनः—आदि, मध्य और अन्तसे रहित, ६६ गिरीशः—कैलासके अधिपति, ६७ गिरिजाधवः—पार्वतीके पति॥ ९॥

कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो लोकवर्णोत्तमो मृदुः।
समाधिवेद्यः कोदण्डी नीलकण्ठः परश्वधी ॥ १०॥

६८ कुबेरबन्धुः—कुबेरको अपना बन्धु (मित्र) माननेवाले, ६९ श्रीकण्ठः—श्यामसुषमासे सुशोभित कण्ठवाले, ७० लोकवर्णोत्तमः—समस्त लोकों और वर्णोंसे श्रेष्ठ, ७१ मृदुः—कोमल स्वभाववाले, ७२ समाधिवेद्यः—समाधि अथवा चित्तवृत्तियोंके निरोधसे अनुभवमें आनेयोग्य, ७३ कोदण्डी—धनुर्धर, ७४ नीलकण्ठः—कण्ठमें हालाहल विषका नील चिह्न धारण करनेवाले, ७५ परश्वधी—परशुधारी ॥ १० ॥

विशालाक्षो मृगव्याधः सुरेशः सूर्यतापनः।
धर्मधाम क्षमाक्षेत्रं भगवान् भगनेत्रभित् ॥ ११॥

७६ विशालाक्षः—बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, ७७ मृगव्याधः—वनमें व्याध या किरातके रूपमें प्रकट हो शूकरके ऊपर बाण चलानेवाले, ७८ सुरेशः—देवताओंके स्वामी, ७९ सूर्यतापनः— सूर्यको भी दण्ड देनेवाले,