शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 553, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५३९
ऋषियोंने पूछा—शिवके वे सहस्र नाम कौन-कौन हैं, बताइये, जिनसे संतुष्ट होकर महेश्वरने श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था? उन नामोंके माहात्म्यका भी वर्णन कीजिये। श्रीविष्णुके ऊपर शंकरजीकी जैसी कृपा हुई थी, उसका यथार्थरूपसे प्रतिपादन कीजिये।
शुद्ध अन्तःकरणवाले उन मुनियोंकी वैसी बात सुनकर सूतने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया। (अध्याय ३४)
भगवान् विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्रनामस्तोत्र
सूत उवाच
श्रूयतां भो ऋषिश्रेष्ठा येन तुष्टो महेश्वरः।
तदहं कथयाम्यद्य शैवं नामसहस्रकम्॥ १॥
सूतजी बोले— मुनिवरो! सुनो, जिससे महेश्वर संतुष्ट होते हैं, वह शिवसहस्रनाम-स्तोत्र आज तुम सबको सुना रहा हूँ॥ १॥
विष्णुरुवाच
शिवो हरो मृडो रुद्रः पुष्करः पुष्पलोचनः।
अर्थिगम्यः सदाचारः शर्वः शम्भुर्महेश्वरः॥ २॥
भगवान् विष्णुने कहा— १ शिवः—कल्याणस्वरूप, २ हरः—भक्तोंके पाप-ताप हर लेनेवाले, ३ मृडः—सुखदाता, ४ रुद्रः—दुःख दूर करनेवाले, ५ पुष्करः—आकाशस्वरूप, ६ पुष्पलोचनः—पुष्पके समान खिले हुए नेत्रवाले, ७ अर्थिगम्यः—प्रार्थियोंको प्राप्त होनेवाले, ८ सदाचारः—श्रेष्ठ आचरणवाले, ९ शर्वः—संहारकारी, १० शम्भुः—कल्याणनिकेतन, ११ महेश्वरः—महान् ईश्वर ॥ २॥
चन्द्रापीडश्चन्द्रमौलिर्विश्वं विश्वम्भ्रेश्वरः।
वेदान्तसारसंदोहः कपाली नीललोहितः॥ ३॥
१२ चन्द्रापीडः—चन्द्रमाको शिरोभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, १३ चन्द्रमौलिः—सिरपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले, १४ विश्वम्—सर्वस्वरूप, १५ विश्वम्भरेश्वरः—विश्वका भरण-पोषण करनेवाले श्रीविष्णुके भी ईश्वर, १६ वेदान्तसारसंदोहः—वेदान्तके सारतत्त्व सच्चिदानन्दमय ब्रह्मकी साकार मूर्ति, १७ कपाली—हाथमें कपाल धारण करनेवाले, १८ नीललोहितः—(गलेमें) नील और (शेष अंगोंमें) लोहित-वर्णवाले॥ ३॥
ध्यानाधारोऽपरिच्छेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वरः।
अष्टमूर्तिर्विश्वमूर्तिस्त्रिवर्गस्वर्गसाधनः ॥४॥
१९ ध्यानाधारः—ध्यानके आधार, २० अपरिच्छेद्यः—देश, काल और वस्तुकी सीमासे अविभाज्य, २१ गौरीभर्ता—गौरी अर्थात् पार्वतीजीके पति, २२ गणेश्वरः—प्रमथगणोंके स्वामी, २३ अष्टमूर्तिः—जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी और यजमान—इन आठ रूपोंवाले, २४ विश्व-मूर्तिः—अखिल ब्रह्माण्डमय विराट् पुरुष, २५ त्रिवर्गस्वर्गसाधनः—धर्म, अर्थ, काम तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले ॥४॥
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञो देवदेवस्त्रिलोचनः।
वामदेवो महादेवः पटुः परिवृढो दृढः॥५॥
२६ ज्ञानगम्यः—ज्ञानसे ही अनुभवमें आनेके योग्य, २७ दृढप्रज्ञः—सुस्थिर बुद्धिवाले, २८ देवदेवः—देवताओंके भी आराध्य, २९ त्रिलोचनः—सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रोंवाले, ३० वामदेवः—लोकके विपरीत स्वभाववाले देवता, ३१ महादेवः—महान् देवता ब्रह्मादिकोंके भी पूजनीय, ३२ पटुः—सब कुछ करनेमें समर्थ