शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५६६ | * संक्षिप्त शिवपुराण * |
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जबतक अरुणोदय न हो जाय। अरुणोदय होनेपर पुनः स्नान करके भाँति-भाँतिके पूजनोपचारों और उपहारोंद्वारा शिवकी अर्चना करे। तत्पश्चात् अपना अभिषेक कराये, नाना प्रकारके दान दे और प्रहरकी संख्याके अनुसार ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंको अनेक प्रकारके भोज्य-पदार्थोंका भोजन कराये। फिर शंकरको नमस्कार करके पुष्पांजलि दे और बुद्धिमान् पुरुष उत्तम स्तुति करके निम्नांकित मन्त्रोंसे प्रार्थना करे—
तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्यं तथा कुरु॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद मे॥
अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च।
तेनैव प्रीयतां देवः शङ्करः सुखदायकः॥
कुले मम महादेव भजनं तेऽस्तु सर्वदा।
माभूतस्य कुले जन्म यत्र त्वं नहि देवता॥
'सुखदायक कृपानिधान शिव! मैं आपका हूँ। मेरे प्राण आपमें ही लगे हैं और मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन करता है। यह जानकर आप जैसा उचित समझें, वैसा करें। भूतनाथ! मैंने जानकर या अनजानमें जो जप और पूजन आदि किया है, उसे समझकर दयासागर होनेके नाते ही आप मुझपर प्रसन्न हों। उस उपवासव्रतसे जो फल हुआ हो, उसीसे सुखदायक भगवान् शंकर मुझपर प्रसन्न हों। महादेव! मेरे कुलमें सदा आपका भजन होता रहे। जहाँके आप इष्टदेवता न हों, उस कुलमें मेरा कभी जन्म न हो।'
इस प्रकार प्रार्थना करनेके पश्चात् भगवान् शिवको पुष्पांजलि समर्पित करके ब्राह्मणोंसे तिलक और आशीर्वाद ग्रहण करे। तदनन्तर शम्भुका विसर्जन करे। जिसने इस प्रकार व्रत किया हो, उससे मैं दूर नहीं रहता। इस व्रतके फलका वर्णन नहीं किया जा सकता। मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे शिवरात्रि-व्रत करनेवालेके लिये मैं दे न डालूँ। जिसके द्वारा अनायास ही इस व्रतका पालन हो गया, उसके लिये भी अवश्य ही मुक्तिका बीज बो दिया गया। मनुष्योंको प्रतिमास भक्तिपूर्वक शिवरात्रि-व्रत करना चाहिये। तत्पश्चात् इसका उद्यापन करके मनुष्य सांगोपांग फल लाभ करता है। इस व्रतका पालन करनेमें मैं शिव निश्चय ही उपासकके समस्त दुःखोंका नाश कर देता हूँ और उसे भोग-मोक्ष आदि सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! भगवान् शिवका यह अत्यन्त हितकारक और अद्भुत वचन सुनकर श्रीविष्णु अपने धामको लौट आये। उसके बाद इस उत्तम व्रतका अपना हित चाहनेवाले लोगोंमें प्रचार हुआ। किसी समय केशवने नारदजीसे भोग और मोक्ष देनेवाले इस दिव्य शिवरात्रि-व्रतका वर्णन किया था।
(अध्याय ३७-३८)