शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 579, कुल 850 में से
संदर्भ में पढ़ें* कोटिरुद्रसंहिता * ५६५
गुरुदत्त मन्त्र न हो तो पंचाक्षर (नमः शिवाय)-मन्त्रके जपसे भगवान् शंकरको संतुष्ट करे, धेनुमुद्रा* दिखाकर उत्तम जलसे तर्पण करे। पश्चात् अपनी शक्तिके अनुसार पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प करे। फिर जबतक पहला प्रहर पूरा न हो जाय, तबतक महान् उत्सव करता रहे।
दूसरा प्रहर आरम्भ होनेपर पुनः पूजनके लिये संकल्प करे। अथवा एक ही समय चारों प्रहरोंके लिये संकल्प करके पहले प्रहरकी भाँति पूजा करता रहे। पहले पूर्वोक्त द्रव्योंसे पूजन करके फिर जलधारा समर्पित करे। प्रथम प्रहरकी अपेक्षा दुगुने मन्त्रोंका जप करके शिवकी पूजा करे। पूर्वोक्त तिल, जौ तथा कमल-पुष्पोंसे शिवकी अर्चना करे। विशेषतः बिल्वपत्रोंसे परमेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये। दूसरे प्रहरमें बिजौरा नींबूके साथ अर्घ्य देकर खीरका नैवेद्य निवेदन करे। जनार्दन! इसमें पहलेकी अपेक्षा मन्त्रोंकी दुगुनी आवृत्ति करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करानेका संकल्प करे। शेष सब बातें पहलेकी ही भाँति तबतक करता रहे, जबतक दूसरा प्रहर पूरा न हो जाय। तीसरे प्रहरके आनेपर पूजन तो पहलेके समान ही करे; किंतु जौके स्थानमें गेहूँका उपयोग करे और आकके फूल चढ़ाये। उसके बाद नाना प्रकारके धूप एवं दीप देकर पूएका नैवेद्य भोग लगाये। उसके साथ भाँति-भाँतिके शाक भी अर्पित करे। इस प्रकार पूजन करके कपूरसे आरती उतारे। अनारके फलके साथ अर्घ्य दे और दूसरे प्रहरकी अपेक्षा दुगुना मन्त्रजप करे। तदनन्तर दक्षिणासहित ब्राह्मण-भोजनका संकल्प करे और तीसरे प्रहरके पूरे होनेतक पूर्ववत् उत्सव करता रहे। चौथा प्रहर आनेपर तीसरे प्रहरकी पूजाका विसर्जन कर दे। पुनः आवाहन आदि करके विधिवत् पूजा करे। उड़द, कँगनी, मूँग, सप्तधान्य, शंखीपुष्प तथा बिल्वपत्रोंसे परमेश्वर शंकरका पूजन करे। उस प्रहरमें भाँति-भाँतिकी मिठाइयोंका नैवेद्य लगाये अथवा उड़दके बड़े आदि बनाकर उनके द्वारा सदाशिवको संतुष्ट करे। केलेके फलके साथ अथवा अन्य विविध फलोंके साथ शिवको अर्घ्य दे। तीसरे प्रहरकी अपेक्षा दूना मन्त्रजप करे और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजनका संकल्प करे। गीत, वाद्य तथा नृत्यसे शिवकी आराधनापूर्वक समय बिताये। भक्तजनोंको तबतक महान् उत्सव करते रहना चाहिये,
* धेनुमुद्राका लक्षण इस प्रकार है—
वामाङ्गुलीनां मध्येषु दक्षिणाङ्गुलिकास्तथा। संयोज्य तर्जनीं दक्षां मध्यमानामयोस्तथा॥
दक्षमध्यमयोर्वामां तर्जनीं च नियोजयेत्। वामयानामया दक्षकनिष्ठां च नियोजयेत्॥
दक्षयानामया वामां कनिष्ठां च नियोजयेत्। विहिताधोमुखी चैषा धेनुमुद्रा प्रकीर्तिता॥
‘बायें हाथकी अँगुलियोंके बीचमें दाहिने हाथकी अँगुलियोंको संयुक्त करके दाहिनी तर्जनीको मध्यमामें लगाये। दाहिने हाथकी मध्यमामें बायें हाथकी तर्जनीको मिलावे। फिर बायें हाथकी अनामिकासे दाहिने हाथकी कनिष्ठिका और दाहिने हाथकी अनामिकाके साथ बायें हाथकी कनिष्ठिकाको संयुक्त करे। फिर इन सबका मुख नीचेकी ओर करे। यही धेनुमुद्रा कही गयी है।’