शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
नित्यकर्म करनेके पश्चात् पार्थिव लिंगका ही पूजन करे। पहले पार्थिव बनाकर पीछे उसकी विधिवत् स्थापना करे। फिर पूजनके पश्चात् नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट करे। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि उस समय शिवरात्रि-व्रतके माहात्म्यका पाठ करे। श्रेष्ठ भक्त अपने व्रतकी पूर्तिके लिये उस माहात्म्यको श्रद्धापूर्वक सुने। रात्रिके चारों पहरोंमें चार पार्थिव लिंगोंका निर्माण करके आवाहनसे लेकर विसर्जनतक क्रमशः उनकी पूजा करे और बड़े उत्सवके साथ प्रसन्नतापूर्वक जागरण करे। प्रातःकाल स्नान करके पुनः वहाँ पार्थिव शिवका स्थापन और पूजन करे। इस तरह व्रतको पूरा करके हाथ जोड़ मस्तिष्क झुकाकर बारंबार नमस्कारपूर्वक भगवान् शम्भुसे इस प्रकार प्रार्थना करे।
प्रार्थना एवं विसर्जन
नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया।
विसृज्यते मया स्वामिन् व्रतं जातमनुत्तमम्॥
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च।
संतुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि॥
‘महादेव! आपकी आज्ञासे मैंने जो व्रत ग्रहण किया था, स्वामिन्! वह परम उत्तम व्रत पूर्ण हो गया। अतः अब उसका विसर्जन करता हूँ। देवेश्वर शर्व! यथाशक्ति किये गये इस व्रतसे आप आज मुझपर कृपा करके संतुष्ट हों।’
तत्पश्चात् शिवको पुष्पांजलि समर्पित करके विधिपूर्वक दान दे। फिर शिवको नमस्कार करके व्रतसम्बन्धी नियमका विसर्जन कर दे। अपनी शक्तिके अनुसार शिवभक्त ब्राह्मणों, विशेषतः संन्यासियोंको भोजन कराकर पूर्णतया संतुष्ट करके स्वयं भी भोजन करे।
हरे! शिवरात्रिको प्रत्येक प्रहरमें श्रेष्ठ शिवभक्तोंको जिस प्रकार विशेष पूजा करनी चाहिये, उसे मैं बताता हूँ; सुनो! प्रथम प्रहरमें पार्थिव लिंगकी स्थापना करके अनेक सुन्दर उपचारोंद्वारा उत्तम भक्तिभावसे पूजा करे। पहले गन्ध, पुष्प आदि पाँच द्रव्योंद्वारा सदा महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। उस-उस द्रव्यसे सम्बन्ध रखनेवाले मन्त्रका उच्चारण करके पृथक्-पृथक् वह द्रव्य समर्पित करे। इस प्रकार द्रव्य समर्पणके पश्चात् भगवान् शिवको जलधारा अर्पित करे। विद्वान् पुरुष चढ़े हुए द्रव्योंको जलधारासे ही उतारे। जलधाराके साथ-साथ एक सौ आठ मन्त्रका जप करके वहाँ निर्गुण-सगुणरूप शिवका पूजन करे। गुरुसे प्राप्त हुए मन्त्रद्वारा भगवान् शिवकी पूजा करे। अन्यथा नाममन्त्रद्वारा सदाशिवका पूजन करना चाहिये। विचित्र चन्दन, अखण्ड चावल और काले तिलोंसे परमात्मा शिवकी पूजा करनी चाहिये। कमल और कनेरके फूल चढ़ाने चाहिये। आठ नाम-मन्त्रोंद्वारा शंकरजीको पुष्प समर्पित करे। वे आठ नाम इस प्रकार हैं—भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान्, भीम और ईशान। इनके आरम्भमें श्री और अन्तमें चतुर्थी विभक्ति जोड़कर ‘श्रीभवाय नमः’ इत्यादि नाममन्त्रोंद्वारा शिवका पूजन करे। पुष्प-समर्पणके पश्चात् धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे। पहले प्रहरमें विद्वान् पुरुष नैवेद्यके लिये पकवान बनवा ले। फिर श्रीफलयुक्त विशेषार्घ्य देकर ताम्बूल समर्पित करे। तदनन्तर नमस्कार और ध्यान करके गुरुके दिये हुए मन्त्रका जप करे।