भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 577

* कोटिरुद्रसंहिता * ५६३

है, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

हरे ! इन चारोंमें भी शिवरात्रिका व्रत ही सबसे अधिक बलवान् है। इसलिये भोग और मोक्षरूपी फलकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको मुख्यतः उसीका पालन करना चाहिये। इस व्रतको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्योंके लिये हितकारक व्रत नहीं है। यह व्रत सबके लिये धर्मका उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकामभाव रखनेवाले सभी मनुष्यों, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, बालकों, दासों, दासियों तथा देवता आदि सभी देहधारियोंके लिये यह श्रेष्ठ व्रत हितकारक बताया गया है।

माघमासके* कृष्णपक्षमें शिवरात्रि तिथिका विशेष माहात्म्य बताया गया है। जिस दिन आधी रातके समयतक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे व्रतके लिये ग्रहण करना चाहिये। शिवरात्रि करोड़ों हत्याओंके पापका नाश करनेवाली है। केशव ! उस दिन सबेरेसे लेकर जो कार्य करना आवश्यक है, उसे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान देकर सुनो। बुद्धिमान् पुरुष सबेरे उठकर बड़े आनन्दके साथ स्नान आदि नित्यकर्म करे। आलस्यको पास न आने दे। फिर शिवालयमें जाकर शिवलिंगका विधिवत् पूजन करके मुझ शिवको नमस्कार करनेके पश्चात् उत्तम रीतिसे संकल्प करे—

संकल्प

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव॥
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि॥

'देवदेव! महादेव! नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देव! मैं आपके शिवरात्रि-व्रतका अनुष्ठान करना चाहता हूँ। देवेश्वर ! आपके प्रभावसे यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधाके पूर्ण हो और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।'

ऐसा संकल्प करके पूजन-सामग्रीका संग्रह करे और उत्तम स्थानमें जो शास्त्रप्रसिद्ध शिवलिंग हो, उसके पास रातमें जाकर स्वयं उत्तम विधि-विधानका सम्पादन करे; फिर शिवके दक्षिण या पश्चिमभागमें सुन्दर स्थानपर उनके निकट ही पूजाके लिये संचित सामग्रीको रखे। तदनन्तर श्रेष्ठ पुरुष वहाँ फिर स्नान करे। स्नानके बाद सुन्दर वस्त्र और उपवस्त्र धारण करके तीन बार आचमन करनेके पश्चात् पूजन आरम्भ करे। जिस मन्त्रके लिये जो द्रव्य नियत हो, उस मन्त्रको पढ़कर उसी द्रव्यके द्वारा पूजा करनी चाहिये। बिना मन्त्रके महादेवजीकी पूजा नहीं करनी चाहिये। गीत, वाद्य, नृत्य आदिके साथ भक्तिभावसे सम्पन्न हो रात्रिके प्रथम पहरमें पूजन करके विद्वान् पुरुष मन्त्रका जप करे। यदि मन्त्रज्ञ पुरुष उस समय श्रेष्ठ पार्थिवलिंगका निर्माण करे तो


* शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेसे फाल्गुन मासकी कृष्ण त्रयोदशी माघ मासकी कही गयी है। जहाँ कृष्णपक्षसे मासका आरम्भ मानते हैं, उनके अनुसार यहाँ माघका अर्थ फाल्गुन समझना चाहिये।