भारतकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया।
कृतं तदस्तु कृपया सफलं तव शङ्कर॥

'देवदेव! महादेव! शरणागतवत्सल! देवेश्वर! इस व्रतसे संतुष्ट हो आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये। शिव-शंकर! मैंने भक्तिभावसे इस व्रतका पालन किया है। इसमें जो कमी रह गयी हो, वह आपके प्रसादसे पूरी हो जाय। शंकर! मैंने अनजानमें या जान-बूझकर जो जप-पूजन आदि किया है, वह आपकी कृपासे सफल हो।'

इस तरह परमात्मा शिवको पुष्पांजलि अर्पण करके फिर नमस्कार एवं प्रार्थना करे। जिसने इस प्रकार व्रत पूरा कर लिया, उसके उस व्रतमें कोई न्यूनता नहीं रहती। उससे वह मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।

(अध्याय ३९)


अनजानमें शिवरात्रि-व्रत करनेसे एक भीलपर भगवान् शंकरकी अद्भुत कृपा

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! पूर्वकालमें किसने इस उत्तम शिवरात्रि-व्रतका पालन किया था और अनजानमें भी इस व्रतका पालन करके किसने कौन-सा फल प्राप्त किया था?

सूतजीने कहा—ऋषियो! तुम सब लोग सुनो! मैं इस विषयमें एक निषादका प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पहलेकी बात है—किसी वनमें एक भील रहता था, जिसका नाम था—गुरुद्रुह। उसका कुटुम्ब बड़ा था तथा वह बलवान् और क्रूर स्वभावका होनेके साथ ही क्रूरतापूर्ण कर्ममें तत्पर रहता था। वह प्रतिदिन वनमें जाकर मृगोंको मारता और वहीं रहकर नाना प्रकारकी चोरियाँ करता था। उसने बचपनसे ही कभी कोई शुभ कर्म नहीं किया था। इस प्रकार वनमें रहते हुए उस दुरात्मा भीलका बहुत समय बीत गया। तदनन्तर एक दिन बड़ी सुन्दर एवं शुभकारक शिवरात्रि आयी। किंतु वह दुरात्मा घने जंगलमें निवास करनेवाला था, इसलिये उस व्रतको नहीं जानता था। उसी दिन उस भीलके माता-पिता और पत्नीने भूखसे पीड़ित होकर उससे याचना की—'वनेचर! हमें खानेको दो।'

उनके इस प्रकार याचना करनेपर वह तुरंत धनुष लेकर चल दिया और मृगोंके शिकारके लिये सारे वनमें घूमने लगा। दैवयोगसे उसे उस दिन कुछ भी नहीं मिला और सूर्य अस्त हो गया। इससे उसको बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा—'अब मैं क्या करूँ! कहाँ जाऊँ? आज तो कुछ नहीं मिला। घरमें जो बच्चे हैं, उनका तथा माता-पिताका क्या होगा? मेरी जो पत्नी है, उसकी भी क्या दशा होगी? अतः मुझे कुछ लेकर ही घर जाना चाहिये; अन्यथा नहीं।' ऐसा सोचकर वह व्याध एक जलाशयके समीप पहुँचा और जहाँ पानीमें उतरनेका घाट था, वहाँ जाकर खड़ा हो गया। वह मन-ही-मन यह विचार करता था कि 'यहाँ कोई-न-कोई जीव पानी पीनेके लिये अवश्य आयेगा। उसीको मारकर कृतकृत्य